सभ्यता के वृक्ष की जड़ों में नहीं, कर्मशील समाज की डालों पर लगते हैं विकास के फल

वामपंथी राष्ट्रविरोधी मास मीडिया के जंजाल का एक अंग अनुदान पर चलने वाली वेबसाइटें भी हैं. इन दिनों इनका एक नया पैंतरा सामने आया है.

सोशल मीडिया के राष्ट्रवादी लोग जो पढ़ते-लिखते हैं उनका झुकाव भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत पर ज्यादा होता है इसलिए हिन्दू विरोधी मीडिया वेबसाइटें तथ्यात्मक रूप से बरगलाने के लिए ऐतिहासिक आलेख अधिक प्रकाशित करती हैं.

उदाहरण के लिए बार-बार यह कहना कि संस्कृत सीरिया से आई थी, राजपूत डरपोक थे और सदैव हारते थे इत्यादि. यह सब इसलिए भी लिखा जा रहा है क्योंकि कथित आर्यन इन्वेज़न थ्योरी मिथ्या सिद्ध हो चुकी है.

मेरे विचार से इस षड्यंत्र का एक लक्ष्य राष्ट्रवादी विचारकों को सांस्कृतिक इतिहास में उलझाये रखना भी है. राष्ट्रविरोधी मीडिया वेबसाइटों पर जानबूझ कर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ कर के लेख लिखे जाते हैं ताकि उनके समर्थक इसे फैलाएं जिसके प्रत्युत्तर में राष्ट्रवादी लेखक शोध करें और लिखें.

इस तरह चक्र चलता रहे और देशहित में सोचने व लिखने वाले घूम फिर कर इतिहास में ही जलेबी बनाते रहें. इस भूलभूलैया से बाहर निकलकर वे कभी भविष्य की नीतियों पर माथा खपा ही न सकें.

विषयों के चयन में प्राथमिकता का आधार देखा जाये तो वामपंथी बुद्धिजीवी विज्ञान तकनीक, विदेश नीति, अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध तथा अर्थशास्त्र जैसे आधुनिक विषयों पर ज्यादा तार्किक और नियमित लेख लिखते हैं.

ये ऐसे विषय हैं जिनसे देश की भविष्य की नीति निर्धारित होती है. इन विषयों पर राष्ट्रवादी चिंतक बहुत कम लिखते हैं. अभी भी समय है जाग जाइये. सनातन संस्कृति के साथ आधुनिक विषय भी पढ़िये और उन पर लेखनी चलाइये.

सन् 1857 के बाद ही अंग्रेजों ने सोच लिया था कि जब वे भारतीय उपमहाद्वीप छोड़ कर जाएंगे तो इस क्षेत्र की भूराजनैतिक व्यवस्था को कौन से घाव देकर जाना उचित होगा. वे आज भी इसमें रत हैं.

संस्कृति हमें अपनी जड़ों से जोड़ती तो है किंतु यह भी ध्यान रखें कि सभ्यता के वृक्ष पर विकास के फल जड़ों में नहीं लगते उन्हें कर्मशील समाज की डालों पर लगना होता है.

भविष्य की बात करें तो आजकल बच्चों की गरमी की छुट्टी हो गयी है. हॉलिडे होमवर्क तो मिलता ही है साथ में कुछ और पढ़ने को मिल जाये तो कुछ ज्यादा सीखने को मिलेगा. वैसे भी गरमी में बाहर खेलने को तो मिलता नहीं.

ऐसे में अपने बच्चों को महर्षि कलाम की पुस्तकें लाकर दीजिये: Ignited Minds और हाल ही में आई Reignited विज्ञान में रुचि रखने वाले बच्चों के लिए अच्छी हैं.

डॉ कलाम की Scientific Indian उत्कृष्ट पुस्तक है. यूनिवर्सिटीज़ प्रेस से प्रकाशित उनकी आत्मकथा Wings Of Fire में अभ्यास प्रश्न भी दिए गए हैं.

इतिहास की सही जानकारी के लिए संजीव सान्याल ने बच्चों के लिए The incredible history of India’s Geography लिखी है.

सुभद्रा सेनगुप्ता की A children’s history of India भी अच्छी है. ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी नीतियों पर शशि थरूर ने Era of Darkness लिखी है.

माइकल डानिनो ने लुप्त हो चुकी सरस्वती पर Lost River नामक पुस्तक लिखी है. अर्थशास्त्र को सरल तरीके से समझने के लिए अशोक संजय गुहा की Economics without Tears पढ़नी चाहिये.

अर्थशास्त्र को और व्यवहारिक तरीके से ऑक्सफ़ोर्ड की वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन में पार्था दासगुप्ता ने समझाया है. संविधान की उद्देशिका (preamble) पर विक्रम सेठ की माताजी लीला सेठ ने We the children of India लिखी है.

यदि आपका बच्चा कुशाग्र बुद्धि का है और सामाजिक विज्ञान में रुचि है तो उसे आप हिंडोल सेनगुप्ता की The Modern Monk और Being Hindu भी दे सकते हैं.

वामसी जुलुरी ने Rearming Hinduism लिखी है. भारत की विदेश नीति पर शशि थरूर ने Pax Indica लिखी है.

इसके अतिरिक्त डेविड मलोन ने Does the Elephant Dance? और Teresita & Howard Schaffer ने India at the Global High Table लिखी है.

इसरो का इतिहास जानने के लिए आर. आरवमुदन की ISRO A Personal History और के राधाकृष्णन की My Odyssey पढ़ें.

महर्षि कलाम की India 2020 भी अवश्य पढ़नी चाहिये. कम से कम बच्चों को पता तो चले कि हाड़ मांस का एक व्यक्ति ऐसा भी था जो दिन रात देश के बारे में ही सोचता था.

सन् 2020 आने में केवल तीन साल शेष हैं. हम ये सोचें कि कहाँ गलतियां हुईं और आगे क्या करना है. हम ये सोच कर न बैठ जाएँ कि पूर्वजों ने सब कर दिया है और अब हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं.

उपरोक्त सभी पुस्तकें कक्षा 7 से ऊपर के बच्चे पढ़ सकते हैं. वे ही देश के भविष्य हैं. गरमी की छुट्टी में रुचि के अनुसार कम से कम एक पुस्तक मंगा कर दीजिये. आप भी पढ़िये बच्चों को भी पढ़ाइये.

आपके बच्चे बहुत छोटे हों तो दूसरों के बच्चों को उपहार दीजिये. हमें हर विषय में भविष्य के चिंतक तैयार करने हैं जो अन्तर्विषयक विचार उत्पन्न कर सकें.

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