राष्ट्र निर्माण के स्वप्न देखता एक राष्ट्रवादी

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गंगोत्री की गोद के उत्ताल जलप्रवाह के मध्य खड़ा अघोरी प्राची के सूर्य की मंद रेख देख विस्मृत था, पर्वत से गिरकर पुनः ऊँची उठती जलतरंगों से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे माता की गोद में लेटा बालक ऊपर के चमकीले फल खाने को मचल रहा है.

अचानक उसके पांव से कुछ टकराया और अपने असंतुलन से भयभीत अघोरी ने नीचे देखा. भीषण प्रवाह में एक शव उसके पांव से उलझ रहा था. अचानक वह शव खड़ा हो गया और बोला-

विदुर नीति में पढ़ा कि,

दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् । यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥

“दिनभर ऐसा काम करो जिससे रात में चैन की नींद आ सके. वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिससे मृत्यु पश्चात सुख मिले अर्थात सद्गती प्राप्त हो”

मैंने भी दिन रात राष्ट्र के लिये काम किया पर मेरी सद्गती क्यों नहीं हुयी? मैं क्यों मरा अकाल मृत्यु? आज तुम कुलभूषण जाधव के अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट द्वारा फाँसी को निरस्त करने पर प्रसन्न हो और सरकार पागलों की तरह दिन रात लगी है बचाने में, पर मेरे समय क्या हुआ था? अघोरी जबाब दो मुझे और मुझे विश्वास दिलाओ कि मेरी मौत तुम भूले तो नहीं.

चौंककर अघोरी ऊज्जवल आत्मा के प्रकाशपूँज को देखता रहा फिर धीरे से बुदबुदाया “सरबजीत सिंह !!!”

गंगा समान पवित्र वो उज्ज्वल आत्मा मानों अपने पहचाने जाने पर तृप्त हुयी पर प्रश्न वहीं यथा स्थान था कि मैं फाँसी की सज़ा पाने के बाद भी क़ैदियों द्वारा बर्बर पिटाई की मौत को क्यों प्राप्त हुआ?

तब और अब में क्या बदला है अघोरी??

अघोरी ने सर झुका कर उत्तर दिया “महात्मन केवल सरकार बदली है, अब एक राष्ट्रवादी पागल है और वो भी सोता नहीं है बस राष्ट्र निर्माण के स्वप्न देखता है और जुटा है उसी में, दिन-रात, अथक”

शव आगे बह निकला और आत्मा संतृप्त होकर परमात्मा में विलीन हो गयी.

– विष्णु कुमार

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