जो मन का मैल धो दे ऐसा धोबी

मेरा नाम सुनकर मेरी जाति जान लेना मुश्किल है. ये एक ऐसा कारण रहा है जिसकी वजह से मुझे बचपन मे ही एक खास अनुभव से कई बार गुजरना पड़ा.

किसी नये स्कूल में एडमिशन लिया या स्कूल में कोई नया टीचर आया…. सबसे पहला काम होता था सब बच्चो का इंट्रोडक्शन…..जब ऐसा होता तो आगे क्या होने वाला है ये सोचकर मन में  धुकधुकी शुरू हो जाती.

जैसे ही मेरा नंबर आता… मेरा नाम, पापा का नाम, उनका व्यवसाय, घर का पता… ये सब एक सांस में तेजी से बोलकर तुरन्त बैठ जाता… लेकिन मन में पता रहता था सुई कहाँ अटक सकती है और अधिकतर अटकती भी थी… सरनेम क्या है तुम्हारा?

सरनेम?

सर यही है पूरा नाम…

अरे सरनेम नहीं पता?

सर पूरा नाम इतना ही लिखतें हैं…

तो सरनेम क्या है फिर?

सर वो… 2, 3 सेकंड के गैप के बाद.. सर वो कनौजिया…

कनौजिया…? वो क्या होते हैं?

जब पहली बार मुझसे ये सवाल टकराया तब मैं इतना छोटा था कि जवाब नहीं मालूम था… घर आकर मम्मी से पूछा… मम्मी ने ये सवाल पूछने की वजह पूछी… वजह बताई तो मम्मी कुछ देर सोच में पड़ गयीं… फिर बताया.

बचपन की अधिकतर बातें भूल जातीं हैं पर कुछ यादें किसी खास वजह से हमेशा के लिये याद रह जातीं हैं… ये एक ऐसी ही याद है.

फिर जब भी मेरे सामने ये सवाल आया तो मैं मन कड़ा करके साफ साफ बोल देता… धोबी… बोलते वक्त ऐसा लगता था कि जमीन में धंस जाऊं… क्योंकि बाकी बच्चों की दबी दबी हंसी से ज्यादा टीचर के चेहरे पर खुद को सहज बनाने की कोशिश के भाव ज्यादा चुभते थे.

हालांकि मुझे भेदभाव का शिकार कभी नहीं होना पड़ा. समय के साथ धीरे धीरे हम ढीठ होते चले गये और आज महाढीठ हो चुके हैं. यहाँ कोई भी बेहूदा तर्क रखने से पहले, दुष्प्रचार करने का आरोप लगाने से पहले एक बार खुद को उस 8-10 साल के बच्चे की जगह पर रखकर सोचियेगा ऐसी परिस्थिति से गुजरने पर उसके मन पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा.

खैर मेरी तो आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी मुझे इससे ज्यादा का अनुभव नहीं मिला. बचपन में हम जब गांव जाते थे तो वहां हमारे टोले से लगी हुई चमारों की बस्ती थी… चमरौटी… दोपहर में खेलते वक्त कभी कभार उनका ग्रुप सामने पड़ जाता…. वो अपने आप तुरन्त दूर हट जाते… उन्हें पता होता था कि ये बच्चे हमसे ऊंची जाति के हैं और हमे उन्हें छूना नहीं है क्योंकि हम अछूत हैं. हमारे टोले में सारे घर सऊदी से कमाने वाले थे… आर्थिक रूप से सम्पन्न थे… हम लोग दूसरे टोले वालों से खास मतलब नहीं रखते… बच्चे तो बिल्कुल नहीं… बड़ों का क्या हिसाब किताब था वो पता नहीं… आजकल तो ठीकठाक है….

शहरों में जातिवादी मानसिकता मन में होती है सामने से नहीं. हिंदुत्व और मोदी लहर उठने के बाद इसमें बहुत सुधार हुआ है. गांवों का हिसाब किताब अलग तरह का है… कहीं कहीं जातिवाद  है कहीं कहीं नहीं… जहां है भी तो वो अलग ढंग का है… वैसा नहीं जैसा हम पढ़ते सुनते हैं…. अब लड़ाई वर्चस्व की रहती है… सभी जाति वाले जाति के आधार पर समाज पर अपना अप्रत्यक्ष प्रभुत्व चाहते हैं…

दलितो में वर्चस्व की भावना तेजी से पनप रही है…. ये एक बड़ा कारण है भीम आर्मी जैसे संगठनों के जन्म का… एक तो बदले की भावना के कारण ऐसे दलित संगठन बहुत उग्र, हिंसक और उकसाऊ होते हैं…. और पुराने सवर्ण संगठन भी अपने ढीले पड़ते वर्चस्व से तिलमिलाकर विवाद के मौके खोजते और पैदा करते हैं….

कुल मिलाकर दोनों ही एक दूसरे से लड़ना और एक दूसरे का अहंकार तोड़ना चाहते हैं खुद के अहंकार को ज्यादा बड़ा करने के लिये. हालांकि यादव जाति के लोग जो यूपी में कुछ वजहों से बदनाम रहे…. जातिवाद, छुआछूत में उनका पिछला रेकॉर्ड शानदार रहा है…. वो इसके शिकार  हुये इसका नहीं पता पर अपने से निचली जातियों के साथ यादवों ने ऐसा बहुत कम किया…

कुछ लोग तोतारटन्त करते हैं कि हम पंडित, ठाकुर, बनिया कहने पर बुरा नहीं मानते तुम धोबी, चमार, पासी कहने पर क्यों बुरा मानते हो?
ऐसे लोग अव्वल दर्जे धूर्त और मक्कार होते हैं…कारण उन्हें भी पता है पर जानबूझकर मजे लेने होते हैं. निचली जातियों के जातिगत संबोधन शब्द अपमान की दुर्भावना के साथ लिये जाते हैं. पंडिज्जी, बाऊ साहेब जैसे शब्द अहंकार पोषित करने कराने के वाहक हैं.

कारण जानना चाहते हैं ऐसा क्यों है?

ऊपर जो एक किस्सा सुनाया है वही है कारण…

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