हिन्दुओं! बहुत हो गया, तीन तलाक़ पर बोलना बंद करो

सती प्रथा का ख़ात्मा मुसलमानों ने नहीं किया. बाल-विवाह पर बातचीत मुसलमानों ने नहीं की. लड़कियों की शिक्षा पर बात मुसलमानों ने नहीं की थी. विधवा स्त्री के पुनर्विवाह की लड़ाई मुसलमान नहीं लड़े थे.

क्यों?

क्योंकि ये समस्याएँ हिन्दू समाज की थीं, और उन्हीं में से राजा राममोहन राय, नारायण गुरू, सावित्रीबाई फूले, गांधी जैसे लोग आगे आए और इसे एक सामाजिक आंदोलन बनाया. अंततः ये सारी कुप्रथाएँ समाज से चली गईं, या ना के बराबर बची हैं.

मैंने ट्रिपल तलाक़ पर लिखा, हलाला पर लिखा, हाजी अली में औरतों की एंट्री पर लिखा, पॉलिगेमी पर लिखा. लिखता रहा हूँ, लेकिन आगे लिखने का मन नहीं करता.

क्योंकि जहाँ मैं इन सामाजिक बातों पर लिखता हूँ कोई मुसलमान नाम वाला शख़्स, हमेशा कोई मर्द, मुझे क़ुरान और हदीस पढ़ाने आ जाता है. वो मुझे ये समझाने लगता है कि मुझे मुसलमानों के मुद्दों पर बोलने का कोई हक़ नहीं. कुछ मुझे जान से मारने की धमकी देते हैं, कुछ माँ-बहन की गाली, कुछ दोगला बोलते हैं.

मैंने आमतौर पर फेसबुक पर ये देखा है कि वही मुसलमान जो तमाम तरह की कविताएँ, अश’आर लिखकर, बाँटकर संवेदनशील होता दिखता है, वो इन सारे सामाजिक मुद्दों पर चुप रहता है.

वो आपको दूसरे धर्मों की समस्याओं पर मुखर होते भी कई बार दिखेंगे. वो लिंक भी शेयर करते मिलेंगे जब जातिवाद की बात होगी. लेकिन जहाँ ये बातें आएँगी तो वो गायब हो जाते हैं.

पता नहीं उन्हें विधर्मी होने का डर सताता है या लगता है कि इस्लाम में मुल्ले जो भी कहते हैं, वो सब सही है. वो शायद ये मानते हैं कि ये सारी ‘सामाजिक’ कुरीतियाँ ‘धार्मिक’ हैं, जिस पर उँगली उठाना क़ुरान के ख़िलाफ़ होना है.

मुझे नहीं लगता कि तलाक़ का मुद्दा इस्लाम का है. हलाला का मुद्दा भी इस्लाम का नहीं है. चार बीवियाँ रखने की बात भले ही बहुत कम हो, लेकिन है तो सही, और ये मुद्दा भी इस्लाम का नहीं है.

ये मुद्दा औरतों का है. ये मुद्दा लड़कियों का है. ये मुद्दा दस करोड़ मुसलमान औरतों का है जिनका मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही ग्रेजुएट हो पाया है.

ये मुद्दा उन दस करोड़ मुसलमानों का है जिनमें से मात्र 37% को सिर्फ किसी भी तरह की स्कूली शिक्षा मिली और जिनकी साक्षरता दर 50% है.

ये उन मुस्लिम महिलाओं का मुद्दा है जो सारे सामाजिक सूचकांक पर पूरे देश की महिलाओं से नीचे हैं. ये मुद्दा उन औरतों का है जिनकी आबादी देश की दूसरी सबसे बड़ी धार्मिक आबादी है.

ये मुद्दा इस्लाम का तो बिलकुल नहीं है. ये मुद्दा उन औरतों का है जिनमें से 88% ने 2015 में हुए दस राज्यों की मुस्लिम महिलाओं पर किए गए सर्वे में कहा था कि वो ट्रिपल तलाक़ की जगह कोर्ट वाले तलाक़ चाहती हैं.

ये उन महिलाओं का मुद्दा है जिनमें से 92% का कहना था कि वो बहुपत्नी प्रथा के ख़िलाफ़ हैं. ये मुसलमानों की आधी आबादी के उन 78% महिलाओं का मुद्दा है जिन्होंने ने माना कि तलाक़ के मामले में उनकी बातों का कोई महत्व नहीं.

लेकिन इन दस करोड़ में जो दस लाख मुस्लिम लड़कियाँ, महिलाएँ ग्रेजुएट हैं, वो अक्सर चुप रहती हैं. और मुझे नहीं लगता कि हिन्दुओं को इनकी वकालत करने की ज़रूरत है. क्योंकि आपकी नीयत कितनी भी साफ़ हो इसकी परिणति हिन्दू बनाम मुसलमान होने में ही है.

आप कितनी भी शिद्दत से, इसे एक लिंग विशेष को सामाजिक न्याय दिलाने के पक्ष में आवाज़ रखिए, ये अंततः ‘अपनी औरतों को संभालो’ ही बनकर आएगा.

और इतिहास गवाह है कि जो भुक्तभोगी है, वो जब तक आवाज़ नहीं उठाता, वो सड़ता रहेगा, मरता रहेगा, पीड़ित होता रहेगा.

आप या हम इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ अपना समर्थन ही दे सकते हैं. लेकिन अगर वही वर्ग जिसे व्हाट्सएप्प पर तलाक मिल रहा हो, जिसकी दलील कोई नहीं सुनता, जिसे हलाला के लिए किसी कठमुल्ले के साथ हमबिस्तर होना पड़ता हो, जो अपने पति को बाँटकर रखने को तैयार हो, वही वर्ग नहीं बोलना चाह रहा तो आप तो कोर्ट में भी उल्लू ही बनेंगे.

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों बन रहे हो? वो ख़ुश हैं इसमें. उनकी सहमति है. नहीं होती तो सड़क पर आना तो छोड़ो, फेसबुक पर भी दो लाइन लिखने से कतराती?

और ऐसी कुप्रथाएँ क्या ऐसे ही चली जाती हैं? या समाज के ख़िलाफ़ खड़े होकर, लगातार लड़ते रहने से जाती है?

जो एसएमएस पर ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ पढ़कर अलग होने की ख़बर हर रोज़ पढ़ सकती है लेकिन अपने ही समाज के लोगों के समर्थन में बोल नहीं सकती, ऐसे लोगों के लिए मैं क्यों अपना समर्थन दूँ? मेरी नीयत तो मुसलमानों को नीचा दिखाने की नहीं है, होती तब तो मज़े लेकर लिखता.

इसलिए हिन्दू भाईयों और बहनों, जैसा कि मुसलमान भाई और बहन चाहते हैं, अपने धर्म पर फ़ोकस करो.

तुम अपने समाज की लड़कियों को सौ प्रतिशत साक्षर बनाओ क्योंकि ऐसा होते ही हर मुसलमान लड़की के पास शिक्षा की रोशनी रातोंरात पहुँच जाएगी.

जातिवाद मिटाओ फिर तलाक की बात करना. क्योंकि तलाक़ की जड़ में हिन्दुओं का जातिवाद ही है. जैसे ही जातिवाद जाएगा, मुसलमान औरतों को तलाक मिलना बंद हो जाएगा.

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