ताओ उपनिषद : आक्रामक नहीं, आक्रांत होना श्रेयस्कर

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अध्याय 69
छद्मावरण
सैन्य रणनीतिज्ञों का यह सूत्र है:
मैं आक्रमण में आगे होने का साहस नहीं करता,
बल्कि आक्रांत होना पसंद करता हूं.
एक इंच आगे बढ़ने के बजाय
एक फुट पीछे हटना श्रेयस्कर है.
उसका अर्थ है: सैन्यदल के बिना कूच करना, आस्तीन नहीं समेटना,
सीधे हमलों से चोट नहीं करना, बिना हथियारों के हथियार-बंद रहना.
शत्रु की शक्ति को कम कर आंकने से बड़ा अनर्थ नहीं है;
शत्रु की शक्ति का अवमूल्यन मेरे खजाने नष्ट कर सकता है;
इसलिए जब दो समान बल की सेनाएं आमने-सामने होती हैं,
तब जो सदाशयी है, झुकता है, वह जयी होता है.

बौद्ध कथा है, एक बौद्ध भिक्षु गांव से गुजरता है. एक वेश्या ने देखा; मोहित हो गई. संन्यासी और वेश्या दो छोर हैं विपरीत, और विपरीत छोरों में बड़ा आकर्षण होता है. वेश्या को साधारण सांसारिक व्यक्ति बहुत आकर्षित नहीं करता; क्योंकि वह तो उसके पैर दबाता रहता है, वह तो सदा दरवाजे पर खड़ा रहता है कि कब बुला लो.

वेश्या को अगर आकर्षण मालूम होता है तो संन्यासी में, जो कि ऐसे चलता है रास्ते पर जैसे उसने उसे देखा ही नहीं. जहां उसका सौंदर्य ठुकरा दिया जाता है, जहां उसके सौंदर्य की उपेक्षा होती है, वहीं प्रबल आकर्षण होता है, वहीं पुकार उठती है–चुनौती! वेश्या बड़ी सुंदरी थी.

उन दिनों भारत में एक रिवाज था कि गांव की या नगर की जो सबसे सुंदर युवती होती उसका विवाह नहीं करते थे, क्योंकि वह ज्यादती होगी गांव के साथ. कोई एक उसका मालिक हो जाए–बड़े समाजवादी लोग थे–इतनी सुंदर स्त्री का एक मालिक हो जाए तो सारा गांव जलेगा. इस झगड़े को खड़ा करना ठीक नहीं. इसलिए सबसे सुंदर लड़की को नगरवधू की तरह घोषित कर देते थे कि वह सारे गांव की पत्नी है. वेश्या का वही मतलब. और उसका बड़ा सम्मान था, बड़ा आदर था. क्योंकि सम्राट भी उसके द्वार पर आते थे. वह नगरवधू थी. आम्रपाली का तुमने नाम सुना, वैसी ही नगरवधू वह भी थी.

भिक्षु वहां से गुजर गया. वह द्वार पर खड़ी थी. भिक्षु की आंख भी न उठी; वह कहीं और लीन था, किसी और आयाम में था, किसी और जगत में था. वह भागी, भिक्षु को रोका. रोक लिया तो भिक्षु रुक गया, लेकिन उसके चेहरे पर कोई हवा का झोंका भी न आया, आंख में कोई वासना की दीप्ति न आई. वह वैसे ही खड़ा रहा.

उस वेश्या ने कहा, क्या मेरा निमंत्रण स्वीकार करोगे कि एक रात मेरे घर रुक जाओ? उस भिक्षु ने कहा, आऊंगा जरूर, लेकिन तब जब जरूरत होगी. वेश्या तो कुछ समझी नहीं, वह समझी कि शायद भिक्षु को अभी जरूरत नहीं है. भिक्षु कुछ और ही बात कह रहा था. और ठीक ही है, भिक्षु और वेश्या की भाषा इतनी अलग कि समझ मुश्किल. दुखी, पराजित, क्योंकि यह पहला पुरुष था जिसने निमंत्रण ठुकराया था, वह लौट गई. लेकिन जीवन भर यह याद कसकती रही, घाव की तरह पीड़ा बनी रही.

उम्र ढल गई. कितनी देर लगती है उम्र के ढलने में? सूरज जब उग आता है तो डूबने में देर कितनी? जवानी आ जाती है तो कितनी देर रुकेगी? वह बुढ़ापे का पहला चरण है. बुढ़ापे ने द्वार पर दस्तक दे दी जवानी के साथ ही. जल्दी ही शरीर चुक गया; वह स्त्री कोढ़ग्रस्त हो गई. उसका सारा शरीर भयानक रोग से भर गया. उसके शरीर से बदबू आने लगी. जिन्होंने उसके द्वार पर नाक रगड़ी थी, जो उसके द्वार पर खड़े प्रतीक्षा करते थे क्यू लगा कर, उन्होंने ही उसे निकाल गांव के बाहर फेंक दिया. दुर्गंध से भरी स्त्री की कौन फिकर करता है? सौंदर्य भयानक कुरूपता में बदल गया.

जिस शरीर में स्वर्ण काया मालूम होती थी, वह काया देखने योग्य न रही, वीभत्स हो गई. आंख पड़ जाए तो दो-चार दिन ग्लानि होती रहे, वमन की इच्छा हो. गांव के बाहर फेंकने के सिवाय कोई उपाय न रहा. अमावस की रात; वह प्यासी गांव के बाहर मर रही है. वह पानी के लिए पुकारती है. किसी का हाथ बढ़ता है अंधेरे में और उसे पानी पिलाता है. और वह पूछती है, तुम कौन हो?

बीस साल पहले की बात, उस भिक्षु ने कहा, मैं वही भिक्षु हूं. मैंने कहा था, जब जरूरत होगी तब मैं आ जाऊंगा. और मुझे पता था कि यह जरूरत जल्दी ही आएगी. क्योंकि कितने दिन तक शरीर को भोगा जा सकता है? और कितने दिन तक शरीर को बेचा जा सकता है? आज तुझे जरूरत है, मैं हाजिर हूं.

आज वेश्या को समझ में आया कि जरूरत का मतलब भिक्षु की जरूरत न थी. भिक्षु तो वही है जिसकी कोई जरूरत नहीं है. लेकिन इस क्षण में ही, उस भिक्षु ने कहा, अब तू पहचान सकेगी कि तुझे कौन प्रेम करता है. वे जो तेरे द्वार पर इकट्ठे होते रहे थे उनका तुझसे कोई भी प्रयोजन न था; वे अपने को ही प्रेम करते थे. तुझे भोगते थे पदार्थ की तरह, वस्तु की तरह. उन्होंने तेरी आत्मा को कभी कोई सम्मान न दिया था. और प्रेम तो तभी पैदा होता है जब तुम किसी की आत्मा को सम्मान देते हो.

लेकिन वैसा प्रेम तो पैदा कैसे होगा? तुमने अभी अपनी ही आत्मा को सम्मान नहीं दिया तो तुम दूसरे की आत्मा को तो पहचानोगे कैसे? सम्मान कैसे दोगे? तो प्रेम तो इस जगत में कभी-कभी घटता है जब दो आत्माएं एक-दूसरे को पहचानती हैं. यहां तो अपनी ही आत्मा को पहचानना इतना दूभर है, इतना मुश्किल है, कि कठिन है यह संयोग कि दो आत्माएं एक-दूसरे को पहचान लें.

मनुष्य जान ही नहीं पाता सफलता में कि कभी जरूरत भी पड़ेगी. जब सब ठीक चल रहा होता है, सब तार-धुन बंधी होती है, जीवन की सीढ़ियों पर तुम रोज आगे बढ़ते जाते हो, तब तुम्हें खयाल भी नहीं होता कि ह्रास भी होता है जीवन में. विकास ही नहीं, ह्रास भी. इवोल्यूशन ही नहीं होती दुनिया में, इनवोल्यूशन भी होती है. और तभी तो वर्तुल पूरा होता है.

बढ़ते जाते हो, बढ़ते जाते हो. सदा नहीं बढ़ते जाओगे. बढ़ने में से ही घटना शुरू हो जाता है. एक दिन अचानक तुम पाते हो कि घटना हो गया शुरू. वहीं पहुंच जाते हो जहां से शुरू हुए थे. शून्य से शून्य तक पहुंच जाना है. जो व्यक्ति इसको पहचान लेगा वह आक्रांत होना पसंद करेगा, आक्रमण करना नहीं. क्योंकि शून्य होना नियति है.

यह व्यक्ति के संबंध में भी सच है, राष्ट्रों के संबंध में भी सच है. व्यक्ति तो कभी-कभी हुए हैं, कोई बुद्ध, कोई लाओत्से, जिसने आक्रांत होना पसंद किया, लेकिन आक्रमण करना नहीं. राष्ट्र अब तक ऐसे नहीं हुए हैं. इसलिए दुनिया में कोई भी राष्ट्र धार्मिक नहीं है. लोग सोचते हैं कि भारत धार्मिक है, गलत खयाल है.

कोई राष्ट्र अब तक धार्मिक नहीं हुआ. अभी तो कभी-कभी व्यक्ति ही हो पाए हैं बड़ी मुश्किल से; राष्ट्र का होना तो करीब-करीब असंभव मालूम पड़ता है. करोड़-करोड़ लोग कैसे धार्मिक हो पाएंगे? राष्ट्र तो राजनैतिक ही रहे हैं. और राष्ट्र तो चाणक्य और मैक्यावेली से ही राजी हैं, लाओत्से से राजी नहीं हैं.

तो दिल्ली में जहां राजनीतिज्ञ रहते हैं, उसका नाम हमने चाणक्यपुरी रखा हुआ है. जिन्होंने रखा सोच कर ही रखा होगा. उनको कुछ याद न पड़ा और कोई नाम. चाणक्य की स्मृति आई. वे सब चाणक्य हैं छोटे-मोटे, छुटभैया; बहुत बड़े चाणक्य भी नहीं हैं. लेकिन रास्ते पर तो वही हैं; रास्ता वही है–आक्रमण का, दूसरे को मिटा डालने का.

दूसरे को मिटाने में एक आभास होता है; और वह आभास कि मैं न मिट सकूंगा. जब भी तुम दूसरे को मिटाते हो तब तुमको अपने शाश्वत होने की भ्रांति होती है. तुम सोचते हो कि देखो, मैं तो मिटा सकता हूं, मुझे कौन मिटा सकेगा? इसलिए तो आक्रमण में इतना मजा है, इतना रस है.

लेकिन तुम मिटोगे. नेपोलियन, सिकंदर, हिटलर, कोई भी बचता नहीं. और तब तुम्हारी सब विजय की यात्राएं पड़ी रह जाएंगी. तुम मिटोगे. लेकिन जब तुम किसी को मिटाते हो तो क्षण भर को ऐसी भ्रांति होती है कि तुम्हें कौन मिटा सकेगा! तुम अपराजेय हो, तुम्हारी जीत आखिरी है. लेकिन ऐसी भ्रांति तुम्हीं को होती है, ऐसा मत समझना. सदा से होती रही है. और भ्रांति एक न एक दिन टूट जाती है. क्योंकि मौत तुम्हारी भ्रांतियों को नहीं देखती; मौत में तो वही बचता है जो सच्चा है. मौत परीक्षा है. सब झूठ गिर जाता है.

तो मौत सिकंदर को भी गांव के साधारण आदमी के साथ बराबर कर देती है. मौत भिखारी और सम्राट को बराबर कर देती है. दोनों एक से पड़े रह जाते हैं. सम्राट और भिखारी की लाश में रत्ती भर भी तो फर्क नहीं होता; दोनों धूल में पड़ जाते हैं और दोनों धूल में गिर जाते हैं.

उमर खय्याम ने कहा है, डस्ट अनटू डस्ट. धूल धूल में गिर जाती है. और धूल अमीर की कि गरीब की, कोई भी तो अंतर नहीं है. क्या तुम किसी मरे हुए आदमी की लाश से पता लगा सकोगे कि यह सम्राट था कि भिखारी था? अमीर था कि गरीब था? सफल था कि असफल था? मौत उस सब को तोड़ देती है जो तुमने सपने की तरह बनाया था.

लाओत्से कहता है, आक्रांत हो जाना बेहतर, आक्रमण करना बेहतर नहीं.
और अगर तुम आक्रांत होने की कला सीख जाओ तो शत्रु भी तुम्हें मित्र ही मालूम पड़ेगा. क्योंकि जिसने तुम्हें मिटाया उसने ही तो तुम्हें बोध दिया उसका जो मिट नहीं सकता है. तब तुम शत्रु को भी धन्यवाद दोगे. अभी तो हालत ऐसी है कि मरते वक्त तुम मित्र की भी शिकायत ही करोगे. क्योंकि जब सब छूटने लगेगा तब तुम्हें लगेगा, जो संगी-साथी थे सब व्यर्थ, जिन्होंने सहारा दिया सब व्यर्थ, जो हमने किया वह सब व्यर्थ, समय यों ही गंवाया, कमाई कोई भी न हो सकी. लेकिन जो आक्रांत होने को राजी है, जो हार जाने को राजी है–बहुत कठिन है हार जाने को राजी होना, इसलिए तो धर्म कठिन है–लेकिन जो हार जाने को राजी है वह उसे पा लेता है जिसकी फिर कोई हार नहीं. आक्रांत ही किसी दिन विजेता हो पाता है. ऐसे विजेताओं को हमने जिन कहा है–बुद्ध को, महावीर को–कि उन्होंने जीत लिया. और जीता उन्होंने हार कर.
“सैन्य रणनीतिज्ञों का यह सूत्र है: मैं आक्रमण में आगे होने का साहस नहीं करता, बल्कि आक्रांत होना पसंद करता हूं.’

मिट जाना बेहतर है मिटाने की बजाय. क्योंकि जितना तुम मिटाते जाओगे उतनी ही तुम्हारी भ्रांति मजबूत होती चली जाती है. मिटा देने दो सारी दुनिया को तुम्हें; तुम राजी हो जाओ मिटने से. और तुम अचानक पाओगे कि तुम्हारे भीतर कुछ बच रहा है जो कोई भी नहीं मिटा सकता.

उसकी पहली दफा तुम्हें स्मृति आएगी. जब जो भी मिट सकता है मिट गया, जो भी हार सकता है हार गया, जो भी खोया जा सकता है खो गया, तब तुम्हें पहली दफा उस परम धन का स्मरण आएगा जिसे न कोई छीन सकता, न कोई मिटा सकता. तुम पहली दफा इंद्रधनुष से हटे और आकाश की तरफ तुम्हारी दृष्टि मुड़ी.

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