भारत के हिंदुओं के लिए पूरा देश ही बना है सिंहगढ़

सिंहगढ़ पुणे के नजदीक एक महत्व का किला है, जिसका मूल नाम कोंढाणा (कोंडाना) था. मिर्जा राजा जयसिंह के साथ जो सुलह करनी पड़ी थी उसमें यह किला मुगलों को देना पड़ा था।

रोज अपनी नजर के सामने मुगल निशान देखना एक असह्य बात थी शिवाजी महाराज के लिए. उन्होने यह बात बोल दिखाई.

उस समय उनके पास उनके सरदार तानाजी मालूसरे अपने बेटे के विवाह का न्योता ले आए थे। अपने राजा की इच्छा जानकर बोल उठे कि ये ज़िम्मेदारी मेरी.

शिवाजी महाराज ने उन्हें परावृत्त करने की कोशिश की. पहले बेटे का विवाह तो करा दीजिये, बाद मे आप ही को यह मुहिम सौंपते हैं, दूसरे को नहीं देंगे, कुछ और दिनों से क्या होगा।

तानाजी जिद पर आ गए और उनका जवाब अमर हो गया – आधी लगीन कोंढाण्याचं, मग माझ्या रायबाचं – पहले विवाह कोंढाणा का, बाद में मेरे रायबा (पुत्र) का !

अजेय दुर्ग था कोंढाणा. रास्ते कम ही थे और पूरी तरह सुरक्षित किए गए थे. किले की एक बाजू पर गहरी खाई थी, नीचे घना जंगल. वहाँ से कोई आए यह सोचा भी नहीं जा सकता था इसलिए वहाँ पहरा नहीं था.

रात के घने अंधेरे में वहीं से मराठे चढ़े, गोह की पूंछ में रस्सी बांधकर सब से पहले चढ़े खुद तानाजी मालूसरे. पहरा नहीं था तो और रस्सी फेंकी, आनेवालों ने भी और फेंकी.

और देखते ही देखते मराठा दल ऊपर आ गया. मारकाट चालू हुई, मुगल सेना भी जवाब देने लगी। किलेदार उदयभानु के साथ द्वंद्वयुद्ध में तानाजी और उदयभानु, दोनों ही खेत रहे।

अपना नेता गिरा देखकर मराठा सैनिक हताश हुए और जान बचाकर भागने की सोचने लगे। तब तानाजी के छोटे भाई सूर्याजी ने बाजी संभाली.

सैनिकों को संबोधित किया कि कायरों की तरह पीठ दिखाओगे तो मौत के बाद तानाजी को स्वर्ग में क्या मुंह दिखाओगे ? बच भी गए तो समाज में भी आप के नामों पर कालिख ही मढनी है। वैसे भी पीछे खाई है, लड़ने के सिवा आप के सामने दूसरा रास्ता नहीं है.

उनके मामा जो शेलारमामा के नाम से प्रसिद्ध हुए, बोल उठे कि रस्सियाँ मैंने कब की काट दी हैं, उतरने का रास्ता रखा नहीं। अब दुश्मन को हराकर ही जान बचानी है.

मराठे सैनिक लड़े और संख्याबल में अपने से अधिक रही मुगल सेना को हरा दिया। कोंढाणा जीत लिया गया.

तानाजी को खोने का शिवाजी महाराज को बहुत दुख हुआ जिस पर उन्होने कहा कि गढ़ तो आया पर सिंह चला गया।

यह कहानी आप ने अन्यत्र भी पढ़ी ही होगी. अब कृपया लेख का वो अंश दुबारा पढ़िये जिसमें सूर्याजी का उल्लेख हुआ है.

पढ़ लिया? मुझे आप से इतना ही कहना है कि आज भारत के हिंदुओं के लिए पूरा देश ही सिंहगढ़ बना है. सूर्याजी से प्रेरणा लेना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य ही हो गया है.

तस्मादुत्तिष्ठ !

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