मुफ़्त और भीख दोनों ही मुश्किल से मिलेगी तब

संभावनाओं की दुनिया में, वर्तमान का विश्लेषण कर के भविष्य का आंकलन करना बड़ा मुश्किल होता है.

यह तब और भी मुश्किल हो जाता है जब राष्ट्र के भविष्य की संभावनाओं के आंकलन में आपका स्थायी आधार एक व्यक्ति की जीवन यात्रा और उसके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक प्रालेख पर आधारित होता है.

इन आंकलनों के सत्य होने में कई बाह्य तत्वों का भी समावेश होता है जिस पर किसी का नियंत्रण तो नहीं होता है लेकिन आप इन तत्वों के चरित्र और उनकी प्रतिक्रिया का आंकलन वैश्विक जगत के काल और भौगोलिक स्थिति के अनुसार कर लेते है.

इसलिए यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि मेरे आंकलन सदैव सत्य ही हों लेकिन इतना अवश्य है कि वह आपके वर्तमान को भविष्य के लिए तैयार रखते है.

औरों की तरह मैंने भी समय-समय पर, भारत के भविष्य की रूपरेखाओं को, इस आशय से लिपिबद्ध किया है जिससे लोगों में आशा का संचार हो और लोग नकारात्मकता का त्याग कर, वर्तमान की दुविधाओं से अपने को दूर रख सके.

आज से 2 वर्ष पूर्व, 17 मई 2015 को मैंने ऐसा ही कुछ आंकलन किया था, उसी को मैं 2 वर्षो बाद सामने रख रहा हूँ.

इसको मैं इसलिए दोबारा लिख रहा हूँ, क्योंकि कई मित्र मोदी सरकार के 3 वर्ष के कार्यकाल की सफलता और असफलता पर नम्बर दे रहे हैं.

मैं इस प्रतियोगिता में शामिल नहीं हूँ क्योंकि मेरे अनुसार, इसका इस तरह से 2019 से पहले आंकलन करना असामयिक होगा.

दो साल पहले ये लिखा था –

मोदी जी के प्रधानमंत्री बने हुये एक साल हो चुके हैं और इस एक साल में परिवर्तन की स्पष्ट आहट भी सुनाई देनी लगी है.

हां, यह अलग बात है कि जिन्होंने मोदी को वोट ही नहीं किया है उनके कानों को वो आहट नहीं सुनाई पड़ रही है.

उसका कारण भी बड़ा स्पष्ट है, क्योंकि वो या तो मानसिक रूप से बहरे हैं या फिर कान में हेडफोन लगाये पुराने नारों को ही अभी तक सुन रहे हैं.

बदलाव के आहट की आवाज़ कुछ उन लोगों ने भी नहीं सुनी है जिन्होंने मोदी जी को अलादीन का जिन्न समझ कर वोट दिया था.

मुझे जो कहना है वह उन्हीं लोगों से कहना है, जो 16 मई 2014 से रोज अलादीन के चिराग को रगड़-रगड़ कर के, जिन्न के प्रगट होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

भाई मेरे, आपने मोदी को वोट कितने सालों तक काम करने को दिया है?

जब हमने 5 सालों के लिए मोदी जी को भारत का नेतृत्व करने के लिए चुना है तो यकीनन 67 सालों में, हमारी आत्माओं में जो चोरी, अकर्मण्यता और मुफ्त में सब मिल जाने कि प्रवृत्ति को, राष्ट्र की आत्मा से खुरचने में कुछ तो समय लगेगा ही!

जिस शिद्दत से हम आज मोदी के दिन, महीने और साल का हिसाब ले रहे हैं, यदि इसी शिद्दत से हमने और हमारे बुजर्गो ने पिछली सरकारों से हिसाब लिया होता तो शायद आज आलम ए गुलशन कुछ और हुआ होता.

खैर विषाद न करें, 2016 में आप मोदी जी को खुल के गाली दे सकते हैं क्योंकि धरातल पर परिणाम, 2017 के अंत से पहले, नहीं आने वाले हैं.

एक बात और है कि उस वक्त का फायदा वही उठा पायेगा जो सजग रहेगा और हाथ पर हाथ न बैठ कर, अपना खून और पसीना जलायेगा.

मुफ़्त और भीख दोनों ही मुश्किल से मिलेगी.

अपनी काबिलियत पर भरोसा कर के, आप गांडीव उठा लीजिये नहीं तो बस बैठ-बैठे निष्प्राण मंत्रों का जाप ही करते रह जाएंगे.

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