अटल बिहारी वाजपेयी : दूसरों को राजधर्म निभाने का उपदेश देने से पहले उस पर अमल करने वाले

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ये तस्वीर ठीक 21 बरस पहले की है, यानी 16 मई 1996 की, जगह थी- 6, रायसीना रोड, नयी दिल्ली. भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह माननीय अटलजी उस दिन पहली बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने अपने आवास से राष्ट्रपति भवन के लिए रवाना होने वाले थे.

आखिर ऐसी कौन-सी बात रही होगी कि मुझ जैसे एक युवा और अदने-से पत्रकार की बात को इतनी गंभीरता से सुनने के लिए उन्हें अपनी गर्दन झुकाने में भी कोई गुरेज़ नहीं हुआ!

जी हाँ,उसी दिन देश की राजनीति को बदलकर रख देने वाला दिल्ली हाइकोर्ट का एक अहम् फैसला आने वाला था. कोर्ट के इस फैसले का अटलजी या BJP से कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं था लेकिन इस फैसले के आधार पर ही अटलजी को यह तय करना था कि वे नैतिकता और ईमानदारी के रास्ते पर चलें या फिर सांसदों की खरीदफरोख्त करके पांच साल तक जोड़तोड़ की सरकार चलायें. लिहाज़ा वे चाहते थे कि कोर्ट के निर्णय की कॉपी उन्हें तुरंत उपलब्ध् हो… 21 बरस पहले आज की तरह से न्यूज़ चैनल की भरमार नहीं थी….

चूँकि झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड के मुक़दमे से मैं शुरू से ही जुड़ा हुआ था और इसके हर पहलू से अटलजी को अवगत कराना, तब मानों मेरे प्रोफेशन का एक हिस्सा बन चुका था. मेरे वकील दोस्त रविंदर कुमार ने यह मुकदमा दायर किया था और इसकी पैरवी की थी, वरिष्ठ वकील मरहूम P.N.Lekhi साहब ने जिनकी बहू नई दिल्ली की सांसद हैं.

खैर,16 मई को कोर्ट ने अपना विस्तृत फैसला तो सुरक्षित रख लिया लेकिन CBI को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि वह इस केस में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव को मुख्य अभियुक्त बनाते हुए नई FIR दर्ज़ करे. देश की राजनीति के लिए यह चौंकाने वाला फैसला था लेकिन उससे भी ज्यादा झटका अटलजी और bjp के लिए था.

छोटे दलों के समर्थन के बाद भी पार्टी के सबसे काबिल प्रबंधक दिवंगत प्रमोद महाजन सवा दो सौ सांसदों का समर्थन जुटा पाये. लगभग 50 सांसदों के समर्थन की दरकार थी, तभी सरकार बच सकती थी.

दक्षिणी दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में सरकार को बचाने का पूरा इंतज़ाम भी था. मुंबई के एक नामी Corporate House ने 250 करोड़ की रकम भेज दी थी. इतने सांसद भी बिकने को तैयार थे जो सरकार बचा लें. अटलजी के कुछ ख़ास सिपहसालार भी यही चाहते थे.

अगर कोई नहीं चाहता था, तो वह सिर्फ अटलजी थे जिन्होंने 27 मई की रात अपने सबसे करीबी सहयोगियों और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में ऐलान कर दिया कि वह कल सुबह लोकसभा में भाषण देने के बाद अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौप देंगे.

अटलजी को मनाने की सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. अपने फैसले पर अटल, अटलजी का कहना था कि ऐसी एक क्या, मैं दस सरकारें कुर्बान कर दूंगा लेकिन एक बेईमान और भ्रष्टाचार की बैसाखी पर चलने वाली सरकार का मुखिया कभी नहीं बनूँगा.

राष्ट्रपति ने बहुमत साबित करने के लिए उन्हें 29 मई तक का वक्त दिया हुआ था लेकिन अटलजी ने एक दिन पहले ही 28 मई को यह कहते हुए अपनी 13 दिन की सरकार कुर्बान कर दी.

अटलजी की वह कुर्बानी राजनितिक इतिहास की धरोहर बन गई और मेरे लिए उनकी यह तस्वीरे यादों का अमूल्य दस्तावेज बन चुके हैं..

कौन कर पायेगा अटलजी की बराबरी? दूसरों को राजधर्म निभाने का उपदेश देने से पहले खुद उस पर अमल करके दिखाया.

  • नरेन्द्र भल्ला

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