संविधान की प्रस्तावना का पहला शब्द ‘हम’ का अर्थ इतना सीमित क्यों?

संविधान की प्रस्तावना का पहला शब्द है-   ”हम”
भारत के लोग, भारत को एक… पंथ/धर्मनिरपेक्ष राज्य… बनाने के लिए इस संविधान को स्वंय को समर्पित करते हैं.

संविधान के भाग-4 में राज्य या भारत सरकार को दिये गये नीति निर्देशक तत्वों का विवरण दिया गया है… राज्य से यह आशा की गयी है कि वह अपनी नीतियों और योजनाओ में यथासंभव इन निर्देशो का पालन करेगा… जैसे-

अनुच्छेद 44 भारत के नागरिकों के लिये एक समान कानूनी संहिता बनाना.
अनुच्छेद 48 उपयोगी पशुओं जैसे गाय, बछड़़े और अन्य दुधारू तथा वजन ढोने वाले पशुओं के वध को रोकना.

अनुच्छेद 48(क)प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण तथा वन्य जीवों की रक्षा करना.

इसी प्रकार मौलिक कर्तव्य में भी 7वें और 8वें क्रम पर स्पष्ट लिखा है कि-
प्रत्येक नागरिक पर्यावरण की रक्षा करे और उसका संवर्धन करे…
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे…
इसके साथ ही प्रत्येक नागरिक हमारे देश की सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका संरक्षण करे…

संविधान में इतने स्पष्ट उल्लेख होने के बाद भी हाल के समय मे हमारी माननीय न्यायपालिका के कुछ निर्णयो को देखिये-

पहला- सुप्रीम कोर्ट मे तीन तलाक पर सुनवाई के दौरान कहा कि ‘यदि ये धर्म का मामला हुआ तो वो इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा.
तो जो संविधान की प्रस्तावना में “हम” भारत के लोग हैं… वह क्या है…???
“हम” शब्द फ्रांसीसी विचारक/दार्शनिक रूसो के आदर्श इच्छा के सिद्धांत से लिया गया है… आदर्श इच्छा व्यक्ति की वास्तविक इच्छाओं से उपर होती है… और इस आदर्श इच्छा में सभी नागरिकों की सहमति होती है… तो इस “हम”… इसमें सभी नागरिक आ गये हैं.

और सबने मिलकर ही इस संविधान को स्वीकार किया है और इस देश को धर्म/पंथनिरपेक्ष घोषित किया है… इस “हम” में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, पारसी, जैन, यहूदी, आस्तिक-नास्तिक सब आ गये हैं. और सबकी सहमति से ही यह देश पथं/धर्म निरपेक्ष बना है… इसमें सभी धर्मों के अनुयायियों की सहमति है.

तो फिर सुप्रीम कोर्ट यह क्यों कह रहा है कि ‘यदि यह धर्म का मामला हुआ तो वह इसमें  हस्तक्षेप नहीं करेगा’

तो क्या उस “हम” मे सभी नागरिक शामिल नहीं है… क्या रूसो की ‘आदर्श इच्छा’ का सिद्धांत भारत में गलत हो गया… या इस सिद्धांत की सहमति संविधान लागू होते समय सिर्फ हिंदूओं ने दी थी?

दूसरा- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को यूपी सरकार को बूचड़खाने बंद करने के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई के दौरान कहा कि ‘वह मासांहारियों के अधिकार को नहीं छीन सकती’

सरकार बूचड़खानों को लाईसेंस दे और जिनके खत्म हो गये हैं उनका नवीनीकरण करे.

तो फिर संविधान में जो पशुओं, बछड़े, दुधारू जीवो के संरक्षण और पर्यावरण के संरक्षण के जो उपबंध है उनका क्या होगा?

क्या पशु पर्यावरण में नहीं आते… और एक प्राणी के जीवन की कीमत एक आदमी के जीभ के स्वाद के सामने कोई कीमत नहीं रखती?

और जैन बौद्ध मत की अहिंसक परम्पराओं का कोई मोल नहीं?

और संविधान के उपर्युक्त सारे उपबंध क्या जुमले थे?

यहां हम माननीय सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक योग्यता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे, लेकिन जितना संविधान आम नागरिकों ने पढ़ा और जाना है… और उसके कारण जो प्रश्न पूरे देश में उठ रहे हैं, उनके उत्तर का समाधान कैसे होगा? कौन करेगा?

क्या सेकुलरिज्म के सिद्धांत पर सिर्फ एक ही धर्म के लोगों ने सहमति दी थी? वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्राकृतिक पर्यावरण, पशुओं, वन्य/दुधारू जीवो की रक्षा के उपबंध की रक्षा का दायित्व भी एक ही वर्ग ने उठाने का वचन दिया था क्या?

प्रश्न और भी है… पर अभी तीन तलाक पर अंतिम निर्णय नहीं आया है और यूपी में भी राज्य सरकार बूचड़खानों को बंद करने के कारणों का उत्तर कोर्ट में रखने वाली है.

पर भारतीय न्यायपालिका जिस तरह से निर्णय दे रही है उससे लगता है कि संविधान के सारे उपबंध और अनुच्छेद उसके लिये कोई मायने नही रखते है… सिर्फ धर्मनिरपेक्षता को छोड़कर.

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