हृदय तरल है, आत्मा वाष्पीभूत रूप, अहंकार पत्थर की तरह जमा हुआ बर्फ

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, हमें हृदय का कुछ पता नहीं चलता; कि हृदय है, इसका भी पता नहीं चलता. तुम यह मत सोचना कि यह होगा किसी और के संबंध में सही; तुम्हें भी पता नहीं है हृदय के होने का. वह जो धक-धक हो रही है वह हृदय की नहीं है, वह तो फेफड़े की है.

वह तो केवल खून के चलने की चाल का तुम्हें पता चल रहा है. हृदय की धक-धक तो तुमने अभी सुनी ही नहीं. उसे तो केवल वही सुन पाता है जो अहंकार की चट्टान को तोड़ देता है. तब जीवन का सारा रूप बदल जाता है. तब तुम कुछ और ही देखते हो. तब यह सारा अस्तित्व अपनी परिपूर्ण महिमा में प्रकट होता है.

क्योंकि तुम्हारे पास हृदय ही नहीं है, वीणा के तार ही टूटे पड़े हैं, अस्तित्व कैसे गीत को गाए? कैसे गाए अपने गीत को तुम्हारे हृदय की वीणा पर? अहंकारी के पास कोई हृदय नहीं होता. अहंकार कीमत मांगता है. और सबसे पहली कुर्बानी हृदय की है. क्योंकि हृदय का अर्थ है तरलता.

तुम जितना हार्दिक आदमी पाओगे उतना तरल पाओगे. इसीलिए तो हम कहते हैं–किसी आदमी में अगर तरलता न हो तो कहते हैं–इसका हृदय पाषाण हो गया, पत्थर हो गया. हम कहते हैं, पत्थर भी पिघल जाए लेकिन इस आदमी का हृदय नहीं पिघलता. यह मुहावरा कीमती है.

यह घटना तब घटती है जब अहंकार इतना मजबूत हो जाता है कि अहंकार के परकोटे में छिप जाता है हृदय, अहंकार के पत्थरों में छिप जाता है. उसका पता ही खो जाता है. वह तुम्हारे भीतर होता है, पड़ा रहता है निर्जीव, निष्क्रिय.

हृदय तरल है, और आत्मा वाष्पीभूत रूप है, अहंकार पत्थर की तरह है जमा हुआ बर्फ. इसलिए अहंकार तुम्हारी खोपड़ी में जीता है, मस्तिष्क में, विचार में. वे सब मुर्दा हैं. अहंकार उन हड्डियों-पसलियों को इकट्ठा कर लेता है. उस अस्थिपंजर–विचारों के अस्थिपंजर–के ऊपर अकड़ कर बैठ जाता है. वहीं उसकी गति है. उससे नीचे, उससे गहरे में उसकी कोई गति नहीं है.

उससे नीचे हृदय है, जहां सब तरल है, पानी की तरह है. और उससे भी गहराई में तुम्हारी आत्मा है जो वाष्प की तरह है, जो कि लीन, शून्य है, जिसको तुम छू न सकोगे, जिसे तुम देख न सकोगे, जिसे तुम मुट्ठी में बांध न सकोगे, जिसका कोई स्पर्श नहीं हो सकता और न कोई दर्शन हो सकता है. क्योंकि तुम ही वही हो.

और जिसे भी अंतर्यात्रा करनी हो, उसे पहले मस्तिष्क की बर्फ पिघलानी पड़ती है. उसके पिघलने पर पहली दफा तरल हृदय का पता चलता है. फिर तरल हृदय को भी तपश्चर्या, योग, ध्यान से वाष्पीभूत करना होता है. और जैसे-जैसे तरल हृदय वाष्पीभूत होने लगता है, तुम्हें पहली दफा आत्मा के आकाश का अनुभव होता है. सब द्वार गिर जाते हैं, सब दीवालें मिट जाती हैं.

अनंत आकाश है. जितना अनंत आकाश तुमसे बाहर है उतना ही अनंत आकाश तुम्हारे भीतर है; उससे रत्ती भर भी कम नहीं है. और चांद तारों का सौंदर्य कुछ भी नहीं है जब तुम्हें भीतर के चांद तारे दिखाई पड़ेंगे. तब बाहर के सूर्योदय का कोई भी अर्थ नहीं है, क्योंकि कबीर कहते हैं कि मेरे भीतर हजार-हजार सूरज जैसे एक साथ उग गए हैं.

ओशो,
ताओ उपनिषद भाग #6

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY