कैसे बन सकता हूँ मैं भारत का एक जागरूक नागरिक

हमें भारत के जागरूक नागरिक बनने के लिये सर्वप्रथम भौतिक सम्पदा के साथ ही आध्यात्मिक निष्ठा की भी आवश्यकता है.

आज हमारा समाज आध्यात्मिक विरासत से विलुप्त होता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम अपने आपसे विलुप्त होते जा रहे है. हमारी इच्छाये अनंत है. हमारे लक्ष्य बड़े है. लेकिन इन सबको पाने के लिए हमारे अन्तःकरण में कोई शांति नहीं है. हर समय विचारों की होड़ हमारे अन्तःकरण में है. और अपने से ज्यादा दूसरो से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. अपनी सकारात्मक ऊर्जा दूसरो में खराब कर रहे है. इसके साथ साथ स्वास्थ, शिक्षा और नैतिक दायित्व का सकारात्मक अनुपालन भी जागरूक नागरिक का कर्तव्य है.

हमारा समाज हमेशा से ही अलग अलग रंगो से भरा रहा है. भारत देश की बात जब होती है तो इस देश के समाज निर्माण में सभी जागरूक लोगो का सहयोग रहा है जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी बर्ग, दर्शन शास्त्री, साधु-सन्यासियों, धर्म प्रचारक, योग-अध्यात्म, ध्यान से जुड़े लोग रहे हैं. इस धरती के कण कण में परमात्म तत्व है. हम धरती को भारत माँ कहकर बुलाते हैं. इतना प्यारा है देश. उतने ही प्यारे हैं यहाँ के लोग.

आज समाज दिन प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है. हम सभी आगे बढ़ने की होड़ में इतने आगे आ रहे हैं कि हम सही गलत भूल गए हैं.  क्या सही है क्या गलत है इसको भूलते जा रहे है. अपनी जड़ो को भूल रहे है. मनुष्य की मनुष्यता समाप्त हो रही है. लोग कही न कही भटक रहे हैं. अपने रास्ते पर कुछ ही लोग है जो सही से चल रहे है. बाँकी जिसको जहाँ मौका मिल रहा है. वह अपने लोभ लालच से गलत कामो की तरफ चले जा रहे है. आज जो भी गलत काम कर रहे है और समाज को दिन प्रतिदिन नीचे की तरफ गिरा रहे है वह जागरूक नागरिक कभी नही हो सकते है. ऐसे लोग अपनी प्रकृति से दूर हो रहे हैं.

इन सबका कारण जो हमें लगता है कहीं न कहीं लोगों का अध्यात्म से दूर जाना. लोग अपने आपसे दूर होते चले जा रहे हैं.

प्रश्न ये है कि कैसे लोग अपने को जागरूक करें. अपने आपको भारत का एक जागरूक नागरिक कैसे बनाएं?

यदि बात करे पूरी श्रीमद्भगवत गीता की तो बहुत ही सरल तरीके से इस प्रश्न का उत्तर है कि मनुष्य कैसे “जागरूक मनुष्य” हो सकता है लेकिन जो हमे समझ आया और हमने अनुभव भी किया.

श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 का 62वा श्लोक में लिखा –

“तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत.
तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वत्म्.

“सम्पूर्ण भाव से उस ईश्वर को प्राप्त हो. उसके कृपा मात्र से तू परम शक्ति पायेगा. ध्यान करना है तो हृदय देश में करे. ईश्वर का निवास स्थान हृदय है. वैसे तो हर जगह व्याप्त हूँ. लेकिन हृदय में आसानी से प्राप्त होता हूँ.

हमारा मानना है कि एक जागरूक मनुष्य होना तो दूर की बात है. हम एक साधारण मनुष्य भी नहीं बन पाये हैं. जो कि पूरे भारत वर्ष के लिये एक चिंता का विषय है. आज समाज में बढ़ रहे अपराध, गलत कामों की तरफ जाना लोगों की मानसिकता दिखाती है कि आज हम में से अधिकतर लोगों के अधिकतर निर्णय मन के द्वारा होते हैं. जो कि कहीं न कहीं आगे चलकर गलत होते हैं.

हृदय से निर्णय लेना आ गया तो स्वयं के लिए तो ठीक है पूरे समाज के लिए भी ठीक होता है. ये तभी सम्भव है जब हम आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सोचने लगते हैं. तभी हम भारत के एक जागरूक नागरिक बन सकते हैं. जब हम एक जागरूक नागरिक बनते हैं तो समाज में चारो तरफ अच्छे काम होते है. सकारत्मक ऊर्जा का ही संचार होता है.

एक जागरूक नागरिक कभी अपने आप में सीमित नहीं हो सकता है. उसकी सोच पूरी मानवता के लिये होती है. सभी में अपने भाई बहन देखेगा. सभी के लिये प्रेम भाव आयेगा.

सार ये है कि आध्यात्मिकता एक सकारात्मक दृष्टिकोण देती है. दृष्टिकोण से हमारा चित्त जागरूक होता है. जब चित्त जागरूक होता है तो हम समाज को सकारात्मक नजरिये से देखते हैं. जब हम समाज को सकारात्मक नजरिये से देखने लगते हैं तो जो जरूरी है वही होता है.

एक जागरूक नागरिक हर पहलू पर चाहे वह सामाजिक चिंतन, आर्थिक चिंतन, राजनीतिज्ञ चिंतन, आध्यात्मिक चिन्तन कुछ भी हो सभी पर अपनी नजर रखता है.

एक जागरूक नागरिक स्वार्थी नहीं होता है.

कर्म की प्रधानता के प्रति निष्ठा से सजग, समर्पित रहते हुए परिवार और राष्ट्र हित में सहभाग करते हुए जीवन लक्ष्य पर अग्रसित रहना जागरूक नागरिक में ही आता है.

जिन क्षेत्रो में जागरूकता की आवश्यकता होती है उनको चिन्हित करते हुए उस पर अमल करते हुए दायित्व निर्वहन करता है.

उसका हर काम अपने अन्तःकरण को पहचानने और समाज की भलाई के लिये चिंतन में जाता है.  हमारा अनुभव है यही एक जागरूक नागरिक की पहचान है.

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