नक्सल सरेंडर पॉलिसी : भला कौन नहीं बनाना चाहेगा ऐसा करियर?

हीरामन गंझू… एक नक्सली… सन् 2002 में जब बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री थे तब इसने सरेंडर किया था… सरेंडर वाला कार्यक्रम हमारे ही स्कूल भूषण हाई स्कूल, नावाडीह के ग्राउंड में हुआ था. सरकार की तरफ से जो ‘नक्सल सरेंडर पॉलिसी’ थी उसके अंतर्गत सुविधाएँ मुहैया करवाई गई थी.

लेकिन तीन साल बाद मने कि 2005 में उसने फिर से ‘रेड ब्रिगेड’ ज्वाइन किया और तब उसको ‘एरिया कमांडर’ के रूप में प्रोमोट भी किया गया… इसको नावाडीह, ऊपरघाट, डुमरी क्षेत्र सौंपा गया…

ये भी बहुत कुख्यात था… गाजर-मूली की तरह लोगों को काट डालता था… इसके बाद वर्ष 2010 में CRPF के 26th बटालियन ने इसे सारूबेड़ा के जंगलों से, जो कि मेरे घर से चार किलोमीटर की दूरी पर है, गिरफ्तार किया.

ये एक सामान्य परिचय हुआ हीरामन गंझू का… लेकिन अब बड़ी रोचक बात बताते हैं इसके संबंध में…

जब ये एरिया कमांडर नियुक्त हुआ था तो इसने एकदम सरकारी स्टाइल में एक फॉर्म निकाला था… नक्सल में सुनहरा करियर बनाने हेतु इच्छुक नवयुवकों के लिए.

गाँव-गाँव फॉर्म पहुँचाया गया था… मेरे भी गाँव आया था… गाँव में जो पुलिस की तैयारी कर रहे थे उसके हाथ में फॉर्म आया था…

उसमें कोई शारीरिक या शैक्षणिक योग्यता की स्पेशल माँग नहीं थी… लम्बू-ठिंगु, मंगरा-बुधना कोई भी फॉर्म भर सकता था… बस इच्छुक होना मांगता…

हाँ, फॉर्म में एक कॉलम था जिसमें लिखा होता था कि “आप किस कारण से ललखण्डिया बनना चाहते है?”

कोई अपना किसी से बदला लेना चाहता हो, कहीं किसी को न्याय नहीं मिला हो, पैसे की तंगी है, रोजगार की समस्या है.. वगैरह-वगैरह…

जो व्यक्ति फॉर्म देने आता था, वो सारी प्रक्रिया समझाता था… उन्हीं की जुबानी…

आपको कुछ नहीं करना है. इच्छुक है तो फॉर्म भरिये और ललखण्डिया में शामिल होइये. फॉर्म भरने के साथ आप हमारे मेंबर हो गए… आपको तीन महीने की ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाएगा… जगह अभी कोई फिक्स नहीं है…

ट्रेनिंग के पहले चिट्ठी भेज दी जायेगी… ट्रेनिंग खत्म हो जाने के बाद सब फ्री… सब अपने-अपने घर-गृहस्थी में लग सकते हो… खेती-बाड़ी किसानी कर सकते हो…

अगर किसी तरह की मदद की जरूरत हुई तो सब पूरा किया जाएगा… घर बनाना है तो कैसा घर बनाना है, कितने रूम का घर बनाना है, सब लिख के दे देना, सभी सामान मिल जाएंगे…

बेटी की शादी करनी है तो कितना खर्चा लगेगा वो सब इस्टीमेट बना के दे देने का, आपको उतने पैसे मिल जायेंगे… बाल-बच्चों के लिए जो भी स्कूल में आप पढ़ाना चाहते हो उसका ब्यौरा दे देने का, बच्चे का स्कूल फीस मिल जाएगी हर महीने… इलाज की भी समस्या हल की जायेगी.

इसके बदले में आपको करना क्या है कि जब भी कमांडर के तरफ से आपको संदेशा आएगा तब आपको हाजिर होना है… मीटिंग में भाग लेना है… कहीं कुछ प्लानिंग की जायेगी और जो जिम्मेदारी सौंपी जायेगी उसको आपको पूरा करना है.

अब ऐसा नहीं है कि आपको केवल ऊपरघाट या झुमरा पहाड़ बुलाया जाएगा.. बल्कि झारखण्ड के अन्य जिलों में भी और झारखण्ड के बाहर कोई भी राज्य में बुलाया जा सकता है. कैसे जाना है, नहीं जाना है, खाना-पीना, रहने की सारी जिम्मेवारी हमारी.

कहीं कुछ प्रॉब्लम नहीं… सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जायेगी. और फिर काम खत्म होने बाद पैसे भी मिलेंगे और फिर उसके बाद आप अपने घर-गृहस्थी में पुनः पहले की तरह रह सकोगे.. जब तक अगला संदेशा न आ जाय.

अगर आप इच्छुक हैं तभी फॉर्म भरिये.

मेरे गाँव से तो कोई नहीं गया… लेकिन ऊपर घाट से बहुत से युवक भर्ती हुए थे और विशेषकर आदिवासी युवक. लेकिन 2010 में हीरामन गंझू की गिरफ़्तारी के बाद अब बहुत कम रह गई इन सब की सक्रियता.

अब कुछ गौर करने लायक बातें… 2002 में सरेंडर किया… मने कि पैसा-वैसा खूब मिला रहा… शायद जमीन भी कुछ दी गई थी… रहने के लिए क्वार्टर जैसा भी कुछ..

लेकिन 2005 में फिर से शामिल हो गया… मतलब कि पैसा खत्म हो गया होगा… ऊपर से इधर इसका प्रोमोशन भी हो गया… वैसे भी कमांडर रैंक वाले नक्सलियों के सरेंडर होने से उन्हें पांच-पांच लाख रूपये मिलते हैं व उनसे कम रैंक वालों को ढाई-ढाई लाख रुपये..

और अगर किसी के ऊपर इनामी राशि रखी गई और वो पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा व आगे चलकर खुद से सरेंडर किया तो वो इनामी राशि भी इन्हीं के खाते में आयेगा. जैसा कि 15 लाख के इनामी कुंदन पाहन के साथ हुआ.

सरेंडर करते ही 15 लाख का चेक मिल गया.. और वो किसी सेलेब्रेटी की तरह वो चेक दिखा रहा था… भाषण भी खूब दिया.

ये सन्देश अच्छा है या बुरा, मैं नहीं जानता… लेकिन एक एंगल से देखिये…

कोई युवक उक्त फॉर्म भरकर नक्सली बन गया… उसकी किसी से ज़ाती दुश्मनी थी… एक आम नागरिक की हैसियत से मार नहीं सकता था… पुलिस-वुलिस कोर्ट-फोर्ट के लफ़ड़े में नहीं पड़ना चाहता..

उसने नक्सली की वर्दी पहन उसका काम तमाम कर दिया… पुलिस रेकॉर्ड में नाम जायेगा कि नक्सलियों ने मार डाला… और कार्यवाही??… घण्टा!!

कोई व्यक्ति विशेष ने थोड़े मारा, नक्सली ने मारा… इसी तरह दो-चार जनों को और टपका दिया… ठेकेदार को ठिकाने लगा दिया… पुलिस वैन उड़ा दिया.. हो गई आपकी पदोन्नति… हो गए इनामी नक्सली…

और जब इसके बाद जब आप सरेंडर करोगे तो फिर सरकार की तरफ से कर्रा माल मिलेगा… इनामी राशि भी मिलेगी… बाल-बच्चे निःशुल्क अच्छे-अच्छे स्कूल में पढ़ेंगे… ग्रेजुएशन तक फ्री में पढ़ेंगे…

आप पर हत्या का कोई दाग नहीं रहेगा… अब आप एक अच्छे और सुधरे नागरिक बन चुके होंगे… आपका रुतबा और कद भी समाज में भयानक रूप से उछाल मारेगा..

आप सीधा इलेक्शन में भी खड़ा हो सकते है..और आपको जबर वोट भी मिलेगा… भला ऐसा करियर कौन नहीं बनाना चाहेगा?

कुंदन पाहन बोल रहा है कि हमने इन सब के चक्कर में अपने जिंदगी के बहुमूल्य 20 बरस गंवाये… अब बाकी का जीवन समाज के कल्याण के लिए व्यतीत करूँगा.

भैया आपने वो बीस बरस गंवाया नहीं, बल्कि इन्वेस्ट किया… और बहुत से ऐसे युवा हैं ऐसे जो अपने जीवन को इस तरह से इन्वेस्ट करना जरूर चाहेंगे.

हीरामन गंझू, तुम कुंदन पाहन क्यों नहीं बन सका रे!? प्रीमेच्योर फोर्स के हत्थे चढ़ गया… थोड़ा और कूदना-फुदकना मांगता था न!!

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