विरोध किसी धर्म का नही, अंधविश्वास से भरी हुई परम्पराओं का है

रोमन कैथोलिक ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने शनिवार को फातिमा, पुर्तगाल मे दो बाल चरवाहो फ्रांसिस्को मार्तो और जेसिंटा मार्तो को संत घोषित किया.

कहा जाता है कि 100 साल पहले इन बिना पढ़े लिखे चरवाहो ने 1917 मे वर्जिन मेरी को साक्षात देखा था. जहां इन्होंने मेरी को देखा था वहां आज फातिमा श्राइन है…

माना जा रहा है कि इन तीन बच्चो को मई से अक्टूम्बर 1917 तक वर्जिन मेरी 6 बार दिखाई दी थी. उस समय जेसिंटा 7 साल, फ्रांसिस्को 9 साल और उनकी कजन लूशिया 10 साल की थी.

‘सेक्चुंरी ऑफ़ अवर लेडी ऑफ फातिमा’ के पास चार लाख लोगों की क्षमता वाले खचाखच भरे मैदान मे पोप फ्रांसिस ने इन्हे संत घोषित किया.

1999 में रोमन कैथोलिक ईसाई समुदाय के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप जॉन पॉल द्वितीय ने भारत यात्रा के दौरान दीपावली के दिन यह कहा था कि ईसाई मिशनरियों और प्रचारकों को एशिया मे जोर शोर से जुट जाना चाहिये.

जिस प्रकार पहली सहस्त्राब्दी में यूरोप व दूसरी सहस्त्राब्दी में अमेरिका व अफ्रीका महाद्वीपों का ईसाईकरण किया गया उसी प्रकार तीसरी सहस्त्राब्दी मे एशिया का ईसाईकरण किया जायेगा और करोड़ो आत्माओं को मुक्ति का मार्ग दिखाया जायेगा.

एशिया और दुनिया के ईसाईरण के लिये चर्च लगातार इस दिशा मे आगे बढ़ रहा है वह अपने मत के प्रचार के लिये उन साधनों का प्रयोग कर रहा है जिसको कि वैज्ञानिक या तर्क के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता.

इन बच्चों को संत घोषित करना भी उसी घटनाक्रम का अगला भाग है. भारत से भी सितम्बर 2016 में मदर टेरेसा को संत घोषित किया गया. पिछले आठ साल मे मदर टेरेसा भारत से चौथी व्यक्ति थी जिनको संत घोषित किया गया था…

वेटिकन ने सारे नियम कानून को तोड़कर मदर टेरेसा को संत घोषित किया था… जैसे 2003 में ‘बिऐटीफिकेशन’ के तहत ‘धन्य’ घोषित किया था.

यद्यपि ये सच था कि मदर आजीवन सेवा कार्यो मे लगी रही थी पर उसके मूल में सेवा नहीं धर्मांतरण प्रमुख उद्देश्य था. इन बच्चो की तरह मदर टेरेसा को भी पहले ‘धन्य’ और बाद मे ‘संत’ उनके सेवाकार्यो के लिये नही वरन् पं. बंगाल की मोनिका बेसरा के पेट का ट्यूमर लॉकेट/प्रार्थना (पति चमत्कार को नकार चुका था) और ब्राजील के इंजीनियर मार्सिलियो का ब्रेन ट्यूमर प्रार्थना से ठीक करने के लिये; घोषित किया गया था.

स्वंय मदर ने आजीवन अपने अंदर इस तरह की चमत्कारिक शक्ति होने का कोई दावा नहीं किया था; बावजूद इसके उन्हें उन घटनाओं के आधार पर ‘संत’ घोषित किया गया जिनको कि वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध करना कठिन था. इसको लेकर काफी विवाद भी हुआ था. पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और वामपंथियो की भूमि की महान सेकुलर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस समारोह की शोभा बढ़ाने गये थे. कल फिर यही प्रक्रिया दोहराई गयी.

संत बनाने की यही प्रक्रिया यदि हिंदू भारत में अपनाते तो सेकुलर, वामपंथी, कांगिये, आपिये और विधर्मी रो रो कर आसमान सर पर उठा लेते. दही हांडी की तरह कोर्ट मे याचिका लगा देते; पर अभी सब मुंह में दही जमाये बैठे हैं.

दूसरी और ईसाई जगत मंगल गीत गा रहा है… पूरी दुनिया मे अधर्म का नाश और धर्म का प्रचार हो रहा है.

बेचारे निर्मल बाबा यूहीं बदनाम हो गये… यदि वे हिंदू न होते तो आज वे भी एक बहुत बड़े संत घोषित हो चुके होते.

(यहां विरोध किसी धर्म का नही अंधविश्वास से भरी हुई परम्पराओं का है)

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