मुझे मालूम है क्योंकि मैंने लड़ाई देखी है, लड़ाई लड़ी है

1997 में सोचा नौकरी नहीं करूंगा. 2000 में प्लान बनाना चालू किया. 2002 में मुंबई के नरीमन प्वाईंट स्थित ओबराय ट्राइडेंट की 17वें मंजिल के सी फेसिंग कमरे की खिड़़की से नजारा देखते हुए समुद्र की लहरों ने कहा आज़ाद हो जा. और 2003 में जर्मन कम्पनी के कण्ट्री मैनेजर की नौकरी छोड़कर चण्डीगढ़ से लखनऊ चल दिया.

2007 तक किसी तरह बस जीवन की लड़ाई लड़ते रहे. झोला लेकर राज्य-राज्य, शहर-शहर खाक छानते रहे. फिर एक फ्रेंच कम्पनी से कॉन्ट्रैक्ट हुआ. भारत में कोई उसका नाम तक नहीं जानता था.

2008 बीत गया, एक काम नहीं मिला इस कम्पनी का. फिर एक लीड मिली मोहाली, पंजाब से.

वेण्डर मीटिंग में मशहूर और एकछत्र राज कर रही जर्मन कम्पनी का काम करने वाली कम्पनी का ASM आया था. मीटिंग हुई और हम बाहर निकले. संस्थान की बिल्डिंग मेन गेट से तीन किमी थी, पैदल ही आ रहे थे बाहर.

थोड़ी देर बाद वो ASM कार से आया और गाड़ी रोक कर बाहर तक जाने के लिए लिफ्ट दी. ये यात्रा मोहाली फेज 10 से चण्डीगढ़ सेक्टर 17 बस अड्डे तक हुई.

यात्रा में बातें हुई तो उसने राय दी कि तुम जर्मन कम्पनी से भिड़ नहीं पाओगे. छोड़ो ये सब, बात करता हूं कहो तो लखनऊ में अपनी कम्पनी में जॉब दिलवा दूंगा UP/ UK/ Bihar का एरिया कर लो.

मैंने कहा – थैंक यू सर… कण्ट्री मैनेजर था, और अभी पिद्दी से कम्पनी का MD हूं.

वो जोर से हंसा और वो हंसी मुझे चिढ़ाने वाली थी. वो हंसी और वो राय अक्सर दिखाई और सुनाई देती थी, खौलते पारे की तरह जलाते हुए.

मेहनत करते गए, धीरे-धीरे कई सफलताएं मिलीं और हमने उस जर्मन कम्पनी की चूलें हिला दीं. 2012 में दिल्ली के NPL में काण्ट्रैक्ट पाने के लिए प्रोजेक्ट का टेक्निकल प्रेजेन्टेशन था.

हम गए और वहां हमसे लड़ने के लिए आए थे ASM, MD और जर्मनी से एक टेक्निकल मैनेजर.

मैंने ASM से पूछा, इतने लोग!

उसने कहा – त्रिपाठी जी, आपने फाड़ रखा है और ये प्रोजेक्ट जरूरी है नहीं तो हमारी नौकरी खतरे में पड़ेगी…

उस दिन मैंने मोदी जी से पहले ये लाइन कही थी, “ये डर बने रहना चाहिए, आगे भी…”

हमने अकेले उनको हरा दिया और 2013 में NPL प्रोजेक्ट किए… मैंने लड़ाई देखी है… मैंने लड़ाई लड़ी है…

मैंने ओबराय से रेलवे की डोरमिट्री और वापस ओबराय, हयात और लीला का सफर तय किया है… हवाई जहाज से रेल का जनरल, पैदल और वापस हवाई जहाज पर यात्रा की है…

मुझे मालूम है… मेरा अनुभव कहता है कि अभी मोदी जी डोरमिट्री में घुसकर और गाड़ी पटरी पर रखकर बाहर निकलने के लिए दरवाजे तक आ चुके हैं, सरपट दौड़ में 2-3 साल लग सकते हैं…

हताश, हारे हुए और व्याकुल लोग चिल्ला चिल्ली कर करे हैं, करते रहेगे… वो भारत के ही लोग हैं जिनको ये नहीं मालूम कि वाशिंगटन ने कैसे अमेरिका, नेपोलियन ने कैसे फ्रांस या फिर ली ने कैसे सिंगापुर बनाया. कई वर्षों का समय और बहुत तप तथा पुरूषार्थ लगता है…

मैं आशावादी हूं… मुझे मेरे चुनाव पर पूर्ण विश्वास है… अटल विश्वास… मैं अपने चुनाव के साथ मजबूती से खड़ा हूं और रहूंगा…

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