इल्म का जवाब जहालत नहीं है, इल्म का जवाब इल्म से दीजिये

राम मंदिर पर एक मुस्लिम मित्र ने मुझे समझाया कि अगर आपके भगवान राम में शक्ति होती, ताकत होती, अगर वो सचमुच ईश्वर के अवतार होते तो वो खुद ही बाबर से अपने जन्मस्थान को टूटने से बचा लेते पर ऐसा नहीं हुआ.

ऐसी ही बातें उन्होंनें काशी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के कृष्ण जन्मस्थान के बारे में भी कही.

ऐसे प्रश्नों और स्थितियों का सामना हम सबको करना पड़ता है, ऐसे प्रश्नों पर विचलित मत होइये, न ही कुतर्क करिए. इल्म हर जहालत का उत्तर है.

जब मुझसे ये बात कही गई तो मैंने उनसे कहा कि दिक्कत ये है आपने दुनिया को सिर्फ उसी नज़र से देखा और समझा है जो आपको आपके मजहब ने समझाया है.

ईश्वर की योजनायें समझने का सामर्थ्य सबमें नहीं होता, न मुझमें है और न आप में. इसे समझने का सामर्थ्य बहुत कम लोगों में होता है जो विरले होते हैं पर कुछ है जो हमें और आपको बेहूदा तर्कों का जबाब देने लायक इल्म दे देता है.

आपने राम और कृष्ण जन्मस्थान के बारे में जो कहा है उसका जवाब देने के लिये मैं आपके सामने दो घटनायें रखता हूँ, इनका मुआयना करिये, उम्मीद है आपको जवाब मिल जायेगा या फिर ये भी हो सकता है कि तब यही सवाल शायद मैं आपसे पूछूं.

पहली घटना यूं है,

हजरत मुहम्मद साहब के जन्म से तकरीबन 50-55 दिन पहले की है, ये वो वक़्त था जब खाना-ए-काबा (मक्का) में 360 मूर्तियाँ स्थापित थीं.

अरब के पास का मुल्क है यमन, हुआ यूं कि एक दिन यमन का बादशाह अब्रहा खाना-ए-काबा को तोड़ने के लिए हाथियों का एक विशाल लश्कर लेकर चला. रसूल साहब के पूर्वज अब्दुल मुत्तलिब उस वक़्त खाना-ए-काबा के प्रमुख पुजारी थे.

जब अरब के लोगों को इस हमले का पता चला तो वो लोग अब्दुल मुत्तलिब के पास पहुंचे और कहा, आप अब्रहा को इस गुस्ताखी से रोकिये. अब्दुल मुत्तलिब अब्रहा के पास गए और उससे कहा, कि आपकी सेना ने जो हमारे मवेशी उठा लिये हैं वो हमें वापस कर दो.

अब्रहा को बड़ा ताज्जुब हुआ, उसने अब्दुल मुत्तलिब से कहा, मैं तो आपको बड़ा जहीन आदमी समझता था पर आपकी बात सुनकर आपकी इज्जत मेरी नज़रों में कम हो गई; क्योंकि आप तो निहायत स्वार्थी निकले, मैं आपके देवालय को तोड़ने आया हूँ पर आप अपने भगवान के घर को छोड़कर अपनी मवेशियों की चिंता में लगे है.

अब्दुल मुतल्लिब ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, देखो! मेरा रब अपने घर की हिफाज़त खुद ही कर लेगा.

और ऐसा हुआ भी, दैवीय मदद आसमान से इस रूप में उतरी कि जैसे ही अब्रहा के हाथियों का लश्कर खाना-काबा की तरफ बढ़ा, अचानक कहीं से अबाबील नाम की लाखों छोटी चिड़ियाँ आ गई जिनके पैरों में छोटी कंकड़ी दबी हुई थे.

उन चिड़ियों ने हाथियों पर कंकड़ बरसना शुरू कर दिया और हाथियों में भगदड़ मच गई और मजबूरन अब्रहा को सेना समेत भागना पड़ा. इस पूरी घटना का उल्लेख कुरान के सूरह फील नाम के अध्याय में आया है.

अब एक दूसरी घटना भी सुन लीजिये,

20 नवम्बर, 1979 मक्का में कुछ सौ लोगों का समूह हथियार लिए खाना-ए-काबा में घुस आये, उस वक़्त काबे के अंदर करीब एक लाख नमाजी मौजूद थे.

इन हमलावरों के समूह का नेतृत्व 28 साल का मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह कहतानी नामक एक युवक कर रहा था. उसने हरम के दरवाज़े चारों तरफ से बंद कर दिया और लाउडस्पीकर से ये ऐलान कर दिया कि मैं ही महदी हूँ.

इसके बाद काबा को उसके कब्जे से छुड़ाने के लिए सऊदी हुकूमत को सेना का इस्तेमाल करना पड़ा, जंग 7 दिसंबर तक यानि 17 दिन चली, इस लड़ाई में 75 हमलावर और 60 गार्ड हलाक हुए, 24 हाजी भी मारे गए.

इस पूरी अवधि में खाना काबा में नमाज़, अज़ान, तवाफ़ वगैरह बंद रहे. जो किया सऊदी हुकूमत ने किया, फ्रांस की मदद भी ली गई, अल्लाह के घर में ये सब हुआ पर कोई आसमानी मदद नहीं उतरी.

अब इन दोनों घटनाओं को आधार बनाकर अगर मैं ये कहूं कि जब खाना-ए-काबा में मूर्तियाँ थी तब उसकी हिफाजत के लिए ईश्वर ने दैवीय/ गैबी/ आसमानी सहायता भेजी थी और अब्रहा काबा की मूर्तियों को छू भी नहीं पाया था…

और जब खाना-ए-काबा (आपके अनुसार) को बुतों (मूर्तियों) की गंदगी से पाक कर दिया गया था तब हमलावरों ने 17 दिन तक काबा में तबाही मचाई और अल्लाह की तरफ से कोई दैवीय/ गैबी मदद भी नहीं आई.

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