प्रेम कथा : प्रेम शिखर पर ही होता है, और हम इंसान उसके नीचे

खुदा से बड़ा रंगरेज कोई दूसरा नहीं है वो किसे क्या देता है, क्यों देता है, कब देता है, ये उसके सिवा कोई न जाने. ये सब सिर्फ और सिर्फ वो रब ही जाने. मोहब्बत भी एक ऐसी ही नेमत है खुदा की. हमारी मोहब्बत भी उसी नेमत का एक नाम है, और हाँ न; एक और नाम है उस नेमत का – तुम !!!

:::::::::::: अंत :::::::::::

अक्सर जब मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि तुम नहीं हो…!
कहीं भी नहीं हो….. बस तुम्हारा अहसास है……!
लेकिन क्या ये एक अंत है?
मुझे तो यकीन नहीं है और तुम्हें?

:::::::::::: मध्य :::::::::::

तुम मुझे देख रही थी.
और मैं तुम्हारे हाथों की उंगलियों को.
जाने क्या बात थी उनमें. मुझे लगता था कि तुम अपने हाथ को मेरे सीने से लगाकर कह दोगी कि तुम्हें मुझसे प्रेम है.

पर तुम कम कहती थी. मैं ज्यादा सुनने की चाह रखता था.
शब्द बहुत थे, लेकिन हम दोनों के लिए कम थे.

पहले मैं बहुत ज्यादा सोचता था और चाहता था कि तुम तक ये शब्द पहुँच जाए किसी तरह.
पर प्रेम और जीवन की राहें शायद अलग अलग होती हैं. शब्द अक्सर राहें बदल दिया करते थे. और मैं जीवन की प्रतीक्षा में जीवन को ही बहते देखता था चुपचाप.

मैंने फिर लिख कर तुमसे अपने शब्दों की पहचान करवाई. तुम शब्दों को, मेरे शब्दों को जान जाती थी और समझ जाती थी कि मैं क्या कहना चाहता था. पर फिर भी तुम वो सब कुछ नहीं पढ़ पाती थी, जो मैं अपने शब्दों में छुपा कर भेजता था! हमारा लिखना पढ़ना बेकार ही साबित हुआ!

फिर मैंने कहना शुरू किया और तुमने सुनना. अब तुम मेरे शब्दों की कम्पन को पहचान जाती थी. लेकिन तुमने वही सुना जो मैंने कहा. तुम वो न सुन सकी जो मैं कह नहीं पाया!

और अब अंत में मैंने मौन को अपनाया है. तुम जानती तो होगी कि मौन के भी स्वर होते हैं. तुम सुन रही हो न मुझे मेरे मौन में?

मैं ये भी चाहता था कि सत्य जानो तुम और शायद मुझे भी जानना ही था सत्य! पर मैं चाहता था कि तुम पहले जानो और समझो कि मैं प्रेम में हूँ. तुम्हारे प्रेम में!

लेकिन तुमने प्रेम को पढ़ा था, सुना था और शायद जाना भी था पर समझा था कि नहीं ये मुझे नहीं पता था; क्योंकि तुम मेरे प्रेम को पाकर असमंजस में थी. मैंने कोशिश की पर तुम जान न सकी.

क्योंकि तुम्हें प्रेम में होना पता न था! तुम सिर्फ प्रेम करना जानती थी. पर प्रेम में होना उसके बहुत आगे की घटना होती है और वही घटना मेरे साथ घट रही थी.

समय की गति और मन की गति के दरमियान प्रेम आ चुका था और अब एक बेवजह की जिद है कि प्रेम ज़िन्दगी को जीत ले.

प्रेम शिखर पर ही होता है
और हम इंसान उसके नीचे!
हमेशा ही!

उम्र के और समय के अपने फासले थे. मेरे और तुम्हारे दरमियान. तुम्हारे और मेरे दरमियान. हम दोनों और दुनिया के दरमियान. हम दोनों, दुनिया और ईश्वर के दरमियान! सब कुछ कितना ठहरा हुआ था न. अब भी है. उम्र भी रुकी हुई ही है, समय भी ठहरा हुआ है और ज़िन्दगी भी रुकी हुई है!

– Vijay Kumar Sappatti

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