जो हाल आर्य गायों की संतानों का है वही आर्य पुरुषों की संतानों का है

गाय तब और अब : एक समय यह कविता थी. हमने उसे स्मारक में बदल डाला है. गाय की दुर्दशा भारत की दुर्दशा का रूपक है
– राजेन्द्र माथुर

श्री राजेन्द्र माथुर जी ने नई दुनिया (इंदौर) अखबार में 1965 में एक लेख लिखा था, जो गाय पर जनसंघ की उन दिनों चल रही राजनीति के सन्दर्भ में था. यह अनेक बार गाय पर होती रही राजनीति पर छपता रहा है और अब तक आखिरी बार नवभारत टाइम्स में उनके जन्मदिवस पर 2006 में प्रकाशित हुआ था.

आजकल गाय पर फिर से राजनीति चल रही है, इसलिए यह लेख एकबार फिर से ताज़ा हो उठा है, एक बार फिर से नज़र दौड़ाइए इसके कुछ अंशों पर, आपको यह लेख आज भी उतना ही प्रासंगिक लगेगा, जितना यह पहली बार 1965 में प्रकाशित होते समय था. पढ़िए इसके कुछ अंश —

“आर्यों के जमाने में गाय एक कविता थी, लेकिन भारत के पतन के साथ वह एक धर्म बन गयी. आर्यों के ज़माने में भारत स्वयं एक महाकाव्य था, जबकि आज जो हिन्दुस्तान हम देखते है, वह उस महाकाव्य का सड़ा-बुसा, फंफूद लगा संस्करण है. जो लोग इस देश में भारतीयता की रक्षा का नारा लगा रहे है, वे दरअसल उस हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहते है, जिसका पिछले हज़ार साल में अचार डल चुका है. वे गलत है, बेहद गलत है. हिन्दुस्तान का उद्धार तो सचमुच तभी होगा, जब हम इन हज़ार वर्षों को अपने दिमाग की बरनी से निकाल फेंकेंगे.

आर्यों के जमाने में गाय इसलिए कविता थी कि वह यायावर युग और कृषि युग के बीच का संधिकाल था. और घुमक्कड़ मानव के लिए खेती स्वयं एक कविता की वस्तु थी. आज हम एक दूसरे संधिकाल की देहरी पर खड़े है, जो कृषि और उद्योग युग का संधिकाल है. क्या पुराने प्रतीकों और उपमानों से हम आज के युग की कविता गढ़ सकते हैं?

भारत में गाय के महत्व के बारे में सबसे अच्छा स्पष्टीकरण प्रसिद्ध लेखक नीरद चौधरी ने दिया है , जिनकी एक किताब ‘ द कॉन्टिनेंट ऑफ़ सरसी ‘ इसी साल प्रकाशित हुई है. श्री चौधरी इस देश को सरसी का महाद्वीप मानते है. यूनानी दंतकथाओं में सरसी एक जादूगरनी का नाम है, जो खुबसूरत द्वीप पर अपने महल में रहती थी. उसके पास ऐसी जड़ी-बुटीयां और जंतर–मंतर थे जिससे वह आदमी को सुअर बना सकती थी.

वे लिखते है कि गाय आर्यों के साथ भारत आई थी. आर्यों का कवि-हृदय इस जानवर की सुन्दरता के प्रति और भी चेतन इसलिए था कि भारत का गर्म मौसम उसके लिए अनुकूल नहीं था. भंगुर-सौन्दर्य का जादू एकाएक कई गुना बढ़ जाता है. आज भी गाय की आँखों में झाँकों, तो एक रहस्यमयी करुणा उसके चेहरे पर नज़र आती है, मानो वह कह रही हो कि मै सरसी के देश निर्वासित हूँ.

इस देश में गाय और आदमी का भाईचारा दरअसल निर्वासितों का भाईचारा है. जनसंघ के अन्धविश्वासी लोग कहते है कि गाय भारतीय संस्कृति की अंग है, तो वे जानते नहीं कि अनजाने में वे कितनी बड़ी सच्चाई कह गए है. दरअसल आज हिन्दुस्तान की वही शक्ल है जो उसकी गायों की है. हम गायों की तरह मरियल है और हमारी हड्डियाँ निकल रही है. जो हाल आर्य गायों की संतानों का है वही आर्य पुरुषों की संतानों का है.

लेकिन भारत के गर्म और आलसी मौसम में कविता ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकती. गाय धीरे धीरे आर्यों का कुल स्मारक बनने लगी और पूजी जाने लगी. जब भावनाएं जड़ एवं भ्रष्ट हो जाती है, तब पूजा शुरू हो जाती है. जब हम कविता की ताजगी और तीव्रता लेते है और उस भावना को बनाए नहीं रख पाते तो हम रूढ़ी अपना लेते है और उस भावना को खोखली श्रद्धांजलि अर्पित करने लगते है, जो किसी समय थी.

अगर हम आज के हिन्दुस्तान में गाय को वही स्थान देना चाहते है, तो पहली जरूरत यह है कि पूजा के घुटन भरे दायरे से निकालकर उसे सौन्दर्य और उपयोगिता के स्तर पर प्रतिष्ठित करें. जिस देश की खेती गिरी हुई हो, जहाँ दूध मिलावट का हो और घी गायब होता जा रहा हो, जहाँ दुनिया की सबसे अधिक गाय सबसे कम दूध देती हो, वहां गौ–पूजा एक बेमतलब, बेजान चीज़ है. गौ–पूजा दरअसल गौ–उपेक्षा का दूसरा नाम है और उसका बहाना है. भारत में जब हमें किसी की उपेक्षा करनी होती है, तो हम उसकी पूजा करना शुरू कर देते हैं… गाय को भी हम माता मानेंगें, लेकिन अपनी उपेक्षा से उसके कंकाल बना देंगें.

गाय के बारे में आजकल जो विवाद चल रहा है, वह दरअसल केवल गाय का नहीं है. प्रश्न यह है कि पतन और विदेशी शासन के हज़ार वर्षों में जो विकृत, कुंठित व्यक्तित्व हमारा बना है, क्या उसे ही हम अपनी विरासत मानते है? हम इतने दिनों से लकवाग्रस्त है कि लकवे को हम विरासत मानने लगे है और जब हमारे अंग–प्रत्यंग में सामान्य स्पन्दन होता है, तो हम समझते है कोई अप्राकृतिक घटना हो रही है. स्वास्थ्य हमें चौंका देता है, क्योंकि बीमारी हमारा स्थायी भाव हो गया है. एक बीमार देश न अपनी रक्षा कर सकता है, न गायों की. ”

(यह पूरा लेख स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर जी के लेख संग्रह – ‘भारत एक अंतहीन यात्रा’ – पुस्तक में भी प्रकाशित है )

– ओम प्रकाश ‘हाथपसारिया’ जी के सौजन्य से

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