पहले टीवी पर विज्ञापन आते थे, आजकल आलिया भट्ट आती हैं!

“फ़ूड एंड बीवरेज” इंडस्ट्री की जायंट कंपनी “पार्ले एग्रो” ने वर्ष 1985 में अपनी “फ्रूटी” लॉन्च की थी. यह ड्रिंक आगे चलकर मैंगो सॉफ़्ट ड्रिंक का पर्याय बनी. इसका मुक़ाबला करने के लिए कोक ने “माज़ा” और पेप्सी ने “स्लाइस” निकाले, लेकिन “फ्रूटी” मैंगो ड्रिंक का पर्याय बनी रही तो बनी रही. “फ्रूटी” के बीस साल बाद यानी साल 2005 में “पार्ले एग्रो” ने “एप्पी फ़िज़” लॉन्च की थी. जाने क्यों, मैंगो ड्रिंक के साथ सफलतापूर्वक बीस साल बिताने के बाद उन्होंने पाया कि भारत की पहली “कॉर्बोनेटेड फ्रूट ड्रिंक” के रूप में एप्पल ज्यूस को लॉन्च किया जाना चाहिए. “एप्पी” चली, लेकिन उतनी नहीं, जितनी कि चलनी चाहिए थी.

और अब जाकर, “पार्ले एग्रो” ने तय किया कि उन्हें मैंगो ज्यूस को “कॉर्बोनेटेड” फ़ॉर्म में पेश करना चाहिए. क्योंकि, यू नो, मैंगो ज्यूस को बच्चों की ड्रिंक माना जाता है और कॉर्बोनेटेड ड्रिंक्स में एक क़िस्म की “सेक्स अपील” होती है. उन्होंने अपनी टैगलाइन बनाई : “फ्रूटी गो फ़िज़्ज़ी.” सनद रहे, फ्रूटी के लॉन्च के बाद 32 साल में पहली बार उसमें नया एडिशन किया गया है. इसके प्रमोशन के लिए सौ करोड़ रुपयों का पैकेज तय किया गया. आईपीएल 2017 के प्रसारण के दौरान इसके आक्रामक प्रचार की योजना बनाई गई. और इसका ब्रांड चेहरा चुना गया, नो प्राइज़ फ़ॉर गेसिंग, यत्र तत्र सर्वत्र आलिया भट्ट को.

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं : एक वे जो “मीडिया इंडस्ट्री” में काम करते हैं और दूसरे वे जो “मीडिया इंडस्ट्री” में काम नहीं करते. दूसरे क़िस्म के लोग मीडिया द्वारा रची गई चीज़ों को “कंज़्यूम” करते हैं. पहले क़िस्म के लोग इन “कंज्यूमर्स” को “सिड्यूस” करने के लिए नित-नए प्रतीक रचते हैं. मीडिया की दुनिया से परिचित व्यक्त‍ि का “वर्ल्ड व्यू” वही नहीं हो सकता, जो कि मीडिया से बाहर के व्यक्त‍ि का होता है. “टीजी” यानी टारगेट ग्रुप क्या होता है, “ब्रांड इमेज” क्या होती है, “यूएसपी” क्या होती है, “कंज़्यूमर सेटिस्फ़ेक्शन इंडेक्स” क्या होता है, क्या बेचा जा सकता है और किस तरह से बेचा जा सकता है, मीडिया का एकमात्र धर्म यही है. शेष बातें लफ़्फ़ाज़ियां हैं.

“फ्रूटी” का टारगेट ग्रुप 5 से 15 वर्ष तक के बच्चे थे, “फ्रूटी गो फ़िज़्ज़ी” का टारगेट ग्रुप 15 से 35 वर्ष तक के नौजवान हैं. आलिया इस वर्ग की चहेती हैं. “मैंगो ड्रिंक्स” में निहित “सेक्स अपील” को इससे पहले “कामसूत्र” से “आमसूत्र” की तुक मिलाकर भुनाया जा चुका था और आम के उपभोग में “फ़ेलशियो” की प्रतीक-योजना निर्मित करने की चेष्टा बाज़ार लंबे समय से करता रहा है. मैंगो ज्यूस ही नहीं, जहां भी बाज़ार को “सेक्स-अपील” के दोहन का अवसर मिलेगा, उसे वह भुनाएगा. और चंद हज़ार प्रबुद्धजन भले ही नाक-भौं सिकोड़ें, लेकिन “सेक्स अपील” में लोगों को मंत्रमुग्ध करने की अचूक क्षमता होती है, लिहाज़ा बाज़ार उसके इर्द-गिर्द घूमता रहेगा.

सन् इकहत्तर में सत्यजित राय की एक फ़िल्म आई थी : “सीमाबद्ध”. अंग्रेज़ी में इसका टाइटिल था : “कंपनी लिमिटेड”. सत्यजित की जिन कुछ फ़िल्मों के बारे में ना के बराबर बात की जाती है, यह उनमें से एक है. जबकि पूर्व-भूमंडलीकृत भारत में “कॉर्पोरेट” की पदचाप सुनने की जिस तरह की कोशिश इस फ़िल्म ने की थी, वैसी फिर नहीं की गई. फ़िल्म का नायक श्यामल सीलिंग फ़ैन बनानी वाली एक कंपनी में सेल्स मैनेजर है. फ़िल्म में एक विज्ञापन फ़िल्म हमें दिखाई जाती है (सत्यजित फ़िल्मों की दुनिया में आने से पहले मार्केटिंग से जुड़े थे और उन्होंने वह विज्ञापन फ़िल्म बनाने में निश्च‍ित ही मज़ा लिया होगा)! विज्ञापन फ़िल्म “एब्रप्टली” ख़त्म होती है. जनरल मैनेजर पूछता है, यह कुछ अजीब नहीं लग रहा? फ़िल्ममेकर कहता है, “यू नो, दैट वॉज़ द डिज़ायर्ड इफ़ेक्ट”. जनरल मैनेजर ख़ुश होकर एड फ़िल्म को ओके कर देता है. चार लोग एक मिनी थिएटर में देखकर यह तय कर लेते हैं कि दूरदर्शन पर समाचार देखने वाला देश “एब्रप्टली” ख़त्म होने वाले विज्ञापनों के लिए तैयार है, क्योंकि यह शब्द उनके कानों को सुनने में अच्छा लगता था और यह उन्हें महत्वपूर्ण होने का अनुभव कराता था.

आज लगभग आधी सदी बाद बाज़ार की दुनिया इतनी बदल गई है कि मिनी थिएटर में बैठकर एड फ़िल्म देखने वाले अपने कानों में गूंजने वाले शब्द सुनकर मुतमईन नहीं हो सकते, उन्हें ना केवल यह सुनना होता है कि “कंज़्यूमर” क्या सुन रहा है, बल्कि यह भी सुनना होता है कि “कंज़्यूमर” क्या सुनना पसंद करेगा. “ठंडा मतलब कोका कोला” इसी तरह से चलता है. “सिर उठाके पीयो” इसी तरह से चलता है. “डर के आगे जीत है” का मिथ इसी तरह से रचा जाता है, क्योंकि वे जानते हैं कि “जीत के आगे क्या है”, यह पूछने वाला सिद्धार्थ गौतम हाल-फ़िलहाल तो कंज़्यूमर के भीतर करवट नहीं बदल रहा है!

और इसके बावजूद, “फ्रूटी गो फ़िज़्ज़ी” की एडफ़िल्म “पॉप” और “किच” कला की डिलाइटफ़ुल बानगी है. हम आलिया को पीले स्कर्ट गाउन में देखते हैं, जो कि मैंगो का “प्रिफ़रेबल कलर” है. सेट डिज़ाइन बहुत “सर्रियल” है और बैकग्राउंड में सभी ऑब्जेक्ट नीले तैलरंग में डूबे हैं. यह “सस्पेंडेड काइनेटिक एनर्जी” में ऊभचूभ करता दृश्य है, जिसके बीच में आलिया अपनी तमाम “जुवेनाइल इरोटिक अपील” के साथ खड़ी मुस्कराती रहती हैं. एक मैंगो की थ्री-डी इमेज “एंटी क्लॉकवाइज़” गति में आलिया की ओर बढ़ती है, वक्ष की तरह सुडौल, जिस पर जैसे एक कुचाग्र. अब स्लो-मोशन में आलिया की भी दौड़ है. दोनों के बीच एक टकराव है, जिससे “फ्रूटी गो फ़िज़्ज़ी” के फ़्यूज़न की उत्पत्ति है, और सहसा ना केवल सेट डिज़ाइन “साइकेडेलिक” रंगों से भर गई है, आलिया की ड्रेस भी यैलो से पर्पल हो गई है. वे नए ब्रांड की टैगलाइन पढ़ती हैं और “विली वोन्का” स्टाइल के ग्लासेस पहनकर “पाउट-मुद्रा” वाला एक अदृश्य चुंबन ऑफ़र करती हैं. परफ़ेक्ट!

“फ्रूटी गो फ़िज़्ज़ी” एड फ़िल्म से हमें तीन बातें पता चलती हैं :

1) जो “फ्रूटी” कल तक ख़ुद को “स्वीट” कहकर बेचती थी वही आज ख़ुद को “सेक्सी” कहकर भी बेच सकती है (यानी मार्केटिंग की रणनीतियां ना केवल आपकी कल्पनाओं का दोहन करती हैं, वे आपकी कल्पनाओं की नई संभावनाओं का निर्माण भी करती हैं)!

2) कॉर्बोनेटेड फ्रूट ड्रिंक्स का दौर अब दहलीज़ पर खड़ा है और जल्द ही कोक और पेप्सी भी इस युद्ध में कूदने वाले हैं. इनकी टैगलाइन होगी : “हम आपकी सेहत का ख़याल रखते हैं, लेकिन हम आपकी सेक्स अपील को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते!

3) और आलिया भट्ट को रोक पाना अब नामुमकिन है. शी हैज़ कॉट द फ़ैन्सी ऑफ़ द नेशन. और ऐन यही कारण है कि पहले टीवी पर विज्ञापन आते थे, आजकल आलिया आती हैं!

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