पहले यह तो तय हो कि तीन तलाक़ इस्लाम का मौलिक हिस्सा है या नहीं?

triple talaq dowry making india

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पहले वह यह तय करेगा कि यह इस्लाम का मौलिक हिस्सा है या नहीं? मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक और निकाह हलाला की कुप्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह बात कही.

चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने साफ कर दिया कि बहुविवाह पर फिलहाल विचार नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह तीन तलाक से जुड़ा मुद्दा नहीं है. न्यायमूर्ति जोसेफ कुरियन, आरएफ नरीमन, यूयू ललित और अब्दुल नज़ीर संविधान पीठ के अन्य न्यायाधीश हैं.

मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान सहित बहुत से मुस्लिम देशों में एक बार में तीन तलाक खत्म हो चुका है. भारत धर्मनिरपेक्ष देश है. यहां भी खत्म होना चाहिए. यह इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है. इसलिए इसे धार्मिक आजादी के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता.

वहीं केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार तीन तलाक को लिंग आधारित भेदभाव मानती है. यह बराबरी के हक का उल्लंघन करता है. इसलिए सरकार तीन तलाक का विरोध करती है.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा, ‘हम विचार करेंगे कि तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है कि नहीं? और यदि है, तो क्या इसे मौलिक अधिकार के तहत लागू कराया जा सकता है?’

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि तीन तलाक धर्म का मौलिक हिस्सा है, तो वह उसकी संवैधानिक वैधता के सवाल में नहीं जाएगा.

पीठ ने सुनवाई की शुरुआती रूपरेखा तय करते हुए कहा कि दो दिन याचिकाकर्ताओं की बहस सुनी जाएगी और उसके बाद दो दिन प्रतिपक्षियों की. फिर दोनों पक्षों को एक-एक दिन जवाब देने के लिए मिलेगा. अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी सोमवार को सरकार की ओर से दलील देंगे.

इस बीच पुणे के मौलाना सैयद शहाबुद्दीन सल्फी फिरदौसी ने कहा है कि मुस्लमानों की पवित्र पुस्तक कुरान में एक साथ तीन तलाक का जिक्र नहीं है. उनके मुताबिक़ एक ही बैठक में तीन दफे ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कहकर पत्नी को तलाक देने का कुरान में कहीं भी नहीं लिखा है.

मौलाना के मुताबिक़, इस तरह से जल्दबाजी में तलाक देना इस्लाम का मजाक उड़ाना है और मुस्लिम महिलाओं पर जुल्म ढाना है. साथ ही उन्होंने कहा, हलाला मुस्लिम औरतों की इज्जत पर डाका डालना और उनकी इज्जत को तार-तार करना है. हलाला का भी इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं.

महाराष्ट्र के सोलापुर शहर के रहने वाले 62 वर्षीय मौलाना सैयद शहाबुद्दीन सल्फी फिरदौसी कहते हैं, अगर पति ने दो तलाक़ जबान से कह कर दे दी और दोनों के बीच फिर भी बात नहीं बनी और तीन महीने का समय बीत गया और दोनों अलग हो गए. फिर भी कुछ समय बाद अगर दोनों चाहें तो फिर से निकाह करके साथ रह सकते हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY