क्या अभी भी लगता है गंगा, 2018 या 2020 तक साफ होगी?

सन 1854 में ब्रिटिश शोषणकाल में ही हरिद्वार में गंगा पर बाँध बना और इसी वक्त से नदी की धारा धीमी पड़नी शुरू हो गई. करीब सौ साल बाद, यानि आजादी के वक्त जब फरक्का बैरेज बना तो उस समय भी इरादा था कि नदी का पानी भागीरथी नदी में डाला जायेगा. नतीजा ऐसा कुछ हुआ नहीं, उल्टा गंगा का पानी खारा होने लगा और आस पास की खेती की ज़मीन भी खराब होने लगी.

इसके अलावा बांग्लादेश और भारत में इस बाँध को लेकर और पानी के बंटवारे के लिए खींच तान हुई. इसके वाबजूद निकट भविष्य में सरकार गंगा पर 300 बाँध बनाने की योजना बना रही है. ये स्थिति तब है जब पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से 34 बांधों को ग्रीन पैनल की रिपोर्ट में ना बनाने का स्पष्ट निर्देश है.

गंगा की सफाई के लिए अप्रैल 1986 में ही राजीव गाँधी सरकार ने “गंगा एक्शन प्लान” की शुरुआत की थी. नौ सौ करोड़ यानि करीब हज़ार करोड़ के फण्ड से शुरू हुई इन योजनाओं का कोई नतीजा नहीं निकलने पर इसे 31 मार्च 2000 को वापिस ले लिया गया.

अब नमामि गंगे नाम की महत्वाकांक्षी योजना के साथ मोदी सरकार ने करीब बीस गुना रकम के साथ गंगा की सफाई को फिर से शुरू किया है. गंगा की धारा का जो भी हो, फण्ड “अविरल” बहते आ रहे हैं.

वैसे गंगा की धारा का क्या हो रहा है ये जानना भी कोई ख़ास मुश्किल नहीं है. सन 1780 से गंगोत्री ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहा है. 1971 के बाद से इसकी गति बढ़ी, पच्चीस साल में ये करीब 850 मीटर पीछे जा चुकी है. इसमें से 76 मीटर सिर्फ 1996 से 1999 के बीच घटा है.

गंगा की धारा को अविरल रखने के लिए हरिद्वार में अवैध खनन रुकवाना जरूरी था. इसके लिए आमरण अनशन करते हुए स्वामी निगमानन्द सरस्वती की मृत्यु हो गई. जून 2011 में उनकी अनशन करते हुए मौत होने पर उनके ही आश्रम के स्वामी शिवानन्द अनशन पर बैठ गए.

आखिर थक हार कर सरकार ने अवैध खनन रुकवाने के लिए प्रशासन को आदेश दिया. अभी के प्रयासों की स्थिति ये है कि हाल में ही एक आर.टी.आई. के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया है कि पहले दो साल के लिए जारी हुए 3700 करोड़ रुपये के फण्ड में से 20% अभी इस्तेमाल नहीं हुआ.

इन योजनाओं का फायदा क्या हुआ है? फायदा ये हुआ है कि 1986 में सरकारी अफसर बताते थे कि भीषण प्रदूषण फ़ैलाने वाले उद्यमों की संख्या 764 है, आज 2017 में भी सरकारी हिसाब से ऐसे उद्यमों की गिनती 764 ही है, ना बढ़ी है ना घटी है.

थोड़े मतभेद भी हैं, जैसे केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कहता है गंगा में 30 नालियाँ मिलती हैं, जो प्रदूषण फैलाती हैं. उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हिसाब से मानें तो ऐसी डेढ़ सौ नालियाँ हैं जो गंगा में प्रदूषित कचड़ा गिराती हैं.

राज्य और केंद्र के अधिकारियों के आपसी समन्वय की स्थिति ये है कि एक मामले की सुनवाई में जस्टिस स्वतंत्र कुमार कह चुके हैं कि आपके जैसे अधिकारी जनता का पैसा बर्बाद करने और बैठ कर कुर्सियां तोड़ने के अलावा कुछ नहीं करते.

आज गंगा के किनारे करीब 40 करोड़ लोग रहते हैं और उनका जीवन सीधे या फिर परोक्ष रूप से गंगा पर निर्भर है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी प्रयास (गंगा एक्शन प्लान 1 और 2) लगातार प्रदूषण की समस्या पर गौर करते रहे, मगर इनका नतीजा कुछ भी नहीं निकला.

अभी तक की जांच के आधार पर ये माना जाता है कि गंगा में जाने वाले कचड़े का करीब 80 फीसदी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों का मल-मूत्र होता है. औद्योगिक कचड़ा दूसरे स्थान पर आता है, यानि वो बीस फीसदी से कम होगा.

गौर करने लायक है कि मल-मूत्र को सीधे गंगा में बहा देने के बदले उसका परिशोधन, उसे खाद में बदलना उसे फायदेमंद, कीमती चीज़ बना देगा. किन्हीं अज्ञात कारणों से इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हुआ है.

सीवर नेटवर्क जो करीब 3600 किलोमीटर से ज्यादा होना चाहिए था, वो अभी करीब 1060 किलोमीटर के लगभग ही है. सवा तीन सौ मिलियन लीटर प्रतिदिन के बदले अभी करीब ढाई सौ मिलियन लीटर प्रतिदिन ही परिशोधित होता है.

एक चीज़ और जो ध्यान में आती है वो ये है कि कई बार संस्थानों को अदालती कार्यवाही तक करनी पड़ी है. जानकारी लेने के लिए मुक़दमे करना समझ में आता है, लेकिन काम करने का आदेश अगर अदालत भी दे तो भी उसे पूरा तो उसी अधिकारी को करना है जो पहले से उसी काम के लिए नियुक्त है.

ऐसे में अगर “मंशा” ही काम करने की ना हो तो कैसे कोई सुधार हो सकता है? मोदी सरकार ने 2020 तक साफ़ सुथरी गंगा देने का वादा कर रखा है.

जल संसाधन मंत्री उनसे भी दो कदम आगे थे, उन्होंने 2018 में ही काम पूरा कर देने का दावा (वादा का उल्टा) ठोक रखा है. अब घड़ी तो किसी के लिए रूकती नहीं मंत्री जी, तो 2017 आधा बीत गया है. अभी भी लगता है गंगा, 2018 या 2020 तक साफ होगी?

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