तो कौन हुआ अति बुद्धिमान? सनातन के पूर्वज या हम!

सनातन संस्कृति में कुआँ पूजन होता रहा है. दुनिया की किसी और संभ्यता में ऐसा कोई धार्मिक कार्यक्रम नहीं. लेकिन हमारे यहाँ भी इसका प्रचलन तेजी से कम हुआ है. इतना कि अब इस प्रथा का जिक्र, साहित्य से लेकर सिनेमा तक में बिलकुल नहीं होता.

कैसे होगा? अब तो यह पिछड़ेपन की निशानी है. आज की जनरेशन से पूछोगे तो आपको जवाब देने की जगह आप की ऐसी हँसी उड़ाई जाएगी कि आप खुद को किसी गांव का अनपढ़ मान बैठोगे. मानों, गांव का होना कोई अपराध हो.

और अगर आपने अपने समर्थन में दादी-नानी के किस्से सुनाये तो कहा जाएगा कि किस समय की बात करते हो, जमाना बदल गया है. वैसे जमाना बदलने वाले यह नहीं बतलाते कि जीवन में मूल रूप से क्या सच में कुछ बदला है?

इसका सार्थक जवाब ना दे पाने पर बचते हुए उलटे सवाल किया जा सकता है कि कुआं भी कोई पूजा करने की चीज है, देहाती कही के. और आपने अगर हार ना मानते हुए बहस जारी रखी तो अंतिम तर्क आएगा कि अब कुआं है कहां, घर-घर नल पहुंच गया है. और फिर चिढ़ाते हुए कह देंगे कि अब कोई नल की पूजा तो करेगा नहीं?

अब इसके आगे हमारे पास कोई बात कहने को नहीं क्योंकि कुआं पूजन का मूल कारण हमें नहीं पता. अगर तार्किक जानकारी हो तब शायद हम कह पाते कि जब हमारे पूर्वज कुएं की पूजा कर सकते थे तो हम नल की क्यों नहीं?

चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे यहाँ कुआं पूजन क्यों होता था? जवाब मिलेगा कि हिन्दू धर्म में कुआं को बहुत पूज्य माना जाता है. हमारे हिन्दू धर्म में हर रस्म के पीछे कोई न कोई धर्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व छिपा है. जैसे कि बच्चे के जन्म के बाद कुआं पूजन किया जाता रहा है, जन्म के 12वें दिन यह रस्म की जाती इसके बाद जच्चा को पवित्र माना जाता.

इस दिन माता हल्दी, चावल तथा रोली आदि से कुआं का पूजन करती हैं तथा महिलाएं कुआं पूजन के गीत गाती हैं. जब लड़का बारात लेकर जाता है तब भी कुआं पूजन किया जाता है और फिर विवाह के बाद बहु के आने के बाद भी पूजन होता है.

एक तरह से इसके साथ घर की महिला का कुएं पर आना जाना शुरू होता. क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण मीटिंग पॉइंट था, सामाजिक मेलमिलाप का ठिकाना, तो इसके सुचारु ढंग से अमल में लाने के लिए हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था रची.

मगर फिर पूजा ही क्यों? वर्तमान की पश्चिम संस्कृति के हिसाब से तो पार्टी होनी चाहिए. बस दो संस्कृति में इस पूजा और पार्टी की सोच का ही फर्क है. इसे ही समझने की जरूरत है.

पूजा और पार्टी के मूल में क्या है? दोनों में कैसे भाव उत्पन्न होते हैं? इसे जानने के लिए किसी ग्रंथ की आवश्यकता नहीं.

पूजा हम किसकी करते हैं? दैविक शक्ति की. समाज से परे, आकार-निराकार अति महत्वपूर्ण की, और फिर उसे उच्चतम स्थान पर स्थापित करते हैं. ऐसा करते ही आ जाता है उसके प्रति समर्पण का भाव. आदर विश्वास का भाव.

हम जिसकी पूजा करते हैं उससे अपेक्षा तो करते हैं मगर उपभोग का भाव नहीं होता. देवता-ईश्वर के आते ही एक सकारात्मक ऊर्जा, दृष्टिकोण, वातावरण का निर्माण होता है. जहां फिर होती है स्वछता.

हम अपने पूजा गृह को सबसे अधिक साफ़ रखते हैं. जहां हमारे मन में अच्छे भाव पनप सके. हम सनातन संस्कृति में हर उस चीज की पूजा करते आये हैं जो हमारे लिए प्राकृतिक रूप से जीवनदायक हो, जीवन उपयोगी हो, जीवन रक्षक हो.

बरगद से लेकर पीपल और तुलसी, जल के हर स्रोत नदी, तालाब, कुएं, झरने, यहाँ तक की सूर्य-चन्द्रमा, इन सब की पूजा का प्रावधान है. अर्थात हमने बिना अधिक बतलाते हुए भी एक सामान्य मानव के मन मस्तिष्क में इनकी महत्ता को जीवन में स्थापित कर दिया.

और इस तरह से युगों से हम अपनी प्रकृति का संरक्षण कर रहे हैं. ऐसा करके हम किसी और पर अहसान नहीं करते. यह हमारे अपने हित के लिए है.

तो कौन हुआ अति बुद्धिमान? सनातन के पूर्वज. जिन्होंने कुआं पूजन की प्रथा बनाई थी. और जिसका पालन हम युगों से करते आ रहे थे मगर अब बंद कर दी गई.

जहां तक रही इस पूजन की विधि आदि में कर्मकांड की बात, तो वो एक सामान्य जन को सांस्कृतिक रूप से बांधने के लिए रीति, त्योहारों के नाम पर कई ढकोसलापन आया भी तो वह कुछ तत्कालीन तथाकथित बौद्धिक लोगों ने अपनी पंडिताई चलाने के लिए इस कर्मकांड को फैलाया, वरना अगर वैदिक भाव को माने तो घर के पेय जल के स्रोत को पूज्य बनाना ही मुख्य ध्येय है, बस.

हम जीवन के सारे महत्वपूर्ण कार्य पूजन से करते आये हैं. और इसके द्वारा होने वाले पारिवारिक कार्यक्रमों के माध्यम से मिलने जुलने के साथ आनंद बटोरने का पूरा इंतजाम होता. जिसे आज पार्टी कल्चर ने विस्थापित किया है.

अब जन्मदिन पर माँ खीर नहीं बनाती, बाजार से केक खरीदा जाता है जिसका साइज और दूकान के नाम से प्यार तौला जाता है. ऐसे केक काट-काट कर बड़े हए बच्चे जब रिश्तों को काटने लगते हैं तब यही समाज नयी पीढ़ी पर दोषारोपण करने लगता है. जो बोया है वही तो काटोगे.

आज जीवन के हर महत्वपूर्ण अवसर को मस्ती में बदलने का दौर है. तो फिर रिश्तों में भी तो उसका असर दिखेगा. जहाँ सब कुछ डांस एंड एन्जॉय से शुरू होकर रात के अँधेरे में गुम हो जाता है. और सुबह उठते ही जब नशा उतरता है तो सब कुछ उतर जाता है.

इस पूजा और पार्टी की संस्कृति के भाव में फर्क को व्यवहारिक रूप से समझने के लिए किसी वेद को पढ़ने की जरूरत नहीं. एक बार अपने घर के नल की पूजा करना शुरू करें. जगह-जगह लगे प्याऊ को देवालय मान कर देखें.

अपने कर्मस्थल को पूजना शुरू करें. अपने ऑफिस के कम्प्यूटर टर्मिनल पर जरूरी नहीं स्वस्तिक का निशान लगाएं मगर उसे सुबह ऑन करने से पहले बार आदर भाव से हाथ भर जोड़ लें.

पांच सितारा होटल से लेकर ढाबे तक में भोजन को अन्न देवता के रूप में लेना शुरू करें. आप के जीवन में धीरे धीरे सकारात्मक असर होगा. और हाँ आज की युवा पीढ़ी अपने मिनरल वाटर की बोतल को भी एक बार किसी देवता का प्रतीक मान कर देखे, पानी के हर बूँद का स्वाद बढ़ जाएगा.

हँसिये मत, कर के देखें, आप हर बूँद को सँभालने लगेंगे. ऐसा करते ही आप उस बोतल को फिर सड़क-पार्क से लेकर डस्टबिन तक में यूं ही फेक नहीं पाओगे. उसे आप अधिक साफ़ रखेंगे. उससे पीया गया पानी आप को शीतलता प्रदान करेगा.

यह अब सिर्फ पानी नहीं, क्योंकि अब जो आप पी रहे हैं, उसे पीते समय आप के भाव विशेष अवस्था में हैं, इसलिए मन मस्तिष्क ऐसे रस पैदा करेगा कि साधारण जल अमृत बन चुका होगा.

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