इमाम बकैती – मारीच दिखाई दिया, रावण कहाँ है?

मारीच की कहानी सब को पता है. वह आभासी स्वर्ण मृग का स्वरूप धारण कर राम-सीता के आश्रम में आया, अपनी लीलाओं से सीतामाई का दिल लुभाया, तब उसे पकड़ने सीता जी ने श्रीराम को उसके पीछे भेज दिया.

इसके बाद सीधा कूदते हैं जब सीता-लक्ष्मण संवाद पर. जब लक्ष्मण ने जाने से मना किया तो सीता जी ने उन्हें कठोर वचन कहे और अनर्गल आरोप भी लगाए, मजबूर हो कर लक्ष्मण को जाना पड़ा. बाद की कहानी भी आप को पता ही है.

इमाम बकैती के रूप में मुझे मारीच नजर आ रहा है और जनता के रूप में सीता. मोदी जी को राम मानना या न मानना आप की भक्ति पर छोड़ रहा हूँ, लेकिन मारीच और सीता को लेकर अपनी मान्यताओं पर दृढ़ हूँ. फिलहाल रावण की ताक में हूँ, वो नजदीक ही कहीं ‘फुरफुरा’ता होगा.

अगर नोटबंदी के समय को भूले नहीं हैं तो आप को याद होगा कि इस पर सब से ज़्यादा हाथ-पाँव किसने पछाड़े थे. फेक करेंसी का रूट कहाँ से आ रहा था? फेक करेंसी छपने वाले यूनिट हमारे पश्चिम में ही नहीं, पूर्व में भी हैं. चोट गहरी थी, पूरे गज़वा ए हिन्द के टाइम टेबल को लकवा ए हिन्द मार गया था नोटबंदी से.

आज मारीच उछल कूद कर रहा है. सीता आज भी वही है जो तब थी, दिखावे में फंसने वाली. श्री राम भी मारीच के पीछे गए थे तो बेमन से ही, जानते थे जो दिखता है वो है नहीं. मन यह भी बनाए थे कि यह मायावी हो तो भी इसे मारना श्रेयस्कर होगा, इसलिए लक्ष्मण को ध्यान रखने को कह गए.

याने मारीच चारा था यह तो आप समझ ही गए होंगे. भाई-‘चारा’ याद आया क्या किसी को? सही है, वैसे ही कुछ है. अब जरा ध्यान दीजिये, बम फूटने जा रहा है.

इमाम बकैती क्यों मारीच बन रहा है? क्योंकि वो या उसको नचाने वाले चाहते हैं कि सरकार उसे उठा ले. उठाने मिलेगा? क्या कोई पुलिस वाला जाकर उस पर वारंट बजा पाएगा? उसकी और उसके साथियों की लाशों का इस्लामी हश्र किया जाएगा. इस पर सरकार चुप नहीं बैठ सकती, हो सकता है अर्द्ध सैनिक बल या सेना का प्रयोग करना पड़े. फिर?

गोल्डन टेम्पल याद आ रहा है किसी को? क्या इस मस्जिद की पोजीशन, उसके आसपास की पोजीशन, किसी को पता है? क्या बंगाल में ही नहीं, उसके इर्द गिर्द और बंगलादेश में क्या हो रहा किसी को पता है? इमाम बकैती कितना बड़ा शहीद बन जाएगा और टीपू सुल्तान मस्जिद बंगाल का गोल्डन टेंपल.

सुकमा, कश्मीर आदि सब एक साथ ही क्यों सुलग उठे हैं पता है?

सीता ने राम को भेजा, लक्ष्मण को भी भर्त्सना कर के भेजा और संकट में फंस गई. अगर न भेजती तो क्या होता यह सोचिए. मारीच से अधिक प्रभावित न हों. वैसे यहाँ एक बात और है कि मारीच के कहें या रावण के, सैनिक हमारे बीच काफी हैं जो जनता नाम की सीता को उकसा रहे हैं.

युद्ध में धैर्य महत्व का होता है. इसी तरह लोगों को ऑर्गनाइज़ करना, सही क्षण की तैयारी में रखना आदि सब खर्चे का काम है, ज्यादा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, जो ज्यादा शांति रख सकता है वो जीतता है. मुर्गा झाड़ी से ऊपर उड़ा तो गोली से उड़ाना ही तो है.

इसमें एक तो किया जा सकता है कि इमाम बकैती को प्रसिद्धि देनेवाले चैनलों या प्रेस वालों की नकेल कसी जाये. इतनी तो सरकार से मेरी अपेक्षा रहेगी. बाकी ठीक है, सभी बातें सार्वजनिक चर्चा की नहीं होती.

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