न्यायपालिका और मीडिया आत्मचिंतन कर बदलाव नहीं लाई तो फिर देर हो जायेगी

भारत के लोकत्रांतिक स्तंभों में बीते दिनों हो रही हलचल इस बात का आभास दे रही है कि हम अराजकता के उस चरण में प्रवेश कर गये है जहां समाज को अपने अनुशासन और मर्यादाओं को सहेजना मुश्किल हो जाएगा. पिछले वर्ष मैंने इसी संभावना पर एक लेख लिखा था, उसी को, लोगों को आगाह करने के लिए फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ.

कोई भी राष्ट्र तब तक अराजकता के चरम पर नहीं पहुंचता है जब तक उस राष्ट्र के लोकतन्त्र को सहारा देते स्तंभ, जनता का विश्वास नहीं खो देते है. लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका को तीन प्रमुख स्‍तंभ माना जाता है और अब इसमें चौथे स्‍तंभ के रूप में मीडिया भी शामिल हो गया है.

आज भारत अराजकता के चरम की तरफ बढ़ चला है. उसकी कार्यपालिका और मीडिया जहाँ स्वार्थ और लोलुपता की दीमक से खोखली हो चुकी है, वहीं विधायिका की भी नींव डगमगाने लगी है.

इस विषम स्थिति में राष्ट्र को फिर से संभालने का दायित्व न्यायपालिका का होता है लेकिन आज के भारत में न्यायपालिका भी अन्य स्तंभो की तरह चरमराती हुयी दिखने लगी है.

यह एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि जनता की निगाह में न्यायपालिका का मान तभी तक है जब तक वह निष्पक्ष दिखती है और उसकी आँखों में सूअर का बाल नहीं आता है.

जो आज हमारे राष्ट्र में हो रहा है, वह पहले भी अन्य राष्ट्रों के जीवन काल में हो चुका है. उनके यहां जब-जब न्यायपालिका कमजोर और पक्षपाती दिखी है तब-तब लोकतांत्रिक मर्यादायें और संस्थायें तेज़ी से टूटी है और उस शून्य को अराजकता ने भरा है.

हमारे भारत ने पिछले 4 दशको में लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संस्थाओं को शनै: शनै: खोखला होते देखा है. न्यायपालिका के एक आदेश के परिणामस्वरूप इसी भारत ने आपातकाल देखा है. इसी आपातकाल में न्यायपालिका को अनैतिक विधायिका के आगे झुकते हुए देखा है.

इसी भारत ने अपने से 9वें स्थान के कनिष्ठ को सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख न्यायाधीश बनाये जाने पर वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा इस्तीफा देते हुए देखा है. इसी भारत ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को विधायिका द्वारा खण्डित हुए देखा है.

इसी भारत ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के भ्रष्ट आचरण पर महाभियोग (इम्पीचमेंट) की कार्यवाही को विधायिका द्वारा निर्लज्जता से बचाते हुए देखा है.

इसी भारत ने चुनाव आयुक्त द्वारा चुनावों में अराजकता और बेईमानी को रोकने पर उनके विरुद्ध विधायिका द्वारा इम्पीचमेंट की कार्यवाही की तैयारी होते हुए देखा है.

इसी भारत ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायधीशों को धर्म और जाति के आधार पर बनते देखा है. इसी भारत ने न्यायपालिका के शिखर में बैठे इन लोगो पर लगे भ्रष्ट आचरण के आरोपों को विधायिका द्वारा छुपाते हुए देखा.

आज भारत, कई दशकों से बने इस विधायिका और न्यायपालिका के गठबंधन से बने कैंसर को आखिरी स्टेज पर जाते हुए देख रहा है और इसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं.

ज़मानत से लेकर परोल तक, सज़ा की अविधि से लेकर एसआईटी के गठन तक न्यायपालिका कोई एक मापदंड का प्रयोग करने में असफल रही है.

आज न्यायपालिका का न्याय, व्यक्ति विशेष के आधार पर हो गया है और न्याय अपवाद की श्रेणी की तरफ बढ़ता दिखाई देने लगा है.

कुछ दशकों पहले जब दिल्ली में युवा कांग्रेस के नेता द्वारा तन्दूर हत्याकांड किया था तब कांग्रेस चाह कर भी बचाव करने नहीं आई थी और आज जब रोड रेज में हत्या होती है तब विधायिका के विभिन्न सिरमौर खुले बचाव में सामने आ रहे है.

आज रोड रेज पर इसी विश्वास पर हत्या हो रही है कि हत्यारा “बच जाने का न्याय” प्राप्त कर लेगा. भारत के लोकतन्त्र के चारों स्तंभों को अभी यह एहसास नहीं है कि उनकी जर्जर स्थिति से जनता का एक वर्ग वितृष्णा से बिलबला गया है.

यदि यह वर्ग इस मानसिकता को आधार बना लेगा तब कल रोड पर विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया के सदस्यों की हत्या होगी और हर हत्या अपने साथ, कई दशको का जमा मवाद निकालेगी. यह ठीक ज्वालामुखी के फूटने पर लावा निकलने जैसे होगा.

आज 2016 में यह बात समझ में नहीं आ रही है लेकिन हर एक आने वाला वर्ष, इस ज्वालामुखी के फटने की घड़ी को करीब लाता जा रहा है.

यदि 2019 तक न्यायपालिका और मीडिया ने आत्मचिंतन कर के बदलाव लाने की कोशिश नहीं की तो फिर देर हो जायेगी. जब तक यह अराजकता चरम को प्राप्त नहीं होगी तब तक भारत की जनता, ज्वालामुखी के मीठी पानी झील बन जाने का सिर्फ इंतज़ार करेगी.

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