मानों तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानों तो बहता पानी

प्रयाग नाम वाली पांच अलग अलग जगहें पास पास ही होती हैं. इनमें सबसे पहला है विष्णु प्रयाग. बद्रीनाथ के सतोपंथ से चली अलकनंदा नदी विष्णु प्रयाग में धुली गंगा से मिलती है.

यहाँ से आगे बढ़ने पर अलकनंदा थोड़ी दूर बाद नंदाकिनी से मिलती है और ये दूसरी जगह नन्द प्रयाग कहलाती है. इस से आगे बढ़ें तो अलकनंदा फिर से पिंडर गंगा से मिलती है और उसे कर्ण प्रयाग कहते हैं.

थोड़ा और नीचे आने पर अलकनंदा केदारनाथ से निकली मन्दाकिनी से मिलती है, जिसे रूद्र प्रयाग कहा जाता है. इस से भी आगे जाकर गंगोत्री के गोमुख से निकली भागीरथी नदी आकर अलकनंदा से मिलती है. इस जगह को देव प्रयाग कहा जाता है.

यहाँ से आगे अलकनंदा और भागीरथी का कोई अलग अलग अस्तित्व नहीं रहता, यहाँ से आगे ये नदी गंगा कहलाती है. तकनीकी रूप से जब हम गंगा की बात करते हैं तो ये गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर से 12769 फीट की ऊंचाई पर निकलती है.

भारत के मैदानी हिस्सों में करीब 2525 किलोमीटर का सफ़र करके बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है. कितना पानी इस से बहता है, उसके हिसाब से देखें तो ये दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी नदी है. ये नदी कम से कम 140 मछलियों की प्रजातियों और 90 उभयचर जंतुओं का घर है. इसके अलावा इसमें गंगा डॉलफिन भी होती है. वर्ष 2007 के आंकड़ों के मुताबिक ये नदी दुनिया की पांचवी सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी थी.

करीबन 800 किलोमीटर पार करने के बाद, रामगंगा के गंगा में मिल जाने पर इलाहाबाद के पास यमुना गंगा से मिलती है. इसे त्रिवेणी संगम कहते हैं, मान्यता थी कि गंगा-यमुना-सरस्वती तीन नदियाँ यहाँ मिलती थी. कई साल तक इतिहासकारों ने इसे मिथक घोषित किया.

बाद में सैटॅलाइट से लिए चित्रों और अन्य सबूतों के आधार पर ये तय हो पाया कि सरस्वती सचमुच की नदी थी और जिसे आज घाघरा-झज्झर बेसिन कहते हैं, वहीँ बहती थी. इस संगम को प्रयाग कहा जाता है, ये वो छठा प्रयाग है जिसे आम तौर पर लोग जानते पहचानते हैं. यहाँ भी यमुना नदी, गंगा से बड़ी है. यमुना से आने वाला 104000 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड पानी यहाँ गंगा में मिलता है. संगम का करीब 59% पानी यहाँ यमुना का होगा.

यहाँ से आगे जब गंगा बहती है तो वो मैदानी क्षेत्र में है. उसका वेग बहुत कम हो जाता हो ऐसा नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपेक्षाकृत शांत होती है. गंगा का वेग बनारस पहुंचकर कम होता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि नदी की दिशा वहां घूमती है. बनारस पहुंचकर पूर्व की और बह रही गंगा दक्षिण से उत्तर की तरफ मुड़कर बह रही होती है और इसी से उसकी गति घट जाती है.

इसी को आप धार्मिक मान्यताओं में देख सकते हैं. भागीरथ जब गंगा को लेकर आते हैं तो वो बालिका है, अपने पूरे वेग में उत्साह से भरी पूरी, जब शिव उसे रोकते हैं तो वो किशोरी है, बंधनों को मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती, शांतनु से विवाह और भीष्म के जन्म के समय वो युवती है, उसके बाद से लगातार वो माता के स्वरुप में है.

मैदानी भागों की गंगा भी इसी माता के स्वरुप में होती है. उसमें वेग नहीं, स्नेह और पोषण छलकता है. सन 1918 से 36 के दौर में अंग्रेजों ने वेग देखकर ये मान लिया था कि कितना भी कूड़ा कचरा इसमें डालो ये बहा ले जायेगी, लेकिन वाराणसी के इलाकों में जब शहरों से कचरा इसमें जाना शुरू हुआ तो इसका वेग उतना होता ही नहीं कि ये सब बहा ले जाए. इसकी सफाई के लिए भी जो काम हुए वो अजीब से रहे. पहले तो केंद्र और राज्य की इसमें 70:30 की हिस्सेदारी रही, बाद में कांग्रेस की सरकार ने (यू.पी.ए. काल में ) इसे 50:50 भी कर डाला. नतीजा ये रहा कि दोनों केंद्र और राज्य कहते रहे कि उन्होंने अपने हिस्से की सफाई कर दी है, उधर गंगा मैली होती रही.

मोदी सरकार के कार्यकाल में बहुत ज्यादा काम हुआ हो ऐसा भी नहीं है लेकिन हाँ प्रदुषण फ़ैलाने वालों की पहचान का काम किया गया है. आश्चर्यजनक रूप से इसमें 118 शहर ही नहीं आते, गंगा को प्रदूषित करने वालों में 1649 ग्राम पंचायत भी हैं. गंगा की सफाई में जुटे एन.जी.ओ. में से एक बड़ी संख्या साधुओं की चलाई हुई है. उनमें से ज्यादातर आधुनिक मानकों पर पढ़े लिखे भी नहीं माने जायेंगे. लगातार के अभ्यास ने उन्हें ये सिखा दिया है कि क्या किया जाना चाहिए. लगभग सबका मानना है कि गंगा की धारा को “निर्मल” ही नहीं “अविरल” भी होना चाहिए. जबरन पानी को रोका जाना गंगा को नुकसान पहुंचाता है.

अभी की हिसाब से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल मिलकर 7300 मिलियन लीटर कचड़ा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिदिन गंगा में बहाते हैं. इन राज्यों को मिला दें तो इनका सामर्थ्य करीब 3300 मिलियन लीटर कचड़े को परिशोधित करने का ही है, यानि 4000 मिलियन लीटर विष प्रतिदिन गंगा में जा रहा है. पंजाब के गावों में एक बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल काम किया करते हैं. उन्होंने हाल में ही काली बेइन नदी को पूरी तरह सिर्फ गाँव वालों और अपने काम से साफ़ कर के दोबारा जीवित कर डाला है. जो नदी लगभग सूख चुकी थी, वो अब दोबारा बहती है.

गंगा की सफाई भी अकेले सरकार के बस का रोग नहीं है. जनता का प्रयास, जनता की भागीदारी, किसी भी किस्म का कचड़ा नदी में डालने के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई जानी होगी. मेरी नहीं सरकार की जिम्मेदारी, साधु कुछ करते क्यों नहीं, जनता की मानसिकता में सुधार जैसे एक दूसरे पर जिम्मेदारी को गेंद की तरह फेंकने वाली हरकत की वजह से गंगा मैली हुई जाती है.

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