ये कहाँ ला पटका हमें भेड़ों की तरह चलाते?

इस युवा गायिका का नाम मालूम नहीं हुआ लेकिन उसकी आवाज ने भावुक जरूर कर दिया. लिंक पर किसी मसूद आलम साहब की टिप्पणी This is as close as one can get to the original. Absolutely gorgeous. Keep it up… से अलग मत मेरा तो कतई नहीं है. लेकिन मेरा उद्देश्य केवल इस वीडियो को साझा करने का नहीं है बल्कि एक मौलिक प्रश्न को उठाना है. देखते हैं.

https://www.youtube.com/watch?v=cYVMLeDFMYo

आजकल चार-पाँच बालिकाओं की वीडियो देख चुका हूँ जो लताजी की आवाज से काफी साम्य रखती हैं. हाँ, साधना से ही स्थान निश्चित होगा यह निर्विवाद है लेकिन एक बात निश्चित रूप से समझ में आती है कि भारतीय जनता के मानस में लताजी की आवाज एक gold standard है जिसे वो खोना नहीं चाहता.

समय से समझौता तो कर लिया है हमने लेकिन हमारी चाहत यही है कि कोयल गाती रहे, इसीलिए उनकी आवाज से मिलती युवा प्रतिभाओं की ओर बड़ी आशा से देखा जाता है.

लेकिन इस आलेख का प्रश्न यह है कि अगर मिल भी जाये इस सुर के वारिस, क्या उनसे उस दर्जे के गीत गँवाने वाले संगीतकार भी उपलब्ध हैं? क्या अर्थपूर्ण गीत लिखने वाले गीतकार उपलब्ध हैं?

आज भी जहां कहीं लाइव ऑर्केस्ट्रा प्रोग्राम होते हैं, युवा कलाकार भी उसी समय के गाने गाते हैं जिसे भारतीय फिल्म म्यूजिक में गोल्डन पीरियड माना गया है. तालियाँ भी उन्हीं गीतों को मिलती हैं. और वे केवल नकल नहीं करते, गीतों के बोल में कहीं किसी शब्द में अलग से भाव घोलने की कोशिश बता देती है कि वे समझ भी रहे हैं कि क्या गा रहे हैं.

नए फिल्मी गीतों की उम्र कितनी है ?

अगर हमारे कानों को अभी भी अच्छे बुरे की पहचान है तो कूड़ा कैसे स्वीकार्य हो गया? क्यों अभिरुचि बदल दी गई?

वैसे एक महिला मित्र से इस विषय पर चर्चा में उन्होने एक अनूठा मुद्दा उपस्थित किया – लताजी की आवाज का अपना व्यक्तित्व है जो आज की किसी भी फिल्म में हीरोइन की व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता. मुझे उनका या विश्लेषण ठीक लगा.

इसका मतलब यह भी होता है कि फिल्मों में हीरोइन का चरित्र कुछ इस कदर बदल दिया गया है कि लताजी की या इस तरह की आवाज का उससे मेल बैठना बंद हो गया है.

इस आवाज के साथ जो गुण जुड़े हैं, वे आज की भारतीय युवती के लिए अप्रासंगिक बना दिए गए हैं. चरित्र फिल्म हीरोइन का नहीं, भारत की युवती का बदल दिया गया है उसके संदर्भ बदलकर.

आधुनिकता के नाम पर इस बदलाव का समर्थन करने वाले कई मिलेंगे. उनसे बहस का मेरा इरादा नहीं है, मेरा प्रश्न ये है कि जब समाज के अवचेतन के साथ यह खेल खेला जा रहा था, क्या हमें पता चला भी कि हमारे समाज के साथ इतना बड़ा खेल हो रहा है?

संस्कृति के साथ छेड़छाड़ कर के देश की राजनीति में उथलपुथल करने की लंबी रणनीति होती है और उसपर वामियों ने लंबा काम किया है. हमारे देश और समाज का दुर्भाग्य यह है कि यह सब साहित्य या तो इंग्लिश या फिर जर्मन या फ्रेंच आदि में उपलब्ध है.

Adorno, Marcuse, Arendt जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. Gramsci जितनी ही इनकी भी विचारधारा खतरनाक है. इनके लिखे विचारों को जिन्होने पढ़ा है उन्होने उनका हम पर उपयोग ही किया, उनका देशज भाषाओं में अनुवाद नहीं किया. नहीं तो वो सब को अभ्यास के लिए उपलब्ध होता और उनके हथकंडे विफल भी होते या उलटाये भी जाते.

सच में, इस्लाम से भी हमारा ज़्यादा नुकसान वाम ने किया है. अनुपात देखिये, इस्लाम हजार सालों से मेहनत कर रहा है, वाम को सौ साल भी नहीं हुए.

सरिता जैसी पत्रिकाओं ने गृहिणियों की समाज और धर्म के प्रति अवधारणाओं में किस तरह का बदलाव ला दिया है, अंदाजा लगाना दिल दहला देनेवाली बात है.

ख्रुश्चेव की बात याद आती है कि हम आप को धीरे-धीरे ऐसे बदल देंगे कि आप को पता ही नहीं चलेगा कि आप कम्युनिस्ट हो गए है – मतलब आप से खिलवाड़ यूं होगी कि आप को लगेगा कि आप ही खुद में सुधार कर रहे हैं .

कबीर याद आते हैं, ज़रा बदलाव के साथ :

जाति न पूछो वाम की, पूछ लीजिये दाम.
मोल करो दिमाग का, सड़ा रहन दो ज्ञान.

Comments

comments

LEAVE A REPLY