तीन साल बाद भी शिक्षा में ना तो कोई परिवर्तन, ना ही किसी सुधार की मंशा

एक साधारण ग्रेजुएट अपनी डिग्री लेने तक कम से कम दस साल मेट्रिक के लिए, फिर दो साल प्लस टू में, और तीन स्नातक के लिए यानि पंद्रह साल इसी शैक्षणिक व्यवस्था में बिता चुका होता है.

कम से कम इसलिए क्योंकि आजकल अक्सर नर्सरी, एल.के.जी., यू.के.जी. वगैरह, बीच में एक-आध साल का गैप भी होता है. वो जोड़ लें तो पंद्रह से ज्यादा ही निकलेंगे.

इतने साल तक एक ही सिस्टम को फॉलो करने के बाद उस से रातों रात बदल जाने की उम्मीद तो बेमानी है. इसलिए जब ये कहा जाता है कि आज का एजुकेटेड (educated), काफी हद तक एम्प्लोयेबल (employable) नहीं है तो आश्चर्य बिलकुल भी नहीं होता.

इस स्थिति में बदलाव के लिए किसी बहुत बड़े सिलेबस चेंज (syllabus change) या नयी किताबों की जरूरत हो, किसी महान शिक्षाविदों की टीम की जरूरत हो ऐसा भी नहीं है. ये बिलकुल ही कॉमन सेन्स की बात है जो भुला दी जाती है.

किसी भी संस्था में, व्यापार में काम कैसे चलता है? क्या कोई इंसान अकेला काम करता है? बिलकुल नहीं, मुट्ठी भर काम ऐसे होते हैं जिसमें व्यक्ति अकेला काम कर रहा होगा. ज्यादातर काम टीमवर्क होता है, लोगों के सहयोग से किया जाता है. जो अकेले वाले काम हैं उसमें भी औरों से संपर्क तो रखना ही पड़ता है.

स्कूल में इसका ठीक उल्टा सिखाते रहे हैं. अपने नोट्स किसी को मत दो, अकेले भरो अपनी कॉपी. एग्जाम में तो हरगिज़ किसी की मदद करनी ही नहीं. असाइनमेंट खुद बनाओ, प्रैक्टिकल अकेले करो.

एक टीम की तरह काम कैसे किया जाता है, इसका ठीक उल्टा पंद्रह साल अभ्यास करवाते रहे हैं. अचानक अगर अकेले के इंडिविजुअल परफॉरमेंस से निकाल कर उसे टीम की तरह काम करने कहेंगे तो वो काम कैसे करेगा?

ऐसी ही जो दूसरी चीज़ है वो पहले वाले से भी साधारण है. इंटरव्यू के लिए या किसी मेहमान, घर आये किसी व्यक्ति से मिलने पर बच्चों को क्या सिखाते हैं? मुस्कुराकर मिलना? नमस्ते भी मुर्दों सी शक्ल बना के तो कहना नहीं सिखाते. लेकिन इसी में मामला जब स्कूल-कॉलेज के क्लासरूम का हो तो स्थिति ठीक उलटी होती है.

मास्टर-प्रोफेसर साहब अचानक से इस्लामिक कट्टरपंथी बन जाते हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा एलर्जी पढ़ाने वाले को, मुस्कुराने वाले बच्चे से ही होती है. जैसे ही कोई बच्चा हँसता हुआ दिख जाए मस्साब फटाक पूछेंगे, ऍम आई जोकिंग? मैं चुटकुले सुना रहा हूँ क्या? किस बात पे इतनी हंसी आ रही है क्लास में?

अब जिस को पंद्रह साल ना हँसना सिखाया गया हो, वो बेचारा अपने इंटरव्यू में किसी भावी सीनियर के सामने मुस्कुराता हुआ कैसे जाए? अपने काम के दौरान वो लोगों से हंस कर कैसे मिलेगा? मनहूस किस्म की शक्ल बनाए आदमी को एम्प्लोयेबल कौन मानेगा? दिक्कत तो होनी ही है.

बात करने पर लिखने पर भी उतनी ही सख्त आपत्ति होती है. आप कॉपी में कुछ नहीं लिख सकते. हिंदी अंग्रेजी कहीं साइंस-मैथ की कॉपी में लिख डाली तो फिर तो कुफ्र होगा ही, हिंदी-अंग्रेजी की कॉपी में भी अगर सब्जेक्ट से इतर कुछ लिख डाला तो वो भी कम बड़ा गुनाह नहीं है.

एप्लीकेशन तक लिखने का जो चार दशक पुराना तरीका था उसमें कोई बदलाव नहीं आया है. पिछले कुछ सालों से लोग सोशल मीडिया, ट्विटर-व्हाट्सएप्प को संवाद के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसे गलती से सिलेबस में डाल देना तो सीधा ब्लासफेमी ही हो जायेगी.

नतीजा ये होता है कि संवाद करना भी नौकरी ढूँढने निकले लोगों को नहीं आता रहेगा. चिट्ठी लिखने में कोई एक बाबू एक्सपर्ट होते हैं हर दफ्तर में, और इस बात के लिए उनकी बड़ी कद्र होती है. एक-दो पैराग्राफ का ईमेल तक ढंग से कर सकें, इसका सामर्थ्य भी रोजगार ढूँढने निकले युवा में होगा, ये शक का विषय रहता है.

तीन साल बीतने पर भी भारत सरकार शिक्षा की दिशा में ना तो कोई परिवर्तन कर पाई हैं, ना ही उसकी मंशा किसी सुधार की लगती है.

इसका एक बड़ा कारण ये है कि जिन्हें भारत में दक्षिणपंथी या फिर अभी तक के स्थापित वामपंथी कुमार्ग से अलग माना जाता है, ऐसे लोगों में से ज्यादातर के पास भाजपा की कोई ख़ास इज्जत नहीं है.

भाजपा या संघ जैसे संस्थानों में उनका प्रवेश सीमित है. ऐसे में सुधार के लिए विद्वान जुटा पाना ही भाजपा सरकार के लिए मुश्किल होता है.

इन सब छोटे-मोटे बदलाव के लिए सरकार को किसी बोर्ड की जरूरत नहीं पड़ने वाली. ये मात्र इरादे से ही हो जाएगा. शिक्षा सुधार की ओर बड़े कदम उठाने में असमर्थ मंत्रालय को ऐसी छोटी चीज़ों पर सोचना चाहिए.

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