तात्कालिक रुप से अपने मकसद में सफल हो चुका गोरखपुर का शराब माफ़िया

तो क्या गोरखपुर में गोरखनाथ की सीओ, आईपीएस अफसर चारु निगम शराब माफ़िया के ट्रैप में आ गईं. या कि अब वह उत्तर प्रदेश में शराब बंदी के लिए कोर कॉज़ बन जाएंगी.

क्यों कि गोरखपुर के विधायक राधा मोहन अग्रवाल भले मुख्य मंत्री योगी के खास हैं लेकिन वह गोरखपुर में अपनी विनम्रता और सदाशयता के लिए भी परिचित हैं.

चिकित्सक हैं, पंद्रह बरस से विधायक हैं. ठेके पट्टे से भी दूर हैं. बी एच यू से पढ़े हैं, बी एच यू और गोरखपुर मेडिकल कालेज में पढ़ा चुके हैं.

मैं उन से सीधे परिचित नहीं हूं. बस एक कार्यक्रम में छोटी सी एक औपचारिक मुलाकात है. पर गोरखपुर में उन का यही परिचय, उन की यही छवि बताई जाती है.

हां, जिस तरह से वह चारु निगम को चीख़-चिल्लाहट के साथ डपट रहे हैं, वह उन की इस छवि के विपरीत है. उन की सही बात को भी गलत बताने के लिए काफी है.

कई बार क्या होता है कि आप गलत बात भी सही तरीके से कह देते हैं तो लोग सही मान लेते हैं. जब कि सही बात भी गलत तरीके से कहने पर बात गलत हो जाती है. राधा मोहन अग्रवाल यहीं गलत हो गए हैं.

अब सवाल है कि वह चारु निगम को इस तरह डपट क्यों रहे हैं और कि इस घटना की वीडियो बना कौन रहा है. सूचना है कि यह शराब माफ़िया का काम है. राधा मोहन अग्रवाल को उत्तेजित कर वीडियो बनवा कर उन की छवि को खंडित करना.

चारु निगम के आंसुओं ने इस में चार चांद लगा दिया. फिर इन आंसुओं ने इस वीडियो को वायरल कर दिया. न्यूज चैनलों ने भी इसे बड़ी खबर बना दिया. इस वीडियो के मार्फत राधा मोहन अग्रवाल गुंडा और दबंग विधायक के रुप में स्टैब्लिश हो चुके हैं.

कोई बात नहीं, उन के इस डपटने के तरीके को किसी सूरत जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. निंदनीय है. खास कर किसी स्त्री के साथ यह दुर्व्यवहार किसी जन प्रतिनिधि को हरगिज नहीं करना चाहिए.

लेकिन आबादी में खुली उस शराब की दुकान की हिफाज़त करती हुई चारु निगम? आंदोलनरत औरतों की पिटाई करती, करवाती चारु निगम? वह आईपीएस हैं और आईपीएस की पहली पोस्टिंग सीओ की ही होती है.

वह स्त्री हैं, युवा हैं. उन्हें शराब की दुकान को जान पर खेल कर बचाना क्यों इतना ज़रुरी लगा कि आंदोलनरत महिलाओं जिन में वृद्ध और गर्भवती स्त्रियां भी थीं की पुलिसिया पिटाई हो जाए.

अगर कहीं स्कूल, धार्मिक स्थान और आबादी वाले क्षेत्र में शराब की दुकान है तो अवैध है. उसे हटाने के लिए ही स्त्रियां आंदोलन कर रही थीं. पुलिस का काम नियमतः उस शराब की दुकान को हटवाना ही है, आंदोलनरत स्त्रियों की पिटाई नहीं.

आंदोलन अपराध नहीं है, शराब की दुकान आबादी में होना ज़रुर अपराध है. आबादी में शराब की दुकान नहीं खुल सकती. चारु निगम नहीं जानतीं? या शराब से गरीब स्त्रियों की जो यातना होती है, जो नरक उपजता है, उसे भी चारु निगम नहीं जानतीं?

लेकिन राधा मोहन अग्रवाल नामक एक ‘गुंडे’ विधायक से डर कर रो पड़ती हैं. फ़ेसबुक पर बहादुरी इस आंसू की वीर गाथा लिखती हैं. क्यों नहीं आंसू बहाने की जगह उस ‘गुंडे’ विधायक की वहीँ डंट कर पिटाई कर देतीं. आखिर लेडी सिंघम बताई जा रही हैं.

जो भी हो गोरखपुर का शराब माफ़िया तात्कालिक रुप से अपने मकसद में सफल हो चुका है. बरास्ता चारु निगम के आंसू.

अब गोरखपुर का यह शराब माफ़िया कौन है, क्या यह भी बताने की ज़रुरत है? कम से कम गोरखपुर में तो लोग जानते ही हैं. हां, लेकिन बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते. राधा मोहन अग्रवाल जैसे ‘गुंडे’ के खिलाफ बोलने में लेकिन किसी को डर नहीं लगता.

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