बुद्ध तब भी मुस्कुरा रहे थे

507और 554 ईस्वी में बामियान मे कुषाणों के शासनकाल में महात्मा बुद्ध की दो प्रतिमाओं का निर्माण किया गया. ये प्रतिमाएं बलुआ पत्थर की बनी हुई थी. एक मूर्ति 55 मीटर और दूसरी 37 मीटर उंची थी. बड़ी प्रतिमा मे बुद्ध ‘वैरोकना’ और छोटी प्रतिमा मे ‘शाक्यमुनी’ की मुद्रा में खड़े थे. उस समय ये दोनों प्रतिमाएं विश्व की सबसे उंची बौद्ध प्रतिमाओं के रूप मे प्रसिद्ध थी. यूनेस्को ने इनके महत्व को देखते हुए इन्हें विश्व धरोहर घोषित किया था.

1999 में तालिबान ने बामियान पर कब्जा कर लिया. तालिबान के कब्जे में आते ही उसने इन मूर्तियों को नष्ट करने का आदेश जारी कर दिया. क्योकि वो “बुतपरस्ती” को अपनी विचारधारा के खिलाफ मानता था. ‘बुद्ध’ शब्द से ही ‘बुत’ शब्द की उत्पत्ति हुई है. मार्च 2001 में तालिबान ने इन प्रतिमाओं पर टैंक और वायुयानभेदी तोपों, मिसाईलों से हमला किया. कई दिनों की गोलाबारी के बाद भी प्रतिमाएं ज्यों की त्यों खड़ी रही. तब तालिबान ने इन मूर्तियों को नष्ट करने के लिये अपनी रणनीति बदली.

तालिबान के आंतकियों ने तोपों के प्रहार से हुऐ छोटे छोटे छेदों में बारूद भरकर उनमें विस्फोट किया. प्रतिमाएं फिर भी खड़ी रही. बौखलाए तालिबान ने तब पूरी प्रतिमा मे जगह जगह ड्रील कर पूरी प्रतिमा को बारूद से भर दिया. और उसमें विस्फोट किया गया. किंतु प्रतिमा आंशिक ही नष्ट होती. पर तालिबान अपने इरादे पर डटा था. वो बार बार बारूद लगाता और उसमें विस्फोट करता. यह प्रक्रिया पूरे 25 दिन तक तब तक चलती रही जब तक बौद्ध प्रतिमाएं पूरी नष्ट नहीं हो गयी.

प्रतिमाओं के नष्ट होने के बाद तालिबानी आतंकी जश्न मनाने लगे. हवा में अपने हथियारों से गोली चलाने लगे. प्रतिमा को नष्ट करने में हुई देरी के लिये उन्होंने 9 गायों की बेरहमी से हत्या कर कुर्बानी दी. उन प्रतिमाओं का नामोनिशान पूरी तरह मिट चुका था. जो पिछले 1500 साल से अडिग खड़ी थी. यद्यपि इसके पूर्व चंगेज खां, औरगंजेब और अनेक बर्बर शासक भी इन प्रतिमाओं को नष्ट करने का प्रयास कर चुके थे… पर वे कामयाब नहीं हो सके.

पूरी दुनिया, संयुक्त राष्ट्र, नाटो, अमेरिका, रूस, चीन, मानवाधिकार, सांस्कृतिक संगठन इस वहशी घटनाक्रम को देखते रहे. क्योंकि इन देशों और संस्थाओं का मानना था कि ये अफगानिस्तान का अंदरूनी मामला है. जबकि सच ये था किसी समय नाटो और अमेरिका ने ही तालिबान को सोवियत संघ के खिलाफ खड़ा किया था. इसलिये सभी पक्ष मौन थे.

लेकिन प्रकृति अपना न्याय खुद कर लेती है …वैसा ही वाकया तब घटा जब इस घटना के 6 माह बाद ही अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारते 11सितम्बर 2001 को उसी विचारधारा के आतंकियों ने विमान से हमला कर गिरा दी जिसने बामियान की बौद्ध प्रतिमाओं को नष्ट किया था…

बामियान की प्रतिमाओं के नष्ट होने के समय जो अमेरिका मूकदर्शक बना हुआ था उस अमेरिका ने तब ओसामा बिन लादेन की खोज के लिये पूरे अफगानिस्तान पर बम और मिसाईलों से हमले कर उस देश को पूरी तरह खंडहर बना दिया था…

पर यदि अमेरिका और सारी दुनिया तब बामियान की प्रतिमाओं को नष्ट होने से बचाने के लिये युद्ध छेड़ देते तो तो शायद 11सितम्बर का हमला नहीं होता.. जो आतंकवादी हिंसक विचारधारा आज पूरी दुनिया में फ़ैल रही है शायद वो बामियान में बुद्ध के सामने ही दम तोड़ देती. पर तालिबान जब बौद्ध प्रतिमाओं को तोड़ रहा था. दुनिया मौन थी. पर बुद्ध तब भी मुस्कुरा रहे थे.

बुद्धम् शरणम् गच्छामि

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