दादा साहब फाल्के अवार्ड प्राप्त के. विश्‍वनाथ : व्यक्तित्व और सर्जना में एक योगी फिल्मकार

ऐसा कभी-कभार ही देखने में आता है जब हमें सच्चे फिल्मकार के व्यक्तित्व में कोई साक्षात योगी दीखे. इसी सप्ताह जब दक्षिण के महान फिल्मकार, निर्देशक एवं अभिनेता के. विश्‍वनाथ को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी अड़तालीसवें दादा साहब फाल्के सम्मान से विभूषित कर रहे थे तब उनके योगदान का मस्तिष्क में पुनरावलोकन करते हुए यह बात मन में आयी.

इधर हमारे हिन्दी जगत या संसार में कहें तो इस बात को लेकर कोई रोचकता या सुखद आभास प्रतीत नहीं होता, यह जानकर भी कि के. विश्‍वनाथ ऐसे फिल्मकार हैं, जिन्होंने हिन्दी में भी कम से कम दस फिल्में बनायीं हैं सरगम, कामचोर, शुभकामना, जाग उठा इन्सान, संजोग, सुर संगम, ईश्‍वर, संगीत, धनवान और औरत औरत औरत.

शायद ही किसी को याद हो कि सतीश कौशिक ने जब अनिल कपूर के साथ बधाई हो बधाई फिल्म का निर्देशन किया था तो वे के. विश्‍वनाथ को इस फिल्म में एक चरित्र निभाने के लिए राजी करके बड़े खुश हुए थे, मिस्टर डिसूजा का. इस तरह सतीश  कौशिक को यह श्रेय जाता है कि के. विश्‍वनाथ को निर्देशक के रूप में हिन्दी सिनेमा में जानने वाले लोग अच्छे चरित्र अभिनेता के रूप में उनकी इस फिल्म से जानते हैं.

सामाजिक चेतना अब बहुत सारे एकालाप में इतनी मशगूल है कि उसे घटित होते ऐसे यशस्‍वी क्षण रोमांचित नहीं करते. उत्कृष्ट सिनेमा के निर्माण का श्रेय जिन्हें प्राप्त है, उनकी हमारे बीच उपस्थिति और उनका मान-सम्मान बहुत मायने रखता है. वास्तव में दरअसल ये ही वे विभूतियाँ हैं जिनकी वजह से सिनेमा के स्वर्णयुग या स्वर्णिम दौर की चर्चा की जाती है और की जाती रहेगी. क्या हमारा जनमानस बहुत से निरर्थक फितूरों से बाहर या बाज आकर थोड़ा-बहुत समय अपनी सांस्कृतिक विरासत और खुद की रचनात्मक चेतना के लिए भी नहीं संजोना चाहता?

खैर, ऐसा हो, न हो तब भी हमारी सांस्कृतिक विरासत को समय-समय पर समृद्ध होने से कोई रोक नहीं सकता, दरअसल यह रोके रुकेगी भी नहीं क्योंकि प्रत्येक कालखण्ड में यदि इतनी भी सजगता समय के साथ है कि के. विश्वनाथ को फाल्के अवार्ड की चयन समिति इस सम्मान के लिए चुनती है तो यह सम्मान की भी सार्थकता है.

के. विश्‍वनाथ दक्षिण भारतीय, विषेषकर तेलुगु सिनेमा के शीर्षस्थ फिल्मकारों में सम्मानित हैं जिनकी फिल्मों न केवल आंध्रप्रदेश राज्य के सिनेमा के बीस पुरस्कार जीते बल्कि पाँच नेशनल अवार्ड, अनेक फिल्मफेयर अवार्ड और एक एकेडमी अवार्ड भी हासिल किया. अपने लगभग साठ साल के सिनेमाई योगदान में लगभग साठ से भी ज्यादा फिल्में उनके सृजन का बड़ा साक्ष्य हैं.

सिनेमा में उनकी प्रतिष्ठा एक ऐसे अविभावक, पितामह की होती है जिनके प्रति नंदमूरि तारक रामाराव, शोभन बाबू, कमल हसन, रजनीकान्त, चिरंजीवी, ऋषि कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, जयाप्रदा, माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी जैसे बड़े सितारे सदैव कृतज्ञ भाव रखते रहे. के. विश्वनाथ का सिनेमा सशक्त पटकथा, प्रभावी सम्प्रेषण, प्रतिबद्ध निर्वाह और सांस्कृतिक चेतना तथा विश्वसनीयता का ऐसा प्रमाण है जिसका समानान्तर उदाहरण किसी दूसरे व्यक्तित्व में नजर नहीं आता.

उनकी सप्तपदी, स्वयंकृषि, शुभालेखा, सूत्रधारालु वे बहुचर्चित फिल्में हैं जिनमें दहेज, अस्पृश्यता और हिंसा जैसी सामाजिक बुराइयों पर प्रभावी ढंग से सार्थक विचार रखा गया है जो देखने वाले को झकझोरकर रख देता है. ऐसे ही उनकी सारदा और सिरीवेल्केला शारीरिक और मानसिक निशक्तता को केन्द्र में रखकर जो कथानक प्रस्तुत करती हैं, जिस तरह से हमें हमारी जिम्मेदारियों के प्रति जाग्रत करती हैं, वो अचम्भित करके रख देता है.

के. विश्वनाथ वो फिल्मकार हैं जिनके बारे में यह अनुशासन जाहिर है कि वे विषयों को समझकर उसके संवेदनशील निर्वाह की जैसी दृष्टि रखते हैं वो विलक्षण है. एक पटकथाकार, एक निर्देशक के रूप में वे अपने माध्यम के प्रति अगाध निष्ठा रखने वाले फिल्मकारों में से एक हैं. लगभग सत्यासी वर्ष की आयु में सिनेमा का सबसे बड़ा गौरव सम्मान ग्रहण करते हुए उनके व्यक्तित्व पर प्रतिभा की चमक देखते ही बनती है. एक ऐसा फिल्मकार जो एक समय में समानान्तर और मुख्यधारा के सिनेमा में समान रूप से आदर रखता हो, के. विश्वनाथ के अलावा और कोई नहीं है.

के. विश्वनाथ का यश तेलुगू सिनेमा के साथ-साथ तमिल और हिन्दी सिनेमा में भी समान रूप से फैला हुआ है. यह जानना दिलचस्प ही होगा कि उनका कैरियर एक साउण्ड रिकार्डिस्ट के रूप में तेलुगू सिनेमा से आरम्भ हुआ था. आगे चलकर वे कहानी और पटकथा लेखक के रूप में सक्रिय हुए और अवसर पाने पर सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया.

वे लम्बे समय ए. सुब्बाराव, के. बालचन्दर, बापू आदि निर्देशकों के सहायक रहे. यह सब करते हुए उनको यदाकदा कुछ भूमिकाएँ मिलीं तो वो भी उन्होंने करनी चाहीं. गुणी निर्देशकों के साथ काम करते हुए फिल्म निर्माण की उनकी स्वयं की दृष्टि और प्रखर, परिमार्जित और परिष्कृत होकर सामने आयी. जब उनको पहली फिल्म बतौर निर्देशक करने को मिली और इस फिल्म को आंध्रप्रदेश सरकार ने सिनेमा के प्रतिष्ठित नांदी अवार्ड से सम्मानित किया. यह फिल्म थी आत्मगौरवम जिसमें अक्कीनेनी नागेश्वर राव ने नायक की भूमिका निभायी थी.

इसके बाद वे निरन्तर एक के बाद एक उत्कृष्ट फिल्में बनाते गये. उनकी फिल्मों को पसन्द करने वाला एक विशाल-विराट दर्शक वर्ग था जिसकी सीमा प्रान्त या देश नहीं बल्कि दुनिया तक विस्तारित थी तभी स्वयम्कृषि, स्वाति किरनम और स्वर्णकमलम जैसी फिल्मों को ताशकन्द, मास्को, फ्रांस और एशिया पेसीफिक में देखा और सराहा गया और ये फिल्में इन जगहों तक अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का हिस्सा बनकर पहुँचीं.

शंकराभरणम, सप्तपदी, स्वाति मुथयम, सूत्रधारालु और स्वराभिषेक के. विश्वनाथ की वे फिल्में थीं जिनको नेशनल अवार्ड प्राप्त हुए बल्कि स्वाति मुथयम को इस बात का श्रेय जाता है कि वह उनसठवें अकादमी अवार्ड को हासिल करने वाली श्रेष्ठ विदेशी फिल्म के रूप में पुरस्कृत हुई थी. के. विश्वनाथ बतौर चरित्र भूमिका 1995 में शुभसंकल्पम फिल्म में आये और इस आयाम में ऐसे सराहे गये, ऐसे रमे कि फिर नरसिम्हा नायडू, पुडिया गीतई, टैगोर, स्वराभिषेकम, पाण्डुरंगाडु में उनके चरित्रों को दर्शकों ने खूब पसन्द किया.

उनकी फिल्में जिस तरह से सामाजिक सरोकारों, विद्रूपताओं, विसंगतियों को रेखांकित करने वाली मनोरंजक और प्रेरक होती थीं उसी प्रकार वे कला, संगीत, संस्कृति के विभिन्न आयामों की पृष्ठभूमि में अनेक महत्वपूर्ण विषयों के साथ कला और साधना की परम्परा, ऐतिहासिकता, अस्तित्व और सच्चे तथा प्रतिबद्ध साधक गुरुजनों की संजोयी-संचित करके रखी गयी सांस्कृतिक थाती का भी वह दर्शक प्रभावी और समृद्ध ढंग से कराते थे कि लगता ही नहीं था कि सामने परदे पर हम जो देख रहे हैं वह सदियों पहले की मूल्यवान सन्निधियाँ हैं या हमारे आनंद के साथ-साथ विरासत के पुनस्मर्रण का ईमानदार, सार्थक और सच्चा सर्जनात्मक प्रयत्न! ऐसी फिल्मों में हम शंकराभरणम, सागरसंगमम, सुरसंगम, स्वातिकिरणम आदि को भूल नहीं सकते.

निरन्तर दूसरी सदी में सिनेमा इतिहास के इन लगभग एक सौ पन्द्रह वर्षो में के. विश्वनाथ का स्थान बहुत सम्मानजनक है. हिन्दी सिनेमा में राकेश रोशन और टी सीरीज जैसे निर्माताओं को इस बात का श्रेय है कि वे ऐसे महान फिल्मकार से कुछ फिल्में ऐसी बनवा सके जिनका स्मरण-स्पर्श हमें उन स्मृतियों में ले जाने में सफल होता है जब ऋषि कपूर और जयाप्रदा अभिनीत सरगम याद आ जाती है, राकेश रोशन और जयाप्रदा अभिनीत कामचोर याद आ जाती है, जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित अभिनीत संगीत याद आ जाती है या अनिल कपूर और विजयाशान्ति अभिनीत ईश्वर याद आ जाती है. के. विश्वनाथ का सम्मान इन मायनों में सिनेमा की सार्थकता में विश्वास करने वाले, सार्थकतापूर्वक सर्जनात्मक उद्यम करने वाली विभूति का सम्मान है.

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