यादें : विनोद खन्‍ना, अपनी बनायी छबियों को लाँघता एक कलाकार

यह सत्तर के दशक से थोड़ा पहले की बात रही होगी, अभिनेता, निर्देशक और निर्माता सुनील दत्त अपनी फिल्म मन का मीत में एक बहुत ताजा, युवा चेहरा प्रस्तुत करते हैं जिसका नाम विनोद खन्ना था.

दर्शकों के सामने लगभग बाइस साल का यह सुन्दर, छरहरा और स्मार्ट युवा नकारात्मक भूमिका में अपना प्रभाव छोड़ जाता है और कहीं न कहीं सुनील दत्त को लगता है कि आने वाले समय में इस लड़के का भविष्य बहुत अच्छा हो सकता है यदि मौके ठीक-ठाक मिलते रहें.

फिल्मों में प्रवेश से लेकर सारी जिन्दगी विनोद खन्ना भले परदे पर एक से बढ़कर एक दुर्दान्त नकारात्मक चरित्र निबाहते रहे लेकिन अपने जीवन में विनम्र और शिष्टाचारी रहे, यही कारण था कि उनकी व्यवहारकुशलता के कारण जिससे जुड़े, रिश्ते निबाहते चले गये. यही कारण था कि वे सुनील दत्त के साथ ही मनोज कुमार, गुलजार, मेहमूद आदि के साथ अपनी धारा बनाने में जुट गये.

वह समय ऐसा था जब निर्देशकों को नायक के समानान्तर एक उसी मयार का खलनायक चाहिए होता था जो परदे पर आखिरी तक हिम्मत न हारे, जिसके तेवर पैनेपन की हद तक नुकीले हों और जो नायक के दो घूँसे पर अपने भी दो घूँसे चलाने का दुस्साहस रखे. ऐसा खलनायक जो बेदर्दी से निर्मम होकर नाजुक नायिका की बाँह भी मरोड़ सके. विनोद खन्ना ने परदे पर ये सारे दुस्साहस किए और तेजी से अपना स्थान बनाते चले गये.

यह सच था कि विनोद खन्ना हिन्दी सिनेमा के परदे पर नायक बनने का स्वप्न लेकर ही आये थे. उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत अच्छी हुई थी. वे तीन बहनों के अकेले भाई थे और समृद्ध परिवार के बेटे थे. उनके परिवार ने उनको सिनेमा में अभिनय के क्षेत्र में किस्मत आजमाने के लिए पूरा प्रोत्साहन दिया था. विनोद खन्ना को, यह सच बात है कि बहुत कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा अपना स्थान बनाने के लिए लेकिन अपने दिनोदिन मजबूत होते स्थान पर बने रहने के लिए जरूर उन्होंने खूब परिश्रम किया, अनुशासन का पालन किया, हर प्रकार के जोखिम लिए जिनसे अक्सर सुरक्षित चलने वाले कलाकार पीछे हट जाया करते हैं और खासकर निर्देशक के लिए प्रत्येक अपेक्षाओं पर खरे उतरने वाले कलाकार के रूप में वे खूब तारीफ पाया करते थे.

सत्तर का दशक भारतीय सिनेमा के लिए सबसे रोमांचकारी दस साल कहे जायेंगे जिसमें प्रतिभाओं ने खूब जमकर काम किया, स्वस्थ स्पर्धाएँ की और दर्शक समाज के सामने एक साथ छः-सात ऐसे चेहरों का सम्मोहन रचा कि दर्शक किसे चाहे, किसे छोड़े कहा नहीं जा सकता था.

विनोद खन्ना सर्वश्रेष्ठ युवा खलनायक थे क्योंकि उस समय तक प्राण प्रौढ़ हो चले थे जो कि खलनायकों के राजा कहलाते थे. दूसरे खलनायक मदन पुरी, अनवर हुसैन, जीवन आदि जीवन और कैरियर के उत्तरार्ध में थे. परदे पर विनोद खन्ना का आना भी नायक के आने के बराबर मायने रखता था फिर चाहे वो कच्चे धागे हो, मेरा गाँव मेरा देश हो, पत्थर और पायल हो, रखवाला हो, सच्चा झूठा हो या ऐसी ही और कोई फिल्म. लेकिन खलनायकों में सुपरस्टार होने के बावजूद बड़ी ही सावधानी और अच्छे अवसरों के साथ उन्होंने नायक बनने की शुरूआत भी की.

उनके कैरियर में गुलजार की फिल्म मेरे अपने की बड़ी भूमिका है. वहाँ से एक सम्भावना, एक रास्ता बना. पूरब और पश्चिम, मस्ताना, परिचय, अचानक, इम्तिहान के रास्ते हाथ की सफाई तक आना विनोद खन्ना जिसमें चाभी ने तार को नहीं छुआ, सायरन नहीं बजा और जोखिम पार हो गया. इसके बाद विनोद खन्ना अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा, सुनील दत्त आदि के साथ अनेकानेक फिल्मों में बराबर की भूमिकाओं में आते रहे.

सकारात्मक चरित्रों में भी विनोद खन्ना का स्वागत हुआ. हालाँकि एक्शन फिल्मों में अंग्रेजी में कहा जाये तो उनके व्यक्तित्व के अनुरूप डेशिंग भूमिकाएँ लिखवायी जाती रहीं लेकिन उल्लेखनीय यह भी है कि इसी के समानान्तर विनोद खन्ना, गुलजार जैसे महत्वपूर्ण निर्देशक की प्रिय पसन्द रहे और उनके लिए हर सौंपी जाने वाली भूमिका को गम्भीरता से जिया फिर चाहे वो लेकिन हो या मीरा हो, पहले की फिल्म का तो खैर जिक्र पूर्व में आया ही.

विनोद खन्ना सत्तर और अस्सी के दशक के दो प्रमुख सफल निर्देशकों प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की फिल्मों के सफल नायक रहे. उन्हें जे.पी. दत्ता ने बँटवारा और क्षत्रिय में अहम भूमिकाएँ सौंपी. वे यश चोपड़ा की फिल्मों चांदनी, परम्परा आदि में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते रहे. फिरोज खान की वे पहली पसन्द रहे और दयावान में श्रेष्ठ भूमिका निभायी. और उल्लेखनीय फिल्मों में रिहाई, इन्कार, लीला, मार्ग, राजपूत, मैं तुलसी तेरे आंगन की, कुदरत आदि का उल्लेख आवश्यक है.

विनोद खन्ना इधर पिछले कुछ वर्षों में सलीम खान से अपने सदाबहार अच्छे रिश्तों के कारण वाण्टेड से लेकर दबंग तक फिल्मों का हिस्सा रहे. उनका निधन हिन्दी सिनेमा की एक बड़ी क्षति है. एक ऐसे अभिनेता का जाना है जो अपीयरेंस में, तेवर में और प्रभाव में अपने किसी भी समदर्शी से उन्नीस नहीं रहा.

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