कल्पनायें नहीं हैं सुदीर्घ हिन्दू इतिहास के हर पन्ने पर मौजूद शिवगामी देवियां

अलाउद्दीन खिलजी और गयासुद्दीन तुगलक के जमाने की बात है. दक्षिण भारत के कर्नाटक में बल्लाल देव शासन कर रहे थे. बल्लाल देव बड़े महत्वाकांक्षी थे.

उनकी महत्वाकांक्षा थी सात राज्यों को जीतकर चक्रवर्ती सम्राट बनने की. पांच राज्य वो जीत चुके थे और दो राज्य वारंगल और मदुरा उनके निशाने पर थे.

चक्रवर्ती सम्राट बनने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें और भी आसान लग रही थी क्योंकि ये दोनों राज्य उत्तर भारत से हो रहे मलेच्छों के लगातार आक्रमणों के कारण कमजोर और जर्जर हो चुके थे.

बल्लाल देव के सेनापति संगम राय ने मदुरै को रौंद दिया और वहां के पाण्ड्य संघ के प्रमुख सोमैया नायक को बंदी बनाकर जंजीरों में बांधकर बल्लाल देव के दरबार में हाजिर किया.

बल्लाल देव अपने सभासदों के साथ सोमैया नायक को अपमानित करने लगे. सोमैया नायक भले पराजित राज्य के सेनापति थे पर अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर को उन्होंने पूर्व में कई बार धूल चटाया था इसलिए बल्लाल देव के दरबार में कई ऐसे लोग थे जो सोमैया नायक की वीरता के कारण उनके प्रति अतिशय श्रद्धा रखते थे.

सोमैया के प्रति आदरभाव रखने वालों में उन्हें बंदी बनाकर लाने वाले बल्लाल देव के सेनापति संगम राय भी थे. उनसे सोमैया नायक का अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने बल्लाल देव को नसीहत करते हुए सोमैया से वीरोचित व्यवहार करने को कहा.

इस पर बल्लाल देव ने कहा कि पराजित के साथ ऐसे व्यवहार करने में कुछ भी न्याय विरुद्ध नहीं है. उनकी इस बात पर जंजीरों में बंधे सोमैया नायक अट्टहास कर उठे, कहा, महाराज जब पूरा हिन्दू समाज, हिन्दू धर्म और हिन्दू राज्य मलेच्छों के आक्रमण से नष्ट-विनष्ट होने के कगार पर है फिर कौन जयी और कौन पराजित?

बल्लाल देव नहीं माने और अपने अहंकार में सोमैया को अपमानित करते रहे तो गुस्से में संगम राय ये कहते हुए कि ‘हिन्दू वीरों का अपमान कर्नाटक को भुगतना होगा’ सभा भवन से निकलने लगे.

उनके इस विरोध पर नाराज़ बल्लाल देव ने संगमराय को बंदी बनाने को कहा. जैसे ही सैनिक संगम राय को बंदी बनाने को आगे बढ़े तभी एक युवक हरिहर राय तलवार खींचकर संगम राय और सैनिकों के बीच खड़ा हो गया.

हरिहर राय ने कहा, ‘महाराज… वीरों का सम्मान करना सीखिए और वीर सोमैया और संगम राय को ससम्मान रिहा करिए वरना हमारे राज्य तो मलेच्छों के निशानों पर है ही और यूं ही आपका अभिमान बढ़ता रहा तो स्वयं महाकाल भी भारत के हिन्दुओं की रक्षा नहीं कर सकते.’

हरिहर के इस हरकत पर बल्लाल देव और भी क्रोधित हो गये और वो हरिहर की गिरफ्तारी का भी आदेश देने जा रहे थे तभी दरबार में एक और वीर कृष्णा जी नायक एक गठरी लिए हाजिर हुए.

हरिहर ने उनकी तरफ इशारा करते हुए बल्लाल देव से कहा, महाराज आपको सात राज्यों की विजयश्री चाहिए थी न, लीजिये कृष्णा जी आज आपके स्वप्न को पूरा करने वाला तोहफा लेकर आये हैं.

बल्लाल देव समेत सभासदों की उत्सुक नज़रें कृष्णा जी की ओर मुड़ गई. कृष्णा जी ने अपनी गठरी से वारंगल के महाराज प्रतापरुद्र का कटा हुआ सर बाहर निकाला. हरिहर ने बोलना शुरू किया,

महाराज ये कटा हुआ मस्तक वारंगल नरेश महाराज प्रतापरुद्र का है और उनका मस्तक हमने नहीं बल्कि उनकी माता रुद्रमाम्बा देवी ने अपने हाथों से काटकर आपके लिए भेजा है और अपने पुत्र के इस कटे हुए मस्तक के साथ एक संदेश भी भेजा है.

यह कहकर हरिहर ने महाराज बल्लाल देव के नाम रुद्रमाम्बा देवी का लिखा संदेश ऊँची आवाज़ में पढ़ना शुरू किया. रुद्रमाम्बा देवी ने लिखा था –

महाराज, मलेच्छों ने हमारे वारांगल पर आक्रमण कर दिया, हमारे कई वीर सैनिक अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए बलिदान हो गये, वारंगल की पराजय निकट जानकार मैं इस आशंका से सिहर उठी कि विजित वारंगल की पवित्र भूमि, यहाँ के मंदिर, गौएँ और हमारी बेटियों के साथ ये मलेच्छ पता नहीं क्या करेंगे.

आप यादव कुल बसंत हैं और हिन्दू जाति के रक्षक भी है परंतु चक्रवर्ती सम्राट बनने की लिप्सा के चलते आपसे हिन्दू जाति रक्षण का कर्तव्य विस्मरण हो गया और इसका भान आपको तब तक नहीं होगा जब तक आपके नाम के साथ चक्रवर्ती न जुड़ जाये इसलिए मैंने स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र और वारंगल नरेश प्रतापरुद्र का सर काटकर आपकी सेवा में भेज रही हूँ ताकि आप इस कटे सर के साथ चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि धारण करें फिर वारंगल समेत बाकी राज्यों के हिन्दुओं का, उनके मंदिरों का, उनकी गौओं का तथा उनकी कन्यायों का रक्षण करें“.

माता रुद्रमाम्बा देवी का ये संदेश सुनकर बल्लाल काँप उठे, सोमैया, संगम राय और हरिहर जैसे वीरों को तत्क्षण ससम्मान रिहा किया और उन्हें साथ लेकर हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति रक्षण अभियान में जुट गये. इसी गठजोड़ और हिन्दू एकता ने महान हिन्दू राज्य विजय नगर की नींव तैयार की और यही हरिहर राय उसके शिल्पकार बने.

इकबाल की नज़्म की एक पंक्ति तो बड़ी मशहूर है पर क्या हमने कभी सोचा है कि वो क्या बात है जो हमारी हस्ती को मिटने नहीं देती? ऐसा क्या है भारत में और हिन्दू में कि इतने घात-प्रतिघातों के बावजूद ये फिर उठ कर खड़ा हो जाता है?

तो हममें ऐसा वही जो ऊपर के इस ऐतेहासिक प्रसंग में आया है. हममें संगम राय है जो हिन्दू जाति रक्षण के लिए अपने स्वामी को ललकार सकता है और सेनापति के पद को लात मार सकता है.

हममें सोमैया नायक है जिसे अपनी पराजय और अधीनता से अधिक हिन्दू जाति की पराजय और अधीनता कचोटती है, हममें हरिहर राय है जो धर्मरक्षण के लिए अपने सम्राट के आगे खड़ा हो जाता है और प्राणों की चिंता किये बिना उनसे सत्य कहने का साहस रखता है.

हममें वारंगल नरेश प्रतापरुद्र है जो हिन्दू जाति, गौएँ और हिन्दू ललनाओं के रक्षण के लिए सहर्ष अपना सर कटवा लेता है, हममें माता रुद्रमाम्बा देवी हैं जिनके लिए धर्म और हिन्दू कन्याओं का सम्मान रक्षण अपने पुत्र के प्राण और खुद को राजमाता कहलवाए जाने से अधिक प्रिय हैं.

बाहुबली की मुख्य पात्र शिवगामी देवी, देवसेना, अवंतिका ये सब फ़िल्मी कथानक में काल्पनिक जरूर हैं पर हिन्दू इतिहास के सुदीर्घ कालखंड के हर पन्ने पर ऐसी देवियाँ मौजूद हैं जो महाभारत काल में कुंती, इस्लामी काल में दाहिर की बेटियां सूर्य और परिमल, रुद्रमाम्बा देवी तथा माता जीजाबाई, अंग्रेजों के काल में रानी चेन्नमा और दुर्गा भाभी के रूप में अवतरित होतीं रहतीं हैं और हिन्दू जाति को संजीवनी देतीं रहतीं हैं.

ऐसी माताओं के कोख से जन्मने वाले हम लोग चिरंजीवी और अमृतपुत्र नहीं हैं तो और कौन है?

जय माहिष्मती

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