जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी

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भगवान श्री कृष्ण को गोपियों ने अपना सब कुछ समझा, मैया यशोदा उन्हें नन्हा छौना समझती रही… नंद बाबा कोई देव समझते रहें… ग्वाल- बाल अपनी शरारतों में सहयोगी मित्र समझते रहे. गोकुल वृंदावन में आने वाले राक्षस विष्णु समझते रहे… अक्रूर जी देवकी- वसुदेव का पुत्र समझते रहे.

और आगे बढ़ें तो-

कुब्जा अपना मीत समझती रही… धोबी गरीब ग्वाला समझा तो कंस की सभा में आए लोगों ने उन्हें महाबली समझा ….जबकि कंस ने साक्षात अपनी मृत्यु समझा.

16000 बंधित राजकुमारियों ने अपना पालनहार समझा… पांडवों ने साक्षात ‘भगवान कृष्ण’ समझा, वहीं कौरवों ने यदुवंशी सेनानायक भर समझा.

शिशुपाल और रुक्मी ने अपना परम शत्रु समझा… धृतराष्ट्र ने परम क़पटी समझा तो विदुर ने परम भक्त वत्सल समझा. द्रौपदी ने केशव समझा… उत्तरा और सुभद्रा ने जगत नियंता समझा और कुंती ने अपना सर्वस्व समझा.

द्वारिका में समन्तक मणि चुराने के मिथ्या आरोप पे प्रजा ने चोर समझा और संक्षेप में करते हुए अंत में आखेटक ने हिरण समझा.

भिन्न भिन्न मुंड में मति भी भिन्न होती है और किसी भी विषय, वस्तु को समझने की उनकी समझ भी उसी अनुपात में.

इसलिए परिणाम भी उसी सापेक्ष में आते हैं. किसी को कन्हैया बंशी बुला के साथ में विहार करते हैं ….किसी का सारथी बनते हैं, किसी के गर्भ में स्थान लेते हैं…. किसी का सिर सुदर्शन से उड़ा देते हैं तो किसी को अपने मुखमंडल में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और किसी को युद्ध के मैदान में विराट रूप का दर्शन कराते हैं.

जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी.
इसलिए जैसा परिणाम चाहिए वैसी समझ तो विकसित करनी पड़ेगी.

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