ट्रेन में ज़िंदा जलने वालों को याद करने के बाद भी आप उतने ही धर्मनिरपेक्ष हैं?

यदि आप लोग इतने ही धर्म निरपेक्ष हैं तो इस ट्रेन में ज़िंदा जलने वालों को भी याद कर लिया करें, तथा इस ट्रैन को आग लगाने वालों की भर्तत्सना करने की भी हिम्मत दिखाया करें.

धर्मनिरपेक्षता की ढपली गले में डाल कर पीटने वालों को गुज़रात के दंगे तो बहुत अच्छी तरह से याद आते हैं पर 19/01/1990 को कश्मीर की मस्जिदों से खुला एलान हुआ था हिन्दुओं अपनी अपनी औरतों और लड़कियों को छोड़ कर यहाँ से चले जाओ.

इसके बाद 50000 ( पचास हज़ार ) हिन्दू मारे गए, 3.50 लाख लोग आज भी 24 साल बाद अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रह रहे है. हज़ारों लड़कियां अपहृत हो गयीं जिनका आज तक पता नहीं चला.

किसने पछतावा जताया आज तक??? गुजरात के घर तो बस भी गए, लेकिन कश्मीरी पंडितों को बसाने के लिए वहां की और केंद्र सरकार कहती रही वहां उनकी सुरक्षा करने में वो सक्षम नहीं हैं. इनसे कोई नही माफ़ी मांगने के लिए कहता. या इन पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाने की हिम्मत नहीं करता. कहाँ थी तब से लेकर आज तक आपकी कलम, जुबां और धर्मनिरपेक्षता?

जिन धर्मनिरपेक्ष सरकारों की आप इतनी पक्षधर हैं, क्यों ये सरकारें फिर समान नागरिकता लगा कर सबको बराबर नहीं मानती? जब धर्म के नाम पर देश बाँट ही दिए गए थे तो आज अल्पसंख्यंकों को तरह तरह के आरक्षण और वज़ीफ़े दे कर उनका हमारे द्वारा दिए गए टैक्स से तुष्टिकरण क्यों किया जा रहा है?

दर्द नज़र आता है तो सिर्फ गुजरात का क्योंकि हिन्दुओं का दर्द तो दर्द है नहीं या हिन्दुओं के दर्द का ज़िक्र करने से धर्मनिरपेक्ष नहीं रह जायेंगे.

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