आरक्षण : बौद्धिक बौनों की लफ़्फ़ाज़ी का ख़तरनाक खेल

आजकल आरक्षण के मुद्दे को ले कर माहौल गर्म है. दिलचस्प बात है कि और बहुत से मसलों की तरह हमारे यहाँ इस विषय पर भी सिर्फ नारेबाज़ी हुई है पक्ष और विपक्ष में. Dispassionate academic काम की परम्परा ही नहीं है भारत में. इसके लिए सिर्फ नेताओं को गाली देकर पल्ला झाड़ लेना बेईमानी है.

इतने बड़े देश के किसी भी विश्वविद्यालय में इस विषय पर कोई गम्भीर शोध हुआ है? आपने किसी भी समाचार पत्र में या टेलिविज़न पर कभी कोई गम्भीर कार्यक्रम इस इतने महत्वपूर्ण विषय पर देखा है ?

मैं बहुत दिनों से इस विषय पर लिखना चाहता था पर गलत समझे जाने के ख़तरे से डरता था. हमारा देश बॉलीवुडी देश है. हम हर बात को सफेद और काले रंग में आसानी से समझ आने वाले सरलीकृत ढंग से देखने के आदी हैं. हम राय तुरंत बनाते हैं – अपने पूर्वाग्रह और अपने वर्ग या जाति के हित के मुताबिक़.

कोई बिना सोचे समझे मेरिट की बात करता है तो कोई सदियों से चल रहे जातिगत अन्याय की. दोनों ही बातें कितनी सतही और मूर्खतापूर्ण हैं – थोड़ी सी मेहनत करें तो समझ में आ जाए. पर किसी बात पर बहुत सोचना या गहराई में जाना हमारे लिए वक्त की बर्बादी है. कौवा कान ले गया हमारे विमर्श की बुनियाद है.

ऐसे में कोई क्या बोले, क्यों बोले और कैसे बोले? फिर भी बोलूँगा. हालाँकि मुझे पता है कि नब्बे प्रतिशत लोगों को मेरे जैसे लोगों की बात में कोई दिलचस्पी नहीं है. उनके विचार पहले से ही पत्थर की मूर्ति की तरह गढ़े हुए हैं और उनपर अब कोई छेनी चलने की सम्भावना नहीं है.

मेरी दृष्टि में जब कोई भी ऐसा बड़ा कदम उठाया जाय तो सबसे पहले जो स्पष्ट और मूल बात है वह है निदान (diagnosis) और उपचार (remedy) में फ़र्क़ करना. बिना निदान के उपचार सम्भव नहीं. पर सही निदान सही उपचार की गारंटी भी नहीं.

और समाजशास्त्र का मूल सिद्धांत – the law of unintended consequences सदा ध्यान में रहना चाहिए. एक मामूली से दिखने वाले बदलाव के हज़ार और दूरगामी अप्रत्याशित वांछित और अवांछित परिणाम हो सकते हैं.

जो मूल प्रश्न इस सम्बंध में पूछे जाने चाहिए थे वे ये थे :

1. मूल समस्या क्या है ? और इस समस्या से निपटने के कितने विकल्प मौजूद हैं?

2. ऐसी समस्याओं पर दुनिया में उठाए गए क़दमों का अनुभव क्या है?

3. आरक्षण का उद्देश्य क्या है?

4. आरक्षण जिस उद्देश्य से किया जाना है वह उद्देश्य पूरा हुआ या नहीं – इसकी वस्तुगत जाँच की व्यवस्था क्या है?

5. आरक्षण से प्रभावित वर्गों पर उसका क्या असर होगा?

6. वर्गों से बाहर सारे देश की सामाजिक और आर्थिक अर्थव्यवस्था पर उसका क्या असर होगा?

7. आरक्षण से हानि क्या है? मसलन निहित स्वार्थ पर आधारित सामाजिक गुटों और pressure groups के बनने की क्या सम्भावना है?

8. लाभ और हानि के तुलनात्मक अध्ययन और नाप की तकनीक क्या है और यह अध्ययन कब और कैसे होगा?

9. यदि आरक्षण हानिकारक सिद्ध हुआ तो exit strategy क्या है?

10. आरक्षण के self sustaining momentum ग्रहण करने और हाथ से बाहर निकलने के ख़तरे की कितनी सम्भावना है?

…. आदि आदि.

हंसने या रोने की बात यह है कि इनमें से कोई भी सवाल पूछने की किसी ने कभी भी ज़हमत नहीं उठाई.

दुर्भाग्य से जिन्हें हम पूजते हैं उन राष्ट्रनिर्माताओं की इतने गहरे सोचने की बौद्धिक औक़ात ही नहीं थी. वे बौने लोग थे जिन्हें हमने महामानव समझ लिया था. उन्होंने जो ज़हर की खेती बोई थी, उसकी फ़सल देश काट रहा है.

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