अर्णब की चीख़ती आवाज़ से आपको दिक़्क़त हो सकती है, लेकिन मुद्दों से नहीं

अर्णब की पहली स्टोरी ख़बर आख़िर बनेगी भी तो कैसे? टाइम्स ऑफ इंडिया इसको छापेगा नहीं, एनडीटीवी, इंडिया टुडे इसको भाव देगा नहीं. तो आख़िर ये स्टोरी, सही हो या गलत, मेनस्ट्रीम मीडिया का दुत्कार सहकर गिरेगी नहीं तो कहाँ जाएगी. यहाँ मीडिया ने महागठबंधन किया हुआ है उसकी अरथी उठाने को, और आपको उसके पहली ख़बर के हिट होने का इंतज़ार है?

लेकिन सोशल मीडिया पर उसका उल्टा प्रभाव है. अर्णब को जो चाहिए था वो मिल गया. लोग इस पर बात कर रहे हैं. भाजपा ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस किया, नीतिश ने पुलिस महानिरीक्षक को बुला लिया. अब इससे ज़्यादा इम्पैक्ट क्या होगा?

अर्णब को जो करना था वो कर गया. आगे भी करेगा. उसको अभी लगातार चौबीस घंटे चीख़ना पड़ेगा. देखना ये है कि ये पत्रकारों और मीडिया हाउस का अछूत आगे कैसे बढ़ता है. क्योंकि एक बात तो तय है कि अख़बार में छपने वाली न्यूज़ ही बड़ी नहीं होती.

आज सोशल मीडिया के दौर में अख़बार और टीवी किसी ख़बर को ले या नहीं, उससे उसकी इम्पॉर्टेंस तय नहीं होती. मेनस्ट्रीम तो आज फेसबुक पर वायरल होते वीडियो और पोस्ट से अपना काम चला रहा है, तो यहाँ किसी ख़बर के पेपर में ना आने से, उनकी साइटों पर नहीं आने से उसकी महत्ता कम नहीं होती.

अर्णब की चीख़ती आवाज़ से आपको दिक़्क़त हो सकती है, लेकिन उसके मुद्दों से नहीं. ये कहना कि ‘लालू-शहाबुद्दीन के बारे में किसको पता नहीं था’, कोई सही बात नहीं है. इससे सत्ता गिर सकती है. पता तो सबको सब के बारे में है, फिर पत्रकार तो घास काटे.

ये क्लिप आज की है कि शहाबुद्दीन के बचपन की, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. बात ये है कि सीधे तौर पर एक अपराधी दूसरे को कुछ निर्देश दे रहा है, और इसका रिकॉर्ड है. इसको जनसत्ता छापे कि नहीं, द हिन्दू लिखे कि नहीं, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

अगर आपको ऐसी ख़बरों के आने से लगता है कि कोई बड़ी बात नहीं तो आप बताईए कि बड़ी बात कौन सी है? अमित शाह वाला टेप बड़ी बात थी या नहीं?

ख़बर की ज़िंदगी उसको लगातार पानी देते रहने से बढ़ती है. यही कारण है कि आज मेनहोल में गिरता बच्चा ख़बर बनता है. यही कारण है कि ख़बरों के कैम्पेन चलते हैं. तमिलनाडु के किसानों की क्या हालत है, ये किसको पता नहीं था, पर क्या उसको टीवी पर ना दिखाया जाय क्योंकि हमें लगता है सबको पता ही है?

अर्णब को जो करना था वो कर गया, आगे भी करेगा, करता रहेगा. वो हर बात सही ही नहीं करेगा. आप भी नहीं करते. वो पत्रकारिता का आदर्श नहीं है. आदर्शों को मालिक की बात सुनते हुए अपने पेशे से समझौता करते रोज़ नौ बजे देखता हूँ.

अपना दिमाग़ लगाईए.

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