एक अधूरा उपन्यास – 5 : वह स्त्री, जिसे मैं प्यार करता हूँ

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“नवयुवकों! वह स्त्री, जिसे मैं प्यार करता हूँ, उन्हीं स्त्रियों जैसी है जिनसे तुम प्यार करते हो. यह एक विचित्र जीव है जिसे देवताओं ने कबूतर की संधि-प्रियता, सांप के दांवपेंच, मोर का गर्व और अभिमान, भेड़िये की कपट नीति, गुलाब के फूल का सौन्दर्य और अंधेरी रातों के डर को मुट्ठी भर राख और चुल्लू भर समंदर के झाग में मिलाकर बनाया है..

मैं इस स्त्री को, जिससे मुझे प्यार है बचपन से जानता हूँ, जबकि मैं खेतों में उसके पीछे पीछे दौड़ता था, और बाज़ारों में उसका आँचल पकड़ लेता था.

मैं उसे अपनी जवानी के दिनों में भी जानता था, जबकि मैं किताबों में उसके चेहरे का प्रतिबिम्ब देखता था. शाम के बादलों में मुझे उसका रूप दिखाई देता था और नहरों की जलधारा के कलकल में मैं उसकी आवाज़ का संगीत सुनता था.

मैं उसे अपनी प्रोढ़ वय में भी जानता था, जबकि मैं उसके पहलू में बैठकर उससे बातचीत करता था. विभिन्न विषयों पर उससे प्रश्न पूछता था, अपने दिल के दर्द की शिकायतें लेकर उसके पास जाता था और अपनी आत्मा के रहस्य उसे बताता था.

यह जो कुछ था कल था, और ‘कल’ एक सपना है, जो अब कभी वापस नहीं आ सकता. लेकिन आज- आज वह स्त्री, जिसे मेरा दिल प्यार करता है, एक सर्द, वीरान और बहुत दूर की दुनिया में चली गयी है, जिसे एकांत और विस्मृत का देश कहते हैं. पर इस स्त्री का नाम क्या है, जिसे मेरा दिल प्यार करता है? उसका नाम है ‘जीवन’.

खलील जिब्रान की पुस्तक विद्रोही आत्माएं से ज़िंदगी पर लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए अर्जुन की आँख लग गयी. कमरे की खिड़की खुली हुई थी और सितम्बर माह की भीनी हवा नशे को और बढ़ा रही थी. अर्जुन के माथे पर पड़ी जुल्फें बार-बार उड़कर फिर-फिर आँखों पर गिर-गिर जा रही थी. हवा के इस जादू में मदहोश अर्जुन को लगा जैसे किसी ने उसकी जुल्फों को छुआ…. उसने धीरे से आँखें खोली, कमरे में कोई नहीं था.

बिना हिले डुले ये गुनगुनाते हुए कि … कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा… मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा…. फिर उसी नशे की अवस्था में वह आँखें बंद कर लेता है.

कुछ पल बाद उसे फिर महसूस होता है कि अब की बार किसी ने उसकी जुल्फों को हटाकर माथे को हथेली से छुआ…

अर्जुन जैसे ही आँखें खोलता है ‘वह’ अपना पल्ला उसके मुंह पर रखकर सरसराती हुई खड़ी होकर मुड़ जाती है. उसका पल्लू पूरी तरह से अर्जुन के मुंह से हटे उसके पहले ही वह कमरे की खिड़की तक पहुँच जाती है.

अर्जुन देखता है दूध सी सफ़ेद साड़ी उसकी आँखों के सामने लहरा रही है… वह उठकर खड़ा हो जाता है तो वह साड़ी के पल्लू को पीछे से समेटकर कमर में खोंस लेती है.

साड़ी ज़रूर कोरी सफ़ेद थी लेकिन पल्लू में न जाने कितने ही रंगों के फूल बने हुए थे… लाल, पीले, गुलाबी, नीले…. लग रहा था जैसे उसने संसार के सारे फूलों को अपने आँचल में बाँध लिया है. पल्लू कमर में खोंसने के बाद वह अपना हाथ उठाकर सर तक लाती है और जुड़े से पिन निकाल देती है.

पिन निकलते ही जुड़ा खुल जाता है और कत्थई रंग के बादल उन फूलों पर बरस पड़ते हैं. अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ता है तो उसके कानों में धीरे धीरे कोई गीत घुलने लगता है….

आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे….
बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए…

अर्जुन आगे बढ़कर उससे कुछ कह पाता इससे पहले ही वह खिड़की से हटकर दरवाज़े की ओर जाने लगती है और दरवाज़े पर जाकर ठिठक जाती है. अर्जुन सम्मोहित सा उसके पीछे-पीछे चलने लगता है. वह जीना उतारकर सड़क पर चलने लगती है.

शाम के समय इस रास्ते पर अक्सर लोग टहलने निकलते हैं तो अर्जुन को उसके पीछे पीछे चलने में तनिक भी अजीब नहीं लग रहा था. लग रहा होता तब भी क्या कर लेता पूरी तरह से जागृत होते हुए भी उसे पता था कि उसके पैर उसके कहने में नहीं है वह तो उस राह को चल पड़े हैं जहां पर उसके कदमों के नीचे रंगबिरंगे फूलों का आँचल सजा हुआ है….

उपन्यास जारी है…

– माँ जीवन शैफाली

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