आरक्षण पर आरक्षित विमर्श

अवसर की समानता के लिए संवैधनिक व्यवस्था जातिगत आरक्षण एक बार फिर बहस के केंद्र में है, जबकि इसका कोई औचित्य नहीं बनता. औचित्य इस लिए नहीं, क्योंकि सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल अभी तक नहीं है.

और अगर है भी… तो विरोध अथवा चिंता, शक, भ्रम का औचित्य इसलिए नहीं बनता क्योंकि दो बातें बिल्कुल साफ और सीधी हैं –

1. भाजपा (एनडीए) के लोकसभा 2014 घोषणापत्र में जातिगत आरक्षण की समाप्ति तो क्या, इसकी समीक्षा की भी कोई बात नहीं कही गयी है. इसलिए आरक्षण पर पार्टी के स्टैंड में कोई बदलाव आपेक्षित ही नहीं है.

2. वर्तमान केंद्र सरकार आरक्षण का दायरा प्रोन्नति (प्रमोशन) तक ले जाने की प्रक्रिया में कोई नई पहल नहीं करने जा रही… अगर वह इसे करने पर सहमति दिखा रही है तो भी.

सरकार की मंशा क्या है?

सरकार चाहती है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को “तय सीमा” तक आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए.

क्या है यह “तय सीमा”?

जातिगत आरक्षण में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 15% और अनुसूचित जाति (एसटी) के लिए 7.5% की सीमा तय है.

आरक्षण की इस संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम छोर तक पालन सुनिश्चित कराना सरकार की जिम्मेदारी है.

मौजूदा स्थिति क्या है?

वर्तमान में किसी भी विभाग में होने वाली 14 नियुक्तियों में अनुसूचित जाति को मिलने वाले 15 फीसद आरक्षण के हिसाब से दो पद आरक्षित रखे जाते हैं. लेकिन वास्तविकता में निचले कैडर में अभी इस वर्ग के लोगों को केवल एक ही पद मिल रहा है. लेकिन ताजा प्रस्ताव के मुताबिक अब निचले कैडर के कर्मियों को भी प्रमोशन के दो पद एससी के लिए आरक्षित रखना होगा. कार्मिक विभाग ने माना है कि विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में अभी भी एससी और एसटी के लिए 15 और 7.5 फीसदी के आरक्षण की सीमा तक नहीं पहुंचा जा सका है.

इसी आधार पर केंद्र सरकार तक यह बात पहुंचाई गई है कि संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक सरकारी सेवाओं के हर स्तर और कैडर में जातिगत आरक्षण की तय सीमा कुल 22.5% का पालन सुनिश्चित कराना न सिर्फ सरकार का दायित्व है, बल्कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मिले संवैधानिक हक उन्हें वास्तविक तौर पर मिल पा रहा है या नहीं… यह देखना भी.

इस तरह अगर केंद्र सरकार सलाह मानते हुए इस पर अमल करती है, तो यह मात्र ‘बैकलॉग’ खत्म करने की कवायद होगी. जो किया ही जाना चाहिए.

15+7.5 = 22.5% के कुल जातिगत आरक्षण पर अगर कोई सवाल नहीं, तो इस प्रतिशत को… सरकारी सेवाओं के हर स्तर, हर कैडर में हासिल करने की प्रक्रिया… “प्रोन्नति में आरक्षण” पर भी कोई सवाल बेमानी है, क्योंकि आरक्षण किसी भी सूरत में 22.5 प्रतिशत से ऊपर नहीं जाने वाला इस वर्ग के लिए.

रही बात प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भावना के खिलाफ जाने की, तो संवैधानिक व्यवस्था को पूर्णतः लागू करना विधायिका का काम है. तो विधायिका द्वारा तय नियम-कानून का पालन वर्तमान सत्ता कर रही है या नहीं… यह देखना और इस पर फैसला देना न्यायपालिका का काम.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को तब नकारा… जब इसे करने के सम्यक और उचित कानून उपलब्ध नहीं हैं. कोर्ट 22.5% का तय आरक्षण न मिले हर स्तर और संवर्ग में… इसे नहीं नकार सकता और नकारा भी नहीं है.

सरकार यदि इस प्रतिशत को हासिल करने के क्रम में… एक वाजिब और पूर्ण विधिक आधार के साथ आगे बढ़ेगी तो यकीन मानिए न्यायपालिका आगे बढ़ कर सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुचित जनजाति के इस हक को हासिल कराने में साथ खड़ी होगी.

इस वर्ग के लिए अंतिम तय आरक्षण की सीमा 22.5%…. सभी स्तरों और कैडरों में, नई भर्ती से पूरी हो, या प्रोन्नति में इसका लाभ देते हुए… कोई अंतर नहीं रखता.

ध्यान रखिये… कोर्ट को सिर्फ और सिर्फ संवैधानिक आधार, कानून और नियम चाहिए होते हैं… भाव, मोह, ममता, राजनीति नहीं.

बात के मर्म को जरा यूं इस उदाहरण से समझें : विषय से इसका कोई मेल-संबन्ध नहीं है.

उत्तर प्रदेश में नई सत्ता आने तक अवैध बूचड़खाने चल रहे थे. कानून पहले से था. पालन नहीं हो रहा था. एक सरकार आई. उसने पालन कराना शुरू किया. लोगों ने हल्ला मचाया कि यह हक छीना जा रहा है.

सरकार का पक्ष है : हमने कोई नया नियम-कानून नहीं बनाया, जो कानून और नियम अभी तक पालन में नहीं थे ज़मीन पर… उसका पालन कराया जा रहा है.

यही किसी भी राजनैतिक सत्ता का नैतिक कर्तब्य है : तब तक… जब तक कि संविधान इसकी व्यवस्था रखता हो.

एक अवैध के समर्थन में अगर वो खड़े हुए, तो दूसरे अवैध, कमी के समर्थन में आपको खड़े नहीं दिखना चाहिए.

न आरक्षण पर कुछ नया है : न ही अवैध बूचड़खानों पर कुछ नया था.

चलते-चलते

जिन्हें ओबीसी (पिछड़ी जातियों) के आरक्षण पर भी इस अधिकार को पाने की मंशा हो, उन्हें यह जानकारी साथ रख लेनी चाहिए कि : ओबीसी आरक्षण… मंडल कमीशन की मूल भावना के मुताबिक जातिगत नहीं, बल्कि कुछ वर्गों को आर्थिक आधार पर दिया गया आरक्षण है. जो मेरे मुताबिक आरक्षण का सर्वोत्तम मॉडल है. अफसोस इसे लागू इसकी मूल भावना के विपरीत किया गया है.

इसी विषय पर राजनैतिक संदर्भों में बात अगली बार.

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