देश किसका है ये तय हो जाए तो इसकी रक्षा के लिए काम करूं!

इस्लाम को जन्म लिए अस्सी वर्ष न हुए थे कि इतने कम समय में उसका एक झंडा जहाँ भारत की सीमा तक पहुँच गया था तो दूसरी और अटलांटिक महासागर तक… उस समय की बात करें तो तीन महाशक्तियां साम्राज्य थी… एक रोमन साम्राज्य, दूसरा ईरानी साम्राज्य और तीसरा भारत का.

मोहम्मद का जन्म 570 ई. और मृत्यु सन् 632 ई में हुई… लेकिन 700 ई. लगते-लगते इस्लाम ईराक, ईरान और मध्य एशिया में फ़ैल गया तथा सन् 712 ई. में सिंध मुसलमानों के कब्जे में चला गया, उसी वर्ष ही स्पेन में भी इस्लामी राज्य स्थापित हो गया…

सौ वर्ष के भीतर ही इस्लामी साम्राज्य विश्व की सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन के उभरा.… ईरानी साम्राज्य जो रोमन साम्राज्य के समानांतर व शक्तिशाली था, उसने इस्लामी योद्धाओं के समक्ष कुछेक वर्षों में ही घुटने टेक दिए… वहां के आवाम जिन्होंने मुस्लिम बनना स्वीकार नहीं किया उन्होंने भारत में आ के शरण ली.…

ताज्जुब की बात देखिये कि पारसियों का मूल देश ईरान होते हुए भी इनकी सबसे ज्यादा जनसंख्या भारत में है… खैर छोड़िये.. तो मुहम्मद-बिन-कासिम के नेतृत्व में सिंध मुसलमानों के कब्जे में चला गया सन् 712 ई. में…

अब कुछ आश्चर्यजनक बात करते है…

पूरा मध्य एशिया कब्जे में हो गया… ईरान जैसा शक्तिशाली साम्राज्य भी कुछ वर्षों में अधीन हो गया… सिंध भी कब्जे में हो गया… लेकिन जब ये इस्लामी योद्धा इतने ही तुर्रम खान थे तो सिंध में ही क्यों रुके रहे… आगे क्यों नहीं बढ़े?.…

अब बताते है कितना दिन तक रुके रहे…. सिंध विजय हो गई 712 ई. में… और उसके बाद मोहम्मद गौरी ने दिल्ली जीता 1192 ई. में.. (बीच-बीच में छोटे-छोटे लूटा-लूटी का काम चलते रहता था).…

तो इस प्रकार से भारत को कम से कम 500 वर्षों का समय मिला इस्लामी आक्रमण से अपने आप को बचाने का… लेकिन नहीं कुछ किया गया.… अब ऐसा तो नहीं था कि ये इस्लामी लड़ाके पेशावर में बैठ के भजिया तल रहे होंगे 500 सौ सालों तक!!

अब दूसरा आश्चर्य देखिये… पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई 1192 ई. में… काशी का पतन हुआ 1194 ई. में… और सन् 1196-97 में बंगाल मुसलमानों के अधीन हो गया!!…

मने कि मात्र 8 से 10 सालों में इस्लाम पेशावर से ले के बंगाल तक पहुँच गया… यह बात समझ लेने पर भी ठीक से समझ में नहीं आती है… न उन दिनों रेल थे, न वायुयान और न ढंग की सड़कें ही थी.. फिर भी मात्र दस वर्षों में इस्लाम कहाँ से कहाँ पहुँच गया जो सिंध में आ के 500 साल तक ठहरा हुआ था.

तो राजाओं ने जगह-जगह उनका सामना क्यों नहीं किया?… अथवा जनता ने ही स्थान-स्थान पर उन्हें बाधा क्यों नहीं पहुँचाई?… क्या दिल्ली से मुर्शिदाबाद तक कोई सुरंग थी जिसके भीतर से आक्रमणकारियों की सेना छुप के निकल जाती थी?…

मुट्ठी भर मुसलमान इतने बड़े भूखण्ड को आनन-फानन में जीतकर राज्य भी करने लगे.. इससे प्रत्यक्ष ज्ञात होता है कि इस देश के लोगों ने इनका सामना नहीं किया.

यहाँ दो बात स्पष्ट है… एक तो कोई विद्रोह नहीं और दूजा मुसलमान किस बात को ले के 500 साल तक सिंध में डेरा जमाये रहे?

दरअसल वे वहां बैठ के भजिया ही तल रहे थे… और सटीक समय का इंतज़ार… और जब सटीक समय आया तो 10 बरस भी न लगे अपना राज्य स्थापित करने में!

और इसका सबसे बड़ा कारण रहा भारत में केंद्रीय सत्ता का अभाव… जब तक भारत में केंद्रीय सत्ता रही किसी की औकात नहीं हुई सीधे हमला करने की… दरअसल भारत का पतन हर्षवर्धन के बाद से ही शुरू हो गया, क्योंकि उसके बाद चक्रवर्ती सम्राट के पद पर कोई भी आसीन नहीं हुआ.

केंद्र की शक्ति टूट गई और कोई किसी को रोकने वाला न रहा. परिणाम यह हुआ कि सारे देश में छोटे-छोटे राज्य उठ खड़े हुए और आपस में लड़ना अपना परम कर्तव्य समझने लगे. अपना राज्य और अपनी राजधानी इतनी प्रिय हो उठी कि देश का अस्तित्व ही भूल बैठे.

आज भी कमजोर प्रजातांत्रिक देश में जब कोई व्यक्ति या दल स्थापित सरकार को नहीं चाहता है तब वह विचित्र प्रकार की दलील देता है… “हम देश की रक्षा क्यों करे? यह देश किसका है? मेरा या उनका? पहले यह फैसला हो जाए कि यह देश मेरा है, तब मैं इसकी रक्षा के लिए काम करूँगा!”

तत्कालीन राजाओं के भी कुछ ऐसे ही भाव थे… भारत का अर्थ उनका अपना राज्य था… फिर वो राज्य के बाहर आकर क्यों लड़ता… क्योंकि वो किसी दूसरे राजा का राज्य पड़ता था…

प्रत्येक राजा को प्रत्येक दूसरे राजा से कुछ न कुछ शिकायत रहती ही थी… जिसके कारण कोई भी चार राजे एक राजा का साथ देने को तैयार नहीं थे… पृथ्वीराज और राणा सांगा को कुछ राजाओं का सहयोग प्राप्त था लेकिन इसे हिन्दू स्वभाव के अनुसार अपवाद मानकर ही चलिए.

मुसलमान सिंध में तो बहुत वर्षों से बैठे हुए थे और लूटमार के जरिये भारत से कुछ ले भागने के आदी भी रहे थे… किन्तु, देश की एकता में जब तक थोड़ा भी दम रहा, तब तक वो सम्पूर्ण भारत को जीतने का मंसूबा बांध नहीं सके…

हाँ, जब उन्होंने देख लिया कि अब इस देश में कोई भी किसी की बात सुनने-मानने को तैयार नहीं, सब आपस में ही लड़ रहे हैं, सब अपनी-अपनी राज्यों के सीमाओं को भारतवर्ष की सीमा मान बैठे हैं और भारत की एकता का भाव पूर्ण रूप से लुप्त हो चुका है, तब वे देश पर ज़ोर से चढ़ आये और बिना किसी दिक्कत के यहाँ के सुलतान बन बैठे.

मुसलमानी आक्रमण के समय यहाँ के राजाओं की मनोवृति कैसी थी इसका भी उदाहरण ‘जय सोमनाथ’ में आया है, जहाँ घोघा राणा का प्रपौत्र सामन्त राजा भीमदेव से कहता है कि “चालुक्यराज! .. ऐसा लगता है कि क्षुद्रबुद्धि और पारस्परिक विरोध में मस्त अपने राजाओं को मारने के लिए ही भगवान सोमनाथ ने इस अमीर को भेजा है!”

एकता जब खिड़की की राह से भाग गई, तब आजादी को मुख्य द्वार से होकर जाना ही था. तो हो गई इतिहास की बातें.. अब क्या आज परिस्थितियां ऐसी नहीं है?

आज सीमाएं भी वही हैं, मनसूबा भी वही है… हाँ अंतर है कुछ… दुश्मन अब सीमा के पार ही नहीं वरन् अंदर भी खूब हैं. और सियासतदान भी अपने-अपने राज्यों की सीमा को भारत की सीमा मान बैठने लगे हैं…

पहले भी उन्होंने पांच सौ साल इंतज़ार किया हैं… राह देखी है एक बड़ी विजय की… और अब फिर से देख रहे हैं… हम मदमस्त हो चले हैं… वो बस हमारा नाटक देख रहे हैं… सटीक समय पाते ही रौंद देंगे.… विचार कीजिये… क्या उस वक़्त के भाव फिर से जग नहीं रहे हैं…

“हम देश की रक्षा क्यों करे? यह देश किसका है? मेरा या उनका? पहले यह फैसला हो जाए कि यह देश मेरा है, तब मैं इसकी रक्षा के लिए काम करूँगा!”

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