हर वो चीज शस्त्र है जिसके उपयोग से शत्रु को नुकसान पहुंचे

अनिर्बंध युद्ध – चीन द्वारा 1999 में प्रतिपादित नया सिद्धांत – जानें यह क्या है.

बीती रात इस सिद्धांत का परिचय करा देनेवाली एक इंग्लिश पोस्ट लिखी थी. इस पुस्तक की link भी अपलोड कर दी थी. link दुबारा दे रहा हूँ, लेकिन सब के लिए यहाँ इस सिद्धांत का अतिसंक्षिप्त परिचय करा रहा हूँ.

कर्नल Qiao Liang और कर्नल Wang Xiangsui इस सिद्धांत के उद्गाता हैं. बकौल इनके, युद्ध अब वो नहीं रहा जो माना रहा जाता है. मतलब युद्ध के लिए केवल सेनाएं ही उपयुक्त है ऐसी बात नहीं. सेना का अपना महत्व है और उसे रिप्लेस नहीं किया जाता, लेकिन इस सिद्धांत में एक फर्क है. ध्यान से समझिये

हर वो चीज शस्त्र है जिसका उपयोग आप अपने शत्रु को नुकसान पहुंचाने के लिए कर सकते हैं. इसी तरह आप का हर व्यक्ति सैनिक है जो जहाँ जैसे उसे सही मौका समझ में आये, शत्रु को किसी न किसी तरह नुकसान पहुंचाने से चूकेगा नहीं.

इस युद्ध में जमीन से लड़ा जाता है – जमीनें कब्जा करो या शत्रु के लिए काम की जमीन के व्यवहारों में अड़चनें डालें, पर्यावरण को काम में लिया जा सकता है, व्यापार का उपयोग है, कानून को भी इस्तेमाल कर सकते हैं, शत्रु के इतिहास और संस्कृति भी आप के लिए शस्त्र बन सकते हैं. क्रिएटिव बनिए, सोचिये, हर बात शस्त्र, हर व्यक्ति योद्धा.

यहाँ आप देखिये, मैंने शत्रु को हराने की बात नहीं की है बल्कि उसे नुकसान पहुंचाने की बात की है. क्योंकि जब शत्रु की हार ही उद्देश्य है तो आप को युद्ध की घोषणा करनी होती है जहाँ शत्रु भी आप को प्रत्युत्तर दे सकता है. आप पर हमला कर सकता है जहाँ हो सकता है आप नुकसान उस से ज्यादा हो जाए.

युद्ध हमेशा नुकसान उठाने की क्षमता का मामला होता है. जहाँ टकराव होगा वहां क्षति होगी. अपनी क्षति कम हो, शत्रु की क्षति अधिक हो, यही युद्धनीति होती है. जब झेलने की क्षमता के ऊपर क्षति पहुंचती है, हार हो जाती है. अगर ये काम बगैर खूनखराबे का हो तो बहुत बढ़िया माना जाता है.

इस टेक्निक से आप खुद को बचा सकते हैं, अपना नुकसान बचा सकते हैं. शत्रु कौन है, यह तो आप की मूलभूत policy है लेकिन आप उससे युद्ध घोषित नहीं कर रहे, बल्कि उससे धंधा कर रहे हैं. उससे सहकार्य कर के उसको अपने पर निर्भर कर रहे हैं.

खुद को उसका सहकारी बता रहे हैं. कभी खुद भी थोड़ा नुकसान उठा रहे हैं जहाँ शत्रु का नुकसान आप से कई गुना हो ताकि शत्रु के साथ बैठकर अपने नुकसान पर भी रोने का नाटक किया जा सके.

वैसे आज आप को यह पढ़कर लग रहा होगा कि इसमें क्या नया है? मुझे भी वहीँ लगा. दरअसल मुझे तो यह भी लगा कि लगता है इन चीनियों ने 1999 तक इस्लाम का अध्ययन किया ही नहीं था क्या?

चाइना ने 1962 के पहले भारत के साथ भाई-भाई का नारा दिया, इस्लाम भाईचारा का नारा देता है. असलियत जो है सो हईये ही है.

किताब की लिंक दे रहा हूँ. वैसे विषय समझा ही दिया है, डिटेल में जिन्हें समझना है वे किताब अवश्य पढ़ें.

किताब पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें – https://www.oodaloop.com/documents/unrestricted.pdf

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