16 दिसंबर की मनहूस रात, योनि से निकलता खून का सैलाब और दर्द से कराहती निर्भया

16 दिसंबर… शायद यही समय रहा होगा…(आप 15, 20 मिनट आधा पौन घंटा इधर उधर करने के लिए स्वतंत्र हैं) तमाम मुश्किल हालातों का सामना करते हुए वो फिजियोथेरेपी में एडमिशन ले चुकी थी, लड़की होनहार और खुश मिजाज़ थी तो ज़ाहिर है घर के अलावा बाहर वालों की भी आँख का तारा बन गई. दोस्त भी बहुत से थे , पर कुछ दोस्त ख़ास होते हैं जिनपर आप आँख मूँद के भरोसा कर लेते हैं उस दिन भी कुछ ऐसा ही था…

वो भरोसा करती थी इसलिए उसके साथ फ़िल्म देखने गयी ( हालाँकि हमारी संस्कृति हमें सूरज ढलने के बाद बाहर निकलने की इजाज़त नहीं देती मगर फिर भी वो गयी) वो फ़िल्म देख के लौट रहे थे, घर दूर था और दोनों ही लोअर मिडिल क्लास के थे अतः ये फैसला किया गया कि बस में चला जाये वो भी प्राइवेट जिससे कुछ पैसे बच सकें.

अभी विचार किया ही था कि काल बस के रूप में सामने आ गया. बस खाली थी शायद 4 – 5 ही लोग थे ( इतने लोग काफ़ी होते हैं एक महिला को सामूहिक बलात्कार करने और एक बलशाली निहत्थे पुरुष को परास्त करने के लिए) दिसंबर का महीना ज़ाहिर है ठण्ड रही होगी दोनों हाथ में हाथ डाले एक दूसरे को एक टक देख रहे थे दोनों को एक दूसरे की आँखों में एक उज्जवल भविष्य नज़र आ रहा था. वो एक दूसरे को देख रहे थे कई आँखें उन्हें देख रही थी. ये क्रम कुछ देर चला फिर “उन आँखों” के पीछे का पशु जाग गया और उनके हाथ खुद-ब-खुद उसकी तरफ़, उन दोनों की तरफ़ बढ़ गए.

कोई हाथ होठों को छू रहा था तो कोई वक्षों को निचोड़ रहा था कोई हाथ जाँघों के बीच था तो कोई नाभि पर कुछ हाथ उसके दोस्त को बेतरतीबी से पीट रहे थे कुछ हाथ अपना काम कर रहे थे कुछ हाथ जबरन उसके कपड़े उतार रहे थे तो कुछ हाथ अपनी – अपनी पेंट की ज़िप, बेल्ट, अंडरवियर के इर्द गिर्द थे…

“दो हाथ” इतने हाथों के आगे लाचार हो गए थे. गिद्ध और चीलें उसपर टूट चुकीं थी. उसका सामूहिक बलात्कार हो रहा था. उसकी योनि रक्त रंजित थी एक के बाद एक प्रतिघात सहते हुए वो लगभग मृत हो चुकी थी. काम हो चुका था इतने में उन हाथों में से एक हाथ लोहे की रॉड लिए हुए आया और एक ही झटके में उसे उसने उस युवती की योनि में समाहित कर दिया…

वो खून से लथपथ पड़ी थी उसका मित्र होश में आने के बाद लोगों से मदद की दरकार करता रहा मगर कोई नहीं आया. अंत में जैसे तैसे वो अस्पताल आई हर जगह से रक्त अपना रास्ता बना रहा था. सामने पिता थे लाचार मजबूर पिता, दर्द से करहाती बेटी… दोनों की नम आँखें एक दूसरे से सवाल जवाब कर रही थी, मगर ख़ामोशी से… ऐसी ख़ामोशी जो एक चींख से ज्यादा घातक थी.

वो इस दुनिया से चली गयी… ख़ामोशी से… निर्भया ईश्वर तुम्हें स्वर्ग में स्थान दे दोषियों का निर्णय ईश्वर करेगा. हमारे मुल्क का कानून अँधा और बहरा है…!!!

– बिलाल एम जाफ़री

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