युद्ध अवश्यम्भावी है, ज़रा अपने गुस्से को पालो, भावनाओं को काबू में रखो

युद्ध तो होना ही है, युद्ध को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है… रोकना किसी के बस की बात नहीं… रुकना उसको है नहीं, नियति ये कह रही है…

आप एक ऐसे rogue देश से उलझे हुए हैं जो आपको शांति से रहने ही देना नहीं चाहता… ध्यान से पढ़िए और आप अपनी टिप्पणी करने को स्वतन्त्र हैं अपनी समझ के अनुसार.

मई 1857 में जब मेरठ और कानपुर की सैनिक टुकड़ियों ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया तो वो सबसे पहले बहादुर शाह जफ़र के महल पर गए और ज़फर को अपना बादशाह घोषित कर दिया और उनके नेतृत्व में लड़ने की पेशकश कर दी.

ज़फर ने आदेश दिया कि इन उजड्ड पुरबिया सैनिकों को भगाओ जिन्होंने मेरा महताब बाग़ बिगाड़ दिया और वहां घोड़े बाँध रखे हैं.

ज़फर की बेगम जीनत ने ज़फर समझाया कि ये मजबूत पुरबिया लड़ाके अंग्रेज़ों को भगा देंगे और एक बार फिर से महान तैमूर की मुग़लिया सल्तनत देश पर काबिज होगी.

मौलानाओ ने समझाया कि ये मौका है इनके दम पर वापस मुग़लिया शान कायम करने का. तो ज़फर मजबूरी में ग़दर को समर्थन देने को तैयार हुआ.

कई पलटनें बगावत करके दिल्ली आ रही थीं. उसमें थी ब्रिगेड बरेली… ब्रिगेड आ गयी जिसका नेतृत्व बख्त खां कर रहा था जो मौलवी सरफराज़ अली का चेला था… मौलवी सरफ़राज़ अली को मुजाहिदीनों का मौलवी कहा जाता था…

एक तरफ बाग़ी (हिन्दू + मुसलमान, दोनों) अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे तो दूसरी तरफ सरफ़राज़ अली ने घोषणा कर दी कि अब वापस मुगलियता सल्तनत कायम होगी… पहले इन हिन्दू काफिर सैनिकों को मारा जाएगा… फिर विदेशी गोरों को मार के हिंदुस्तान में शरिया कानून का राज कायम किया जाएगा…

जब रिज पर अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया और दरियागंज – मेटकॉफ हाउस आदि जगहों पर बागियों से भीषण युद्ध लड़ रहे थे तो बागियों ने उनको पीछे से घेरने को योजना बनाई… इस योजना के अनुसार नीमच ब्रिगेड को नजफगढ़ के रास्ते पीछे से अंग्रेज़ों को घेरना था.

24 अगस्त को नीमच ब्रिगेड अंग्रेज़ों को घेरने ले लिए चली… उसकी मदद के लिए पीछे से बख्त खां 9000 सिपाही और 13 तोप लेकर चला.

बारिश हो रही थी, नाले को पार करके निकलना था. नीमच ब्रिगेड के दस्ते नाले में दाखिल हुए और दलदल में चल कर आगे बढ़ रहे थे.

अंग्रेज़ों ने अपने सबसे क्रूर सिपाही निकलसन को इनसे लड़ने को भेजा था. जब नीमच ब्रिगेड का दस्ता नाले और दलदल में उतर गया तो निकलसन ने गोलियों की बौछार कर दी.

ये सिपाही न वापस आ सकते थे और न ही आगे बढ़ सकते थे, बचाव के लिए कोई आड़ भी नहीं थी, सिपाही दलदल में खड़े होकर गोली चलाने का और बख्त खां से मदद पाने के लिए चिल्लाते रहे.

सब सिपाही वहीँ दलदल में खड़े-खड़े गोली खा के मर गए. अंग्रेज़ों ने एक साथ पूरी ब्रिगेड के 1500 सैनिक मार डाले. जब सिपाहियों की गोली ख़त्म हो गयी तो घुटने भर दलदल में फंसे सिपाहियों की गर्दन संगीनों से उड़ा दी गयी.

लाल किले में खबर आ चुकी थी कि किस तरह नीमच ब्रिगेड को आगे कर के बख्त खान पीछे लौट आया और कुछ दूर से सारा तमाशा देख रहा था और खुश था कि काफिर मारे गए… 1857 के लड़ाके दो फाड़ हो चुके थे…

जब लड़ाकों ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया तो बहुत सारे अँगरेज़ मारे गए, कई भाग गए. ऐसे ही एक बचकर भागा हुआ आदमी 17 दिन बाद अंग्रेज़ों की अम्बाला छावनी में पहुंचा जो सिर्फ कच्छे में था और शरीर पर अनगिनत घावों के निशान थे.

दो दिन बाद जब वो होश में आया तब लोगों को पता चला कि वो दिल्ली से भागा हुआ रास्ते भर लुटता, मारा खाता हुआ आया आदमी दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश थिओ मेटकाफ है.

दो दिन के आराम के बाद थिओ मेटकाफ पुनः अँगरेज़ सेना के साथ लड़ने के लिए दिल्ली की ओर कूच कर गया. दिल्ली पर वापस कब्जे की लड़ाई में सितम्बर, लड़ाई के अंत तक साथ लड़ा और दिल्ली पर काबिज़ हुआ.

बदले की आग में तपे थिओ मेटकाफ ने कम से कम 1000 बागी सैनिक खुद मारे थे और जबकि 10000 से ऊपर दिल्ली के लोगों फांसी पर लटकाया था.

शहर में काबिज़ 75000 से ऊपर बागी सैनिकों का 2 महीने तक सिर्फ 5000 अँगरेज़ सैनिकों ने सामना किया था. जिसमे 100 के ऊपर गैर सैनिक अँगरेज़ थे और 17 महिलाएँ थीं. एक महिला 5 माह की गर्भवती थी और वो बन्दूक लेकर बागियों से लड़ी थी.

जुलाई से अगस्त तक 2500 अँगरेज़ मारे गए थे और उनकी लाशें दफनाई नहीं जा सकी थीं. वो गर्भवती महिला और अन्य सड़े, गले बदबू मारते लाशों के बीच मोर्चा संभाले थे. कम से कम 500 तो बीमारियों से मारे गए थे. फिर भी जब तक निकलसन बड़ी सेना लेकर नहीं पहुँचा, इन्होने मोर्चा नहीं छोड़ा और उस महिला ने बच्चे को युद्ध भूमि में ही जन्म दिया.

सितम्बर के अंत में शुरुआती 5000 और नए आए विलसन के नेतृत्व में निकलसन के 9000 सैनिकों ने, होडसन के अनुशासन और थिओ मेटकाफ के जूनून ने दिल्ली में 1 लाख से ऊपर बागी सैनिकों को हरा दिया. दिल्ली लाशों का ढेर बनी हुई थी.

जब वो युद्ध हुआ तो युद्ध में कोई निष्पक्ष नहीं रह सका. ज़फर मजबूरी में बागियों के साथ आये, बख्त खां और मौलाना लोग मुग़लिया सल्तनत के वापस कायम होने और शरिया लागू करने के लिए लड़े. बागी सैनिक अंग्रेज़ों को भगाने के लिए लड़े.

जीनत महल अपने बेटे मिर्ज़ा जवांबख्त को अगला शहंशाह बनाने ले लिए अंग्रेज़ों से अंदरखाने जुगाड़ लगाते हुए लड़ी. मिर्ज़ा मुग़ल बहादुरी से लड़ा क्योंकि वो ज़फर के नेतृत्व में तैमूर वंश का शासन वापस चाहता था.

पादरी जॉन जेनिंग्स दिल्ली में ईसाई बने उन लोगों को सबक सिखाने के लिए लड़ा जो ईसाई होते हुए भी ग़दर के समय अंदर बैठे रहे और बागियों तथा ज़फर के खिलाफ खड़े नहीं हुए – तथस्थ बने रहे.

जनरल सुधरी सिंह और मेजर हीरा सिंह भी लड़े अंग्रेज़ों को भगाने और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लेकिन इस्लाम राज कायम करने के बख्त खां के स्वप्न के जूनून ने उनको मरवा दिया.

ब्रिगेडियर गौरी शंकर शुकुल भी लड़ा, पहले बागियों की तरफ से, फिर अंग्रेज़ों की तरफ से, अपनी जान बचाने और कुछ पाने के लड़ा लेकिन जिन्दा न रह सका क्योंकि अंग्रेज़ों ने हर तरफ के गद्दारों को फांसी चढ़ाया.

दिल्ली के अमीर और तटस्थ व्यापारी शिवाकांत, जहीर और अन्य भी थे लेकिन बच न सके, उनको बागियों ने मारा और अगर बचे तो अंग्रेज़ों ने मारा.

ज़फर का बड़ा बेटा मिर्ज़ा फखरू जो सूफी शायर था और कोई लड़ाई नहीं लड़ना चाहता था लेकिन उससे ज़ीनत महल लड़ी और ज़हर देकर मार डाला ….

युद्ध अवश्यम्भावी है… युद्ध होगा लेकिन भारत की भूमि को “दारुल हर्ब” यानि लड़ाई का मैदान नहीं बनने देना है जो कि वामपंथियों और कट्टर वहाबियों की चाह है…

युद्ध से पहले इन लोगों को पहचान करके सही जगह पहुँचाना है जिससे ये अंदर की जंग न छेड़ पाएं और सीमा पर लड़ रहे सैनिकों को नीमच ब्रिगेड के अंजाम को न पहुंचा पाएं…

इस युद्ध में दिल्ली का शासक मजबूर ज़फर नहीं होना चाहिए जो कुछ अतिउत्साही लोगों के दबाव में लड़ाई छेड़ दे… लड़ाई जब अंजाम पहुंचेगी तो दिल्ली के शासक को पृथ्वीराज चौहान भी नहीं बनने देना है…

इस लड़ाई में सन 712 की गलती नहीं दुहरानी है, 1857 की तरह अपने ही देश को “दारुल हर्ब” भी नहीं बनने देना है, उससे पहले उनको कुचलना है… इस लड़ाई में 1948 और 1971 की गलतियों को भी नहीं दुहराना है…

अगर आप “दारुल हर्ब” नहीं बनने देना चाहते तो जाइए जहाँ मरा हुआ जानवर पड़ा हो और तीव्र दुगंध उठ रही हो, उस जगह 1 घंटे गुजारिये, सिली गुथी लाशों को देखकर दिल मजबूत कीजिये क्योंकि आप लड़ाई का हिस्सा तो बन जाओगे…

तटस्थ कोई नहीं रहेगा… जीतेगा वही जो उस गर्भवती अँगरेज़ महिला की तरह दुर्गन्ध और लाशों के बीच रहकर मोर्चा संभाले रहेगा… जीतेगा वो जिसकी तैयारी अद्भुत और अभूतपूर्व होगी…

अपने गुस्से को पालो… अपनी भावनाओं को काबू में रखो…

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