अरब का इतिहास : भाग-4

अरब के बारे में एक गलत धारणा डाली गई है कि ये लोग इब्राहीम के बेटे इस्माईल के वंशज हैं. ये अवधारणा सही नहीं है. अरबों का वजूद इस धरती में हजरत नूह (नोहा) से भी काफी पहले का है पर कुछ लोगों के अनुसार अरब में जो आबादी सबसे पहले बसी थी वो नूह के बेटे हाम की औलादों में थी तो दूसरी मान्यता मूल अरबों को नूह के दूसरे बेटे साम की औलाद मानती है.

[अरब का इतिहास : भाग-3]

अरबों की तीन किस्मों में जिन बायदा अरबों का जिक्र पहले किया था ये वो लोग थे जो मूल (original) अरब थे. इनका इतिहास सबसे प्राचीन है और ये अरबी भाषा के जनक माने जातें हैं पर ये वो लोग थे जो आंधी-तूफ़ान, बाढ़, महामारी वगैरह के चलते नष्ट हो गये. इन अरबों में अब कोई भी बाकी नहीं बचा है. इन अरबों से जुड़ी निशानियाँ यशरिब (मदीना) से खैबर और मद्यन के रास्ते में तथा यमन वगैरह में आज भी पाई जाती हैं.

[अरब का इतिहास : भाग-2]

बायदा अरबों में पहला नाम आता है आद जाति का. ये जाति लगभग 2500-3000 ईसा पूर्व नष्ट हुई थी और यमन के पास हजरमौत नाम की जगह पर और कुछ ओमान के पास आबाद थी. ये लोग बड़े शक्तिशाली हुआ करते थे.

[अरब का इतिहास : भाग-1]

कहते हैं कि अरब के सर्वप्रथम बादशाह आद जाति से हुए थे, इनका रूतबा आस-पास के तमाम इलाकों में था. आद लोग मूर्तिपूजक और बहुदेववादी थे तथा मुख्यतया तीन तरह की देवियों की उपासना किया करते थे जिनके नाम समदा, समूदा तथा हरा था. ‘आद’ इस वंश के मुखिया का नाम था.

[अरब का वो इतिहास जिसे हम सबको जानना चाहिये]

कुछ मान्यता इन्हें भगवान श्रीकृष्ण से संबद्ध करते हुए कहती हैं कि ये यदुवंश के उन बचे लोगों में से थे जो यादवी संग्राम के दौरान द्वारिका के जलमग्न होने से पूर्व वहां से निकल गये थे.

इन लोगों में हूद नाम के सुधारक भेजे जाने का वर्णन मिलता है, हूद को कुछ लोग नूह के बेटे साम का पोता मानते हैं. हूद के बारे में कहा जाता है कि उनकी कब्र आज भी हजरमौत में मौजूद है, उस जगह पर अब बड़ा मेला लगता है.

आद लोगों का एक नाम इरम भी था, इन लोगों ने कई बड़े और भव्य नगर बसाये थे. इब्रानी लोग आद लोगों को रशम कहा करते थे, इब्रानी में रशम का अर्थ है पत्थरों में रहने वाले. आज भी मद्यन इलाके के पहाड़ों में इनके द्वारा बनाये गुफाओं का निशान मिलता है. उन गुफाओं में आरामी और समुदी भाषा में लिखे कई अभिलेख मिले हैं जिन्हें पढ़ने की कोशिश जारी है.

एक प्रचंड तूफान में ये जाति नष्ट हुई. कुछ विद्वान ये भी मानतें हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात् हुए विस्थापन ने कई लोगों को अरब और उसके निकटवर्ती प्रदेशों में आबाद कर दिया था. शाम देश (सीरिया) भगवान कृष्ण के नाम श्याम से साम्यता रखता है.

बायदा अरबों में एक नाम समूद जाति का भी है. समूद या समुद्र जाति का वर्णन सबसे पहले अरस्तू आयर बतलीमूस की किताबों में मिलता है, ये लोग हिजाज और तबूक के दरमियान आबाद थे और भवन निर्माण में बड़ी कुशलता रखते थे तथा बड़े कुशल समुद्री व्यापारी थे.

सालेह या फल्ज़ नाम के व्यक्ति को इनका सुधारक माना जाता है. सालेह भी नूह-वंशी थे और उनके दादा समूद के नाम पर उनकी जाति का ये नाम था. इनका काल इब्राहीम से 300 से 500 साल पहले का है. सालेह को तौरात में फल्ज़ नाम से बुलाया गया है और उत्पत्ति ग्रन्थ में उनका वर्णन आता है.

कुरान इस जाति को मूसा से पहले का बताता है. ये जाति पहाड़ों में मकान बनाकर रहा करती थी और बहुदेवतावादी थी. मूर्तिपूजक भी थी क्योंकि इनके द्वारा बनाये घरों के जो निशान मिले हैं उसमें मूर्ति और देवी-देवताओं की दीवारों पर उकेरी गई तस्वीरें मिली है.

इस कड़ी में कौमे-लूत का नाम भी शामिल है जो ओमान के इलाके में आबाद थे, ये जाति भी एक प्राकृतिक आपदा के चलते विनष्ट हुई थी. इसके अलावा अबैल, अमालका, तसम, जदीस जैसी कौमें भी वहां आबाद और विनष्ट होतीं रहीं.

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