क्या यह दुकान मेरे देश में नहीं हो सकती?

कई बार हम अपने जीवन में ईमानदारी की इतनी क़समें खा लेते हैं कि कभी-कभी वह जहर के समान प्रतीत होने लगता है. हमने अपनी ईमानदारी को सिर्फ और सिर्फ किताबों में, पिक्स में, प्रवचन में, वीडियोस में.. अपने दिमाग के कोने में दबा रखा है.

ईमानदारी भी दो प्रकार की होती है – निजी ईमानदारी और राष्ट्रीय ईमानदारी. निजी ईमानदारी तो चलो मान लेते हैं कि आपसी लोक व्यवहार में गतिशील रहता है, वह भी केवल give & take की भावना से ही.. लेकिन जहां तक राष्ट्रीय ईमानदारी की बात है उसमें लगभग हर भारतीय फिसड्डी है. उसमें मैं भी शामिल हूँ, आप भी.. हम सब बराबर के दोषी हैं. जिसको मौका मिला नल की टोंटी उखाड़ ली, जिसको हाथ साफ करने का अवसर मिला उसने सरकारी CFL भी चुरा ले गये. जिसको मौका मिला वह बेईमान बन गया.

कुछ छोटी-छोटी घटनाएं हमारे जीवन को एक नई प्रेरणा देती हैं. हमारे मानव मस्तिष्क में विचारों की स्मृतियां पूर्व से ही विद्यमान रहती हैं जो समय बीतने के साथ-साथ धुंधली सी पड़ जाती हैं.

कल ही मैं Travel XP चैनल पर शायद ऑस्ट्रेलियन लोगों की जीवनशैली से जुड़ी जानकारियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा था. उस प्रस्तुतिकरण के एक अंश में यह दिखाया गया कि एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी मोटरकार से एक लंबी सैर पर निकलता है. और जब उसे भूख लगती है तो सड़क के पास एक fruit shop पर जाता है. जहां उसे दुकान पर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ मिलता है – ईमानदारी से मूल्य चुकाएं. फिर वह बूढ़ा व्यक्ति पहले अपने मनपसन्द फल को चुनता है, एक मशीन में सिक्के गिराता है और बाद में वह फल को खाता है.

एक फल खाने के बाद उसने कई फल इसी तरह से सिक्के गिराकर तब खरीदे.  फिर अपनी मौज में चल दिया. मेरे लिए यह अद्भुत था. ध्यान देने की बात है कि वह फल किसी वेंडिंग मशीन से निकलते नहीं थे, बल्कि दुकान पर कतारबद्ध पंक्तियों में पसरे हुए थे. तो यह है जीवनशैली का एक अंग ! लोक-व्यवहार का एक अलग ही रंग, जो दिल को छू गया.

यह घटना देखकर बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ गई – एक व्यक्ति सुदूर देश जाता है, जहां पर हर शहर में उसे दुकान पर कोई दुकानदार बैठा हुआ नहीं मिलता था. वस्तु की कीमत लिखी हुई रहती थी, वहां के स्थानीय लोग कीमत देकर ही आवश्यकता की वस्तुएं खरीद रहे थे.

और संक्षेप में,  सबसे बड़ी बात यह कि उस देश के लोगों को “चोरी” क्या होती है.. इसका पता तक न था. नैतिक मूल्यों को व्यवहारिक रूप में कैसे लाया जा सकता है, उस कहानी से यह सीख मिली थी. लेकिन सच में कहीं ऐसा होता है, यह मालूम नहीं था.

मैंने भी अपने बचपन में अंग्रेजी में रट्टा मार-मार के प्रश्नों के उत्तर लिखे थे और हर समय बढ़िया नम्बरों से पास होता था. मेरी याददाश्त तेज थी तो यह चोरी बड़ी आसानी से सफल हो जाती थी. लेकिन आज वह मुझे याद नहीं तो ज्ञान की न्यूनता आत्मा को कचोटती है. व्यक्ति के जीवन में व्यवहारिक पक्ष हमेशा प्रबल होना चाहिए. क्योंकि व्यक्ति की व्यवहारिक अभिव्यक्ति से ही समाज वृहत रूप में अपनी अभिव्यक्ति को प्रस्तुत कर पाता है.

जब मेरे देश की पोथियों को पढ़कर ही विदेशी समाज अच्छी नीतियों को व्यवहारिक रूप में क्रियान्वित कर रहा है तो हम इतने पीछे क्यों हैं ? क्या यह दुकान मेरे देश में नहीं हो सकती ? हो सकती है, लेकिन आप को ईमानदार बनना होगा. सिर्फ रट्टा मत मारिये कि “Honesty is the best policy”………………………

नोट- जिनको ईमानदारी शब्द से समस्या हो रही हो वह ईमानदारी के बदले “विश्वास” शब्द को पढ़ लें.

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