पुनर्जीवित कीजिये भारतीय प्राच्य इंजीनियरिंग विद्या को!

प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग ग्रन्थ :
विश्व के सबसे पहले तकनीकी ग्रंथ विश्वकर्मीय ग्रंथ ही माने गए हैं. विश्वकर्मीयम ग्रंथ इनमें बहुत प्राचीन माना गया है, जिसमें न केवल वास्तुविद्या, बल्कि रथादि वाहन व रत्नों पर विमर्श है. विश्वकर्माप्रकाश, जिसे वास्तुतंत्र भी कहा गया है, विश्वकर्मा के मतों का जीवंत ग्रंथ है. इसमें मानव और देववास्तु विद्या को गणित के कई सूत्रों के साथ बताया गया है, ये सब प्रामाणिक और प्रासंगिक हैं. विश्वकर्मा प्रकाश के अध्यायों के नाम हैं- भूमिलक्षण, गृह्यादिलक्षण, मुहुर्त, गृहविचार, पदविन्यास, प्रासादलक्षण, द्वारलक्षण, जलाशयविचार, वृक्ष, गृहप्रवेश, दुर्ग, शाल्योद्धार, गृहवेध.

ग्रन्थ अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्नों पर विश्वकर्मा द्वारा दिए उत्तर लगभग साढ़े सात हज़ार श्लोकों में दिए गए हैं. संयोग से यह ग्रंथ 239 सूत्रों तक ही मिल पाया है. कहा जाता है कि इस ग्रन्थ में जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊ तैयार करने का वर्णन है.

शिल्पशास्त्र में लम्बाई मापने कि लिये सब से छोटा मापदण्ड ‘पारामणु’ था जो आधुनिक इंच के 1/349525 भाग के बराबर है. यह मापदण्ड न्याय विशेषिका के ‘त्रास्रेणु’ (अन्धेरे कमरे में आने वाली सूर्य किरण की रौशनी में दिखने वाला अति सूक्षम कण) के बराबर था.  वराहमिहिर के अनुसार 86 त्रास्रेणु एक उंगली के बराबर (एक इंच का तीन चौथाई भाग) होते हैं. 64 त्रास्रेणु एक बाल के बराबर मोटे होते हैं.

मानसार शिल्पशास्त्र शिल्पशास्त्र का प्राचीन ग्रन्थ है जिसके रचयिता मानसार हैं. इसके 43 वें अध्याय में ऐसे अनेक रथों का वर्णन है. जो वायुवेग से चल कर लक्ष्य तक पहुँचते थे. उनमें बैठा व्यक्ति बिना अधिक समय गवाँए गंतव्य तक पहुँच जाता था.

मानसर शिल्पशास्त्र ब्रह्मा की स्तुति से आरम्भ होता है जो ब्रह्माण्ड के निर्माता हैं. यह ग्रन्थ शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर समाप्त होता है. इसमें लगभग 70 अध्याय हैं जिनमें से प्रथम आठ अध्यायों को एक भाग में रखा गया है. आगे के दस अध्याय दूसरा समूह बनाते हैं. इसके बाद मानसार का केन्द्रीय भाग आता है. अध्याय 19 से अध्याय 30 में एकमंजिला भवन से लेकर 12 मंजिला भवन का वर्णन  करते हैं. अध्याय 31 से अध्याय 50 में वास्तुशिलप (आर्किटेक्चर) की चर्चा है.

इसके बाद मूर्तिकला की चर्चा आती है जो अध्याय 51 से अध्याय 70 तक की गयी है. अध्याय 51 से अध्याय 70 की सामग्री को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है- अध्याय 51 से अध्याय 65 तक युद्ध अस्त्र शस्त्र निर्माण का एक समूह है तथा अध्याय 66 से अध्याय 70 तक धातुकर्म का दूसरा समूह.

मयमतम् के 36 अध्यायों के नाम इस प्रकार हैं-

संग्रहाध्याय, वास्तुप्रकार, भूपरीक्षा, भूपरिग्रह, मनोपकरण, दिक्-परिच्छेद, पाद-देवता-विन्यास, बालिकर्मविधान, ग्रामविन्यास, नगरविधान, भू-लम्ब-विधान, गर्भन्यासविधान, उपपित-विधान, अधिष्ठान विधान, पाद-प्रमान-द्रव्य-संग्रह, प्रस्तर प्रकरण, संधिकर्मविधान, शिखर-करण-विधान समाप्ति-विधान, एक-भूमि-विधान, द्वि-भूमि-विधान, त्रि-भूमि-विधान, बहु-भूमि-विधान, प्रकर-परिवार, गोपुर-विधान, मण्डप-विधान, शाला-विधान, गृहप्रवेश, राज-वेस्म-विधान, द्वार-विधान, यानाधिकार, यान-शयनाधिकार, लिंगलक्षण, पीठलक्षण, अनुकर्म-विधान, प्रतिमालक्षण.


प्राचीन भारतीय प्रमुख विश्वकर्मीय ग्रन्थ लगभग 350 से भी अधिक उपलब्ध हैं. ये ग्रन्थ भारत में संस्कृत में तथा यूरोप में अंग्रेजी में या जर्मन में उपलब्ध हैं. इनमें से प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं:

>>अपराजितपृच्छा (रचयिता : भुवनदेवाचार्य ; विश्वकर्मा और उनके पुत्र अपराजित के बीच वार्तालाप सिविल तथा मेकेनिकल इंजीनियरिंग के सिद्धांत )

>>ईशान-गुरुदेवपद्धति : चरखा , धुरी , पुली , पहिया आदि का निर्माण

>>कामिकागम : मुख्यतः सामुद्रिक बड़े जहाज बनाने तथा नदी नौका परिवहन का वैज्ञानिक ग्रन्थ , इसमें कम्पास निर्माण चुम्बक सिधांत , द्रव बहाव यांत्रिकी , टरबाइन आदि का वर्णन है

>>कर्णागम (इसमें वास्तु पर लगभग 40 अध्याय हैं. इसमें तालमान का बहुत ही वैज्ञानिक एवं पारिभाषिक विवेचन है.)

>>मनुष्यालयचंद्रिका (कुल 7 अध्याय, 210 से अधिक श्लोक) : कांसा लकड़ी तथा लोहे का भवन निर्माण में प्रयोग , धातुओं को आपस में जोड़ने हेतु रिवेट निर्माण

>>प्रासादमण्डन (कुल 8 अध्याय): महल वास्तुशिल्प का ग्रन्थ

>>राजवल्लभ (कुल 14 अध्याय): सिक्के ढालने की मशीने तथा टकसाल पद्धति

>>तंत्रसमुच्चय : यंत्रो की गणित तथा डिजाइन , इस ग्रन्थ में रॉकेट बनाने का वर्णन है

>>वास्तुसौख्यम् (कुल ९ अध्याय): आर्किटेक्चर का महान ग्रन्थ

>>विश्वकर्मा प्रकाश (कुल 13 अध्याय, लगभग 1374 श्लोक)

>>विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र (कुल 84 अध्याय)

>>सनत्कुमारवास्तुशास्त्र

>> शिल्पसन्हिता : आर्किटेक्चर का महान ग्रन्थ , इसमें श्री विश्वकर्मा द्वारा रचित एक ‘दिव्य-दृष्टि’ नामक यंत्र का जिक्र है . इस यंत्र से राजभवन में बैठकर भी युद्ध-मैदान के दृश्य देखे जा सकते थे. यही यंत्र आजकल दूरदर्शन (टेलीविजन) कहलाता है. शिल्प संहिता में विश्वकर्मा निर्मित ‘दूरवीक्षण-यंत्र’ का वर्णन किया गया है.

>> राजाभोज की ‘समरांगण सूत्रधार’ (1100 ईस्वी) में कई याँत्रिक खोजो का वर्णन है जैसे कि चक्री (पुल्ली), लिवर, ब्रिज, छज्जे (केन्टीलिवर) आदि.  कुल 84 अध्याय, 8000 से अधिक श्लोक

>> पातञ्जली ऋषि ने लोहशास्त्र ग्रन्थ में धातुओं के प्रयोग से कई प्रकार के रसायन, लवण, और लेप बनाने के निर्देश दिये हैं. धातुओं के निरीक्षण, सफाई तथा निकालने के बारे में भी निर्देश हैं. स्वर्ण तथा पलेटिनिम को पिघलाने के लिये ‘अकुआ रेगिना’ तरह का घोल नाइटरिक एसिड तथा हाइड्रोक्लोरिक एसिड के मिश्रण से तैय्यार किया जाता था.

>>वास्तुमण्डन

>>मयशास्त्र : (भित्ति सजाना)

>>बिम्बमान : (अजंता एलोरा जैसी अमिट दीवार चित्रकला की पद्धति )

>>शुक्रनीति (प्रतिमा, मूर्ति या विग्रह निर्माण)

>>सुप्रभेदगान : पुल बनाने के सिधांत एवं पुलों की संरचना

>>आगम (इनमें भी शिल्प की चर्चा है.)

>>प्रतिमालक्षणविधानम् : मूर्तिकला

>>गार्गेयम् : बाँध बनाने के तरीके , नहरें एवं सिंचाई कला

>>मानसार शिल्पशास्त्र (कुल 70 अध्याय; 5100 से अधिक श्लोक; कास्टिंग, मोल्डिंग, कार्विंग, पॉलिशिंग, तथा कला एवं हस्तशिल्प निर्माण, युद्ध अस्त्र शस्त्र निर्माण , धातुकर्म  के अनेकों अध्याय)

>>अत्रियम् : राजपथ तथा ग्रामपथ निर्माण , सराय धर्मशाला निर्माण , घोड़ों हाथियों ऊंटों के स्थान के निर्माण , तालाब निर्माण

>>प्रतिमा मान लक्षणम् (इसमें टूटी हुई मूर्तियों को सुधारने आदि पर अध्याय है.)

>>दशतल न्याग्रोध परिमण्डल : दस मंजिल भवनों तथा जमीन के अन्दर दस मंजिल तहखानो के निर्माण , सुरंगों के निर्माण का वर्णन

>>शम्भुद्भाषित प्रतिमालक्षण विवरणम् : मूर्तिकला

>>मयमतम् (मयासुर द्वारा रचित, कुल 36 अध्याय, 3300 से अधिक श्लोक) : राजधानी निर्माण , टाउन प्लानिंग , नगर जल प्रदाय , नगर महल सड़क कुये बावड़ी नहर , विमान विद्या , खगोल विद्या कलेंडर , धातुकर्म , खदान , जहाज निर्माण , मौसम विज्ञान , जल शक्ति , वायु शक्ति , सूर्य सिधान्त आदि

>>बृहत्संहिता (अध्याय 53-60, 77, 7९, 86)निर्माण

>>शिल्परत्नम् (इसके पूर्वभाग में 46 अध्याय कला तथा भवन/नगर-निर्माण पर हैं. उत्तरभाग में 35 अध्याय मूर्तिकला आदि पर हैं.)

>>युक्तिकल्पतरु (आभूषण-कला सहित विविध कलाएँ)

>>शिल्पकलादर्शनम्

>>वास्तुकर्मप्रकाशम् : खिडकी एवं दरवाजा आदि निर्माण

>>कश्यपशिल्प (कुल 84 अध्याय तथा 3300 से अधिक श्लोक) : पहिया तथा रथ निर्माण , कृतिम झील निर्माण, बिना पहिये के वाहनों का निर्माण (स्लेज गाड़ी ) ,

>>अलंकारशास्त्र : स्वर्ण तथा रजत शुद्धिकरण , परीक्षण व आभूषण निर्माण

>>चित्रकल्प (आभूषण)

>>चित्रकर्मशास्त्र

>>मयशिल्पशास्त्र (तमिल में)

>>विश्वकर्मा शिल्प (स्तम्भों पर कलाकारी, काष्ठकला)

>>अगत्स्य (काष्ठ आधारित कलाएँ एवं शिल्प)

>>मण्डन शिल्पशास्त्र (दीपक आदि)

>>रत्नशास्त्र (मोती, आभूषण आदि)

>>रत्नपरीक्षा (आभूषण)
>>रत्नसंग्रह (आभूषण)
>>लघुरत्नपरीक्षा (आभूषण आदि)
>>मणिमहात्म्य (lapidary)
>>अगस्तिमत (lapidary crafts)
>>नलपाक (भोजनालय निर्माण , पात्र कलाएँ)
>>पाकदर्पण (भोजनालय निर्माण , पात्र कलाएँ)
>>पाकार्नव (भोजनालय निर्माण, पात्र कलाएँ)
>>कुट्टनीमतम् (वस्त्र कलाएँ)
>>कादम्बरी (वस्त्र कला तथा शिल्प पर अध्याय हैं)
>>समयमात्रिका (वस्त्रकलाएँ)
>>यन्त्रकोश (संगीत के यंत्र )

>>संगीतरत्नाकर (संगीत से सम्बन्धित शिल्प)
>>चिलपटिकारम् ( दूसरी शताब्दी में रचित तमिल ग्रन्थ जिसमें संगीत यंत्रों पर अध्याय हैं)
>>मानसोल्लास (संगीत यन्त्रों से सम्बन्धित कला एवं शिल्प,पाकशास्त्र, वस्त्र, सज्जा आदि)
>>वास्तुविद्या (मूर्तिकला, चित्रकला, तथा शिल्प)
>> भारद्वाज रचित वैमानिक शास्त्र : इसमें 52 प्रकार के विमानों का सचित्र निर्माण दिया है
>>उपवन विनोद (उद्यान, उपवन भवन निर्माण, घर में लगाये जाने वाले पादप आदि से सम्बन्धित शिल्प)

>>वास्तुसूत्र (संस्कृत में शिल्पशास्त्र का सबसे प्राचीन ग्रन्थ; 6 अध्याय; )

>> नागार्जुन द्वारा रचित रस रत्नाकर, रसेन्द्र मंगल आदि ग्रन्थ   : पारा धातु का शुद्धिकरण व उपयोग , रसायनों का प्रयोग रंगाई, टेनिंग, साबुन निर्माण, सीमेन्ट निर्माण, तथा दर्पण निर्माण , केलसीनेशन, डिस्टिलेशन, स्बलीमेशन, स्टीमिंग, फिक्सेशन, तथा बिना गर्मी के हल्के इस्पात निर्माण , कई प्रकार के खनिज लवण, चूर्ण और रसायन तैय्यार किये जाने की विधियाँ .
>> अगस्त्य द्वारा रचित अगस्त्य संहिता : विद्युत् कर्म , बैटरी निर्माण

इनमे से कुछ ग्रन्थ 1947 के पूर्व अंग्रेज , जर्मन , इटालियन आदि यूरोप  ले गए. उन्होंने इनका अध्ययन कर तकनीकी अविष्कार किये. आज आवश्यकता है कि इन ग्रंथों का अनुवाद भारतीय भाषाओँ में किया जाए और भारतीय प्राच्य इंजीनियरिंग विद्या को पुनर्जीवित किया जाए. क्या मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस हेतु पहल करेगा?

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