क़ुरबानी में खुद काटना सीख लीजिये अपना पाला बकरा

ज्यादातर लोग अफजल से तो वाकिफ ही होंगे. ना भाई, वो टटपूँजिया टंगा हुआ जेहादी टाइप नहीं. वो बड़े वाला, सीनियर जो शिवाजी वाला था.

उसका किस्सा बड़ा इंटरेस्टिंग है. शिवाजी से करीब डेढ़ फुट ऊँचा रहा होगा, वजन में भी दोगुना. कई लड़ाइयों में उसके जीत के और बर्बरता से हिन्दुओं को काटने-बलात्कार करने के किस्से भी थे.

ऐसे में जब उसे सरमद को क़त्ल करने वाले, जिन्दा पीर ने, फौजों के साथ रवाना किया तो एक तरह से वो मनोवैज्ञानिक रूप से जीत चुका था.

मगर ऐसी चालों का वापिस इस्तेमाल करना शिवाजी जरूरी मानते थे. वो किसी नैतिकता के महान धरातल पर चढ़कर जंग में मारे जाने को बहादुरी नहीं, पक्का बेवकूफी ही कहते होंगे. तो पहले तो शिवाजी ने ऐसा दिखाया जैसे वो भागे फिर रहे हों.

पीछा करता जब अफजल ऐसी जगह आ गया जहाँ शिवाजी के जीतने की संभावना ज्यादा थी तो बड़े प्यार से उसे सुलह के लिए बुलाया. लम्बा तगड़ा अफजल शिवाजी को एक हाथ में साफ़ करने में समर्थ रहा होगा.

लड़ने में उतने कच्चे मगर शिवाजी भी नहीं थे. एक तो पहले ही कवच पहन रखा था, अफजल के खंजर का कोई असर नहीं हुआ.

बड़े हथियारों के बदले उनके पास बिछुवा-बघनखा थे. पतले, पैने, लम्बे, घातक. अन्दर घुसे धारदार हथियारों से अफजल खूब छटपटाया होगा.

चीखा होगा, बचकर भागने की कोशिश की होगी, रहम की भीख भी मांगी होगी. ये सब मिलने के बदले और दस-बीस वार पर वार हुए होंगे, ये अलग बात है.

ये जब विशेष प्यार से, बिलकुल गले लगने को आतुर कोई साम्प्रदायिक व्यक्ति, समुदाय विशेष को बुलाता दिखता है तो मुझे भी शिवाजी याद आता है. दुष्ट बुड्ढा… फिर अफजल खान करेगा !

युद्ध कोई भावना बेन साथ लिए फिरने वालों के लिए होता भी नहीं. रहम की भीख मांगने पर छोड़ दोगे, फिर अपना पृथ्वीराज हो जाएगा. पानीपत पर छाती कूटते रहोगे, अफगानिस्तान तक कभी चढ़ोगे ही नहीं.

हम तो महान नैतिक हैं जी, राज कपूर टाइप हाथ उठा कर कहते रहना, जब पूरी कौम ही मिटा दी जायेगी तो किस्सों में भी कौन याद करेगा?

फिर उनमें और हम में क्या फर्क रह जाएगा जैसा कुछ पूछना है? भगवद्गीता का शुरूआती सवाल है, पूरी किताब इसी सवाल के जवाब से भरी पड़ी है. अगरबत्ती वाला स्टैंड हटाओ, वहां लाल कपड़े के अन्दर से निकालो, और पढ़ लो.

लड़ाई होगी तो मारे तो दोनों ही पक्ष के जायेंगे. बॉडी बैग्स जायेंगे भी, और बॉडी बैग्स घर भी आयेंगे. या तो क़ुरबानी में खुद का पाला बकरा खुद काटना सीख लीजिये मियां, या फिर रहने ही दीजिये. आपसे ना हो पायेगा.

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