अरब का इतिहास : भाग-3

अरब लोगों की तीन श्रेणियों में विभाजन का एक बड़ा आधार अरबी भाषा भी है. अरबी भाषा के बारे में एक बड़ी गलतफहमी है कि ये केवल मुसलमानों की भाषा है जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है.

[अरब का इतिहास : भाग-2]

इस्लाम के साथ इसका संबध मात्र इतना ही है कि कुरान जिस भाषा में उतरा था वो अरबी थी. अरबी संसार की प्राचीनतम भाषाओँ में एक मानी जाती है. सेमेटिक मजहब की भाषाओँ में यह हिब्रू के समकक्ष है.

[अरब का इतिहास : भाग-1]

भविष्य पुराण की माने तो नोहा (नूह) के जमाने में भगवान बिष्णु ने भाषा को सहज करने की दृष्टि से एक मलेच्छ भाषा को जन्म दिया था और उसे नोहा (नूह) को सिखाया था, इस भाषा को हिब्रू कहा गया जो दायें से बाईं ओर लिखी जाती है. ‘ही’ मतलब हरि और ब्रू मतलब बोला गया यानि जो भाषा हरि के द्वारा बोली गई वो हिब्रू कहलाई.

[अरब का वो इतिहास जिसे हम सबको जानना चाहिये]

इस्लाम के अहमदिया फिरके के संस्थापक की मान्यता थी कि अरबी भाषा सामी परिवार की दूसरी भाषाओं यथा इब्रानी, आरामी, सबाई, आशूरी, फिनीकी आदि भाषाओँ की जननी है पर उनके दावों को भाषा-विज्ञानियों की सहमति नहीं मिली.

भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार अरबी इन भाषाओँ की माँ नहीं बल्कि बहनें हैं क्योंकि अरबी भाषा के बहुत से शब्द तथा व्याकरण के नियम अन्य सामी भाषाओँ से साम्यता रखते है.

कुछ मान्यता ये भी है कि अरबी संस्कृत से जन्मी है. इसके प्रमाण में अरबी के कई शब्द गिनाये जाते हैं जो मूल संस्कृत से निकले हैं.

अरबी का संदल शब्द संस्कृत के चन्दन से, तनबूल शब्द ताम्बूल से, करनफल शब्द कर्णफूल से, कर्फास शब्द कर्पास से, नर्जिल शब्द नारिकेल से जन्मे है.

कुरान में भी कई शब्द हैं जो संस्कृत से निकले हैं, जैसे कुरआन की सूरह अद-दहर् की 17वीं आयत में आता है- ‘व युस्क़ौ न फ़ीहा कअसन का न मिज़ाजुहा जंजबीला’ अर्थात् और वहां उनको ऐसा जाम पिलाया जायेगा जिसमें सोंठ की मिलावट होगी. इस आयत में अदरक के लिये प्रयुक्त अरबी शब्द है ‘जंजबील’ जिसकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द श्रृंगवेर् से हुई है.

सी तरह कुरान की एक आयत में आता है, इन्नल अब्रा र लफ़ी नई म अ़लल अराइकि यन्जु़रुन तअरिफु फ़ी वुजूहिहिम ऩज्रतन्नईम युस्कौ़ न मिर्रहीकि़म मख़्तूम खि़तामुहू मिस्क यानि ‘और उन्हें खालिस शराब पिलाई जा रही होगी जो मुहरबंद होगी, मुहर उसकी मुश्क की होगी, बढ़-चढ़ कर अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये.’ कस्तूरी को संस्कृत में ‘मुश्क’ कहा जाता है और इसी का अरबीकृत रुप मिस्क है जो जन्नत की नेअमत के रुप में इस आयत में बयान हुआ है.

संस्कृत के और शब्द भी कुरान में मिलतें हैं, जैसे, पवित्र कुरआन की एक आयत में आता है- ‘इन्नल अब्रा र यश्रबू न मिन कअसिन कान मिज़ाजुहा काफ़ूरा ।’ ‘बेशक नेक लोग ऐसे जाम से पियेंगें जिसमें काफूर की मिलावट होगी।’ (सूरह अद्-दहर, आयत-5) उपरोक्त आयत में प्रयुक्त ‘काफूर’ शब्द मूल संस्कृत शब्द ‘कर्पूर’ का ही अरबीकृत रुप हैं.

अरब को जो लोग भी झटके में जाहिल कह देतें हैं उन्हें मालूम ही नहीं है कि इस्लाम पूर्व अरब के लोग साहित्य की दृष्टि से कितने ऊँचे थे. अपने भाषा पर उन्हें इतना गुरूर था कि अपने आगे वो शेष विश्व को मूक और गूंगा कहते थे.

मक्का में उकाज नाम के जगह पर अरब के तमाम कवि और साहित्यकार इकट्ठे होते थे, उनके बीच काव्य और शेरो-शायरी की प्रतियोगितायें होतीं थी और विजेता के काव्य को मृग-छाले या स्वर्ण-पत्र पर अंकित कर काबे की दीवार में लगाया जाता था.

जो उस काव्य-प्रतियोगिता में विजयी होता था उसे उसके कबीले वाले सर-आँखों पर बिठा लेते थे, महिलायें उनकी बलायें लेतीं थीं. ये भाषाविद युद्ध के लिए शौर्य गीत लिखते थे तो ईश्वर की आराधना के पद भी उनके कलम से निकलते थे.

कुरान अरबी भाषा में है महज इसलिये अरबी भाषा से हमारा ताअल्लुक नहीं, ऐसी सोच गलत है. इस्लाम पूर्व के कवियों की रचनाओं में महादेव, वेद और भारत भूमि की स्तुति के पद मिलते हैं. प्राचीन अरबी काव्य-ग्रन्थ सेररूल-ओकुल में ऐसे कई पद मिलते हैं.

इसी काव्य-संग्रह में अरबी कवि लबी-बिन-ए-अरबतब-बिन-तुर्फा की लिखी महादेव स्तुति मिलती है. दिल्ली के बिरला मंदिर की यज्ञशाला में वो आज भी प्रस्तर पर लिखा हुआ मिलेगा. लबी बिन ए अख़्तब बिन ए तुर्फ़ा की भगवान शिव के लिये लिखी गई स्तुति गूगल पर सहजता से उपलब्ध है.

इसी काव्य-संग्रह में उमर-बिन-हशशाम की लिखी कविता भी मौजूद है जो मुहम्मद साहब के समकालीन थे. उमर-बिन-हशशाम अरब के प्राचीन धर्म को बचाने की जंग में बलिदान हुए. इस काव्य-संग्रह में जिन दूसरे कवियों और शायरों की रचनाएं हैं उनके नाम हैं, इम्र-उल-क़ैस, जुहैर, अंतरा, अलकमा, तरफ़ह, लबीद, अम्र-बिन-कुलसूम, अंतरह, नाबिग़्हा, हिम्माद उल राबिया, हारिस बिन हिलिज्ज़ा आदि.

इस्लाम के आगमन के पूर्व अरबी भाषा में कई पुराणों का अनुवाद भी हुआ था. अरबी में अनुदित अति-प्राचीन भागवत पुराण का मिलना इसकी पुष्टि करता है. इसका अर्थ ये है कि अरबी लोग अनुवाद की कला में भी महारत रखते थे.

अरब में ये खासियत थी कि वहां हर उम्र के लोग शायरी करते थे. काव्य में कसीदाकारी, वीर-रस की कवितायें, ताने देतीं हुई रचनाएं, तुकबंदी करती शायरी ये सब उनकी विशेषतायें थीं. अरब सबसे अधिक सम्मान अपने कवियों और शायरों का करते थे, उनका सम्मान इतना अधिक था कि वो अपने कबीले के लिये परामर्शदाता, मार्गदर्शक, अभिभावक और प्रतिनिधि माने जाते थे.

अरबी की भाषाई श्रेष्ठता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि कुरान कई स्थानों पर अरब वालों को भाषाई शास्त्रार्थ की चुनौती देता दिखता है. अकेला भाषा ही वो आधार है जो इस्लाम पूर्व अरब को जाहिल कहने की सारी गुंजाईशें खत्म कर देता है.

अल-दावी का काव्य-संग्रह अल-मुफ़द्दलिआत’ 120 मधुर गीतों का संकलन है, अल-दावी की कई रचनाएं काबा की दीवारों पर सुशोभित थीं. किताबुल-अगानी नाम के काव्य-संग्रह में अरब की गौरवशाली वंश परम्परा का वर्णन मिलता है. वहां के अन्य बड़े कवियों में एक नाम अंतरा इब्ने-शद्दार अल अबू का भी है जो शौर्य-गीत रचा करते थे.

अरब के ऊपर एक आरोप महिला-विरोधी होने का भी है. जबकि उस समय के बड़े कवियों में कुछ महिलायें भी थीं जिनमें सबसे बड़ा नाम कीर्ति खनसा का है, उसके भाई की निर्मम हत्या कर दी गई थी जिसके बाद उसने अपने दर्द को काव्य रूप में लिखा था. काव्य की मर्सिया विधा ने अरब भूमि से जन्म लिया था.

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