विश्वास रखें, आपने जिसको चुना है वो आपका अपना है

मुझे अपने पर इतना भरोसा नहीं जितना सवा सौ करोड़ देशवासियों के सामर्थ्य पर भरोसा है। 1000-1200 वर्षों की गुलामी में हमने अपना सामर्थ्य भुला दिया और आजदी के बाद 70 सालों में हमने उस सामर्थ्य को जानने की कोशिश ही नहीं की….

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पतंजलि रिसर्च सेंटर हरिद्वार में बोलते हुए.

एक अकेले व्यक्ति को सवा सौ करोड़ पर भरोसा है, पर सोशल मीडिया के कुछ हजार लोगों को उस व्यक्ति पर भरोसा नहीं है.

अब मोदी जी एक मंत्रालय बना दें जो अलार्म लगा कर रोज इन लोगों के विश्वास को जगाए… सामर्थ्य तो भूल चुके है अब सिर्फ सुविधा के लिए जीवित हैं. सुविधा में थोड़ी सी भी दिक्कत हुई कि सरकार को कोसना शुरू….

नौकरी करेंगे सेना में…. देश सेवा नहीं… सेना में बहुत कष्ट है, सुविधाओं का अभाव है इसलिए हम अपने बच्चे को सेना में नहीं भेजेंगे.

देश सेवा, देश की रक्षा जैसे भावनात्मक शब्दों का दोहन करके देशभक्ति के ज्वार से उत्पन्न लहर की सवारी भी करनी है और असुविधाओं का रोना भी रोना है.

जिसका लक्ष्य देश की रक्षा करना होगा वो सुविधा नहीं ढूँढेगा… शिवाजी के सैनिक, सुविधाओं का रोना रोते रहे होते तो शिवाजी एक भी युद्ध नहीं जीतते.

अपने सैनिकों की मृत्यु पर गर्व करने का जज्बा हममें नहीं है…. हम इस बात पर गर्वित नहीं होते हैं कि हमारे सैनिक पीठ पर गोली खा कर नहीं आते है, बहादुरी से सामना करते हैं… पर उनका सामना बहादुरों से नहीं कायरों से होता है.

हम सरकार की सराहना इस बात के लिए नहीं करते हैं कि वो सम्मान के साथ उनको अंतिम विदाई देती है, बल्कि इस बात पर रोष प्रकट करते हैं कि उनकी मृत्य हुई क्यों?

जिस देश के नागरिक मरने से डरते हैं उस देश की रक्षा कोई नहीं कर सकता है. सही कहा है मोदी जी ने हम हमारे सामर्थ्य को भुला चुके हैं…

हम किन वीरों की विरासत को समाधि दे चुके हैं हम नहीं जानते हैं… हमारी माताएँ युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त होने वाले पुत्र के लिए छाती नही पीटती थीं… वीर की जननी होने के गर्व से गौरवान्वित हुआ करती थीं… युद्ध भूमि से पलायन करने वाले को धिक्कारती थीं.

देश के लिए बड़े से बड़े त्याग को तुच्छ समझने का मनोभाव कहीं तिरोहित हो गया है… आज तो दाल-रोटी की गुणवत्ता में समझौता नहीं करने वाला सहानभूति का पात्र है… भोजन-भट्ट देश की सेवा क्या खाक करेगा!

आज अनेक ऐसे परिवार हैं जिनके लिए सीमा से आया सैनिक का शव भी पैसे लेने का एक अवसर बन जाता है.

कुछ लोग सौदेबाजी भी करते हैं जब तक इतने पैसे नहीं मिलेंगे शव नहीं लेंगे…. जैसी स्थितियाँ भी देखने को मिलती ही रहती हैं.

क्या इन परिवारों ने अपने बेटे-पति को देश की रक्षा के लिए भेजा होता है? नहीं, सरकारी नौकरी करने के लिए भेजते हैं जिसका उद्देश्य पैसे कमाना होता है.

हम भावनाओं में बहने वाले लोग हैं, जो भावुक हो कर किसी को राष्ट्रपिता मान लेते हैं तो किसी को चाचा, किसी को त्याग की देवी और किसी को सर्वशक्तिमान महामानव भी.

सैनिक और देश के नाम पर इतने भावुक हो जाते हैं कि मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं… अवसरवादी ऐसे अवसर का लाभ उठाते हैं.

कंधे हमारे होते हैं, बंदूक किसी और की और हमारे अपने ही निशाना होते हैं… अनजाने में ही हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं.

विकट परिस्थिति में भी जो धैर्य, साहस और विवेक का साथ नहीं छोड़ता है, विपत्ति उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है.

प्रयास करें अपने सामर्थ्य को जानने का… दूसरों के उकसावे में आ कर विवेक का साथ छोड़ कर अधीर न बनें….

विश्वास रखें आपने जिसको चुना है वो आपका अपना है… आपकी सारी माँगे पूरी करेगा, पर जिस रूप में और जिस समय आप चाहते हैं उस तरह से नहीं… अपने तरीके से…

सरकार निरंतर काम कर रही है… जो कठिनाई आ रही है उसको दूर करने में प्रयासरत है, परिणाम भी जल्द ही आपके सामने होगा.

तब कहीं केजरीवाल की तरह क्षमा माँग कर मत कहिएगा कि ये सब तो इसलिए ही हुआ क्योंकि हमने दबाव बनाया, क्योंकि हम अंधभक्त नहीं है.

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