इस पर भी विचार हो कि ऐसा क्यों हुआ

मैं बार-बार कहता हूं कि जिस प्रकार से किसी घर का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर लेकिन उस घर का प्लास्टर और रंग लगाने का काम ऊपर से नीचे की ओर होता है उसी तरह से किसी सिस्टम का निर्माण भी नीचे से ऊपर और उसकी चाक-चौबंद और मरम्मत ऊपर से नीचे की ओर होती है.

आज मैं अपने इस कथन को सीमा पर हमारे दो सैनिकों के साथ हुई बर्बरता के साथ जोड़कर देख रहा हूं. इस बर्बरता के बाद सरकार और सेना को क्या करना चाहिये और क्या होगा, इस मुद्दे पर तो पूरे देश में चर्चाएं चल रही हैं.

क्या होगा यह अभी भविष्य की बात है, लेकिन ऐसा क्यों हुआ इस पर भी विचार जरुर होना चाहिये. आखिर पाकिस्तानी सैनिक हमारी सीमा में दो सौ पचार मीटर तक अंदर आ कैसे गये? निगरानी चौकियों के बीच हुई इस घुसपैठ के लिये कौन जिम्मेदार हैं?

आमतौर पर जिम्मेदारी तय करने में सिस्टम के सबसे निचले स्तर को निशाना बनाया जाता है. लेकिन उपरोक्त उदाहरण को देखते हुये यह रवैया कतई सही नहीं हो सकता. क्योंकि उन निगरानी चौकियों पर उन सिपाहियों की तैनाती होती है जो सिर्फ अपने अधिकारियों के हुक्म का पालन करते हैं. फिर नीचे से बढ़ते हुये हम अधिकारी तक पंहुचते हैं. लेकिन यह तो सिस्टम में नीचे से ऊपर चलने जैसा हुआ जो कि उसे कभी सुधार नहीं सकता.

इसलिये मैं इसके लिये सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार मानता हूं. वह सरकार जो आज एक अदद पूर्णकालिक रक्षा मंत्री के अभाव में चल रही है. मनोहर पर्रिकर के जाने के बाद यह जिम्मेदारी वित्तमंत्री जेटली के कंधे पर है.

स्पष्ट है कि जिस समय वह वित्त मंत्रालय की फाइलें देख रहे होंगे उनका ध्यान रक्षा मंत्रालय पर नहीं होगा. इसी तरह रक्षा के मामले देखते समय वह वित्त मंत्रालय को रिक्त छोड़ते होंगे.

सरकार और देश के लिये इन दोनों जगहों पर पूर्णकालिक मंत्रियों का होना जरुरी है. यह जिम्मेदारी सरकार की है और इसके लिये उसे माफ नहीं किया जा सकता कि उसने अभी भी रक्षा मंत्रालय का काम एक दूसरे मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति के पास छोड़ा है.

रक्षा मंत्री अगर ठीक से काम कर रहा होता तो उसके अधिकारी भी सीमा सुरक्षा को लेकर मुस्तैद रहते. अधिकारियों की मुस्तैदी का असर नीचे के सैनिकों पर पड़ता है.

इसलिये इस मामले में किसी भी प्रतिक्रिया से पहले एक रक्षा मंत्री की नियुक्ति आवश्यक है. ऐसा रक्षा मंत्री जो सीमाओं की सुरक्षा में लगे अधिकारियों की नकेल कस सके. फिर सैनिक तो उन अधिकारियों के हुक्म की तामील करते हुये लाहौर तक चढ़ जाने की हिम्मत रखते हैं.

हमें सीमाओं पर नोटबंदी नहीं बल्कि सीमाबंदी चाहिये. पहले हम अपने सैनिकों के सिरों को बचायें तब दुश्मन के सिरों की गिनती करते रहेंगे.

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