मरीजों के इलाज में डॉक्टर्स और अस्पतालों की मिली भगत से खुल्लमखुल्ला लूट

‘सुना है एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है ‘. लगभग यही हालत आजकल डाक्टरों के मामले में हो रही है. डाक्टरी की पढ़ाई में जबरजस्त प्रतिस्पर्धा, पढ़ाई की कड़ी मेहनत, हाऊस जॉब और रेसीडेन्सी में कई सालों तक चौबीसों घन्टे मशक्कत, स्नातकोत्तर उपाधि के लिये खून पसीना एक करना, जबकि सामान्यतया दूसरी विधा के हम उमर लोगों की तुलना में, कमाई के मामले में एक सामान्य डाक्टर का चार साल पीछे पिछड़ जाना.

यह सब, एक आम आदमी को किसी डाक्टर के जीवन में उसके द्वारा की गई कठिन तपस्या और मेहनत कभी किसी को नहीं दिखती. बस एक दो अनहोनी घटनाओं को तूल देकर, बढ़ा चढ़ा कर, मीडिया में उछाल कर ,जन सामान्य के दिमाग में यह जहर भर दिया जाता है – कि “मरीजों के इलाज में डाक्टर और अस्पतालों की मिली जुली सांठ गाँठ रहती है और दोनों मिलकर मरीजों का आर्थिक शोषण करने के हथकंडों में पूरी तरह व्यावसायिक बनकर खुल्लमखुल्ला लूट खसौट कर रहे हैं. ” इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले हम उन लाखों डाक्टरों को भूल जाते हैं जो सच में मरीज के लिए भगवान बन कर उनके जीवन की रक्षा कर रहे हैं.

एक होशियार युवक महज चौबीस साल की उमर में जब ‘आई ए एस ‘ अफसर बनकर दस साल के भीतर सीनियर अफसर बन जाता है. तब तक डाक्टर बना दूसरा युवक 34 साल की उम्र होने तक बमुश्किल से बीस हजार डाक्टरों में से एक डाक्टर सुपर स्पेशलाइजेशन करके एक साधारण ‘आई ए एस ‘ अफसर के बराबर का दर्जा पा पाता है.

फिर भी उसे 25 साल की आयु के ‘आई ए एस’ अधिकारी का मातहत बनकर काम करना पड़ता है. इसी कारण सरकारी नौकरी में कोई भी युवक डॉक्टर नहीं बनना चाहता है. 70 फीसदी योग्य डॉक्टर निजी क्षेत्र में अपनी प्रेक्टिस जमाते है. इनमें जो सर्वश्रेष्ठ होते हैं वह तीस प्रतिशत लोग पश्चिम में जाकर रोटी रोजी कमाते हैं. शेष बचे पांच फीसदी डॉक्टर ही ऐसे होते हैं जो प्रावीण्य सूची में या तो सबसे नीचे स्तर पर आते हैं, या जिन्हें आरक्षण की सुविधा प्राप्त है, सिर्फ ऐसे ही डाक्टर सरकारी नौकरी में आते हैं. यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि भारत में सरकारी चिकित्सा तन्त्र पूरी तरह से फ्लाप होता जा रहा है.

किसी भी प्रोफेशनल व्यवसाय में गुणवत्ता और क्वालिटी का खास महत्व होता है. दोनों ही मामलों में सरकारी चिकित्सा प्रणाली का मानक संकेतक 10 के हिसाब से मानक इन्डेक्स (-) ऋण दस से भी कम आयेगा. यह तथ्य स्वंय सरकार भी मानती है तभी पूरे देश में अपना इलाज कराने मंत्री, एम पी, एम एल ए या बडे अफसर कहीं भी किसी सरकारी अस्पताल के डाक्टर से अपना इलाज नहीं कराते. वे सदैव दिल्ली, बम्बई या विदेशों को भागते है. सरकारी अस्पताल तो सिर्फ गरीब और ग्रामीण वर्ग के लोग, जो ‘बिलो पावरटी लाईन’ के हैं उनके नसीब में ही लिखे हैं.

अमेरिका निवासी भारतीय मूल के प्रख्यात प्लास्टिक सर्जन डा० सतीश व्यास ने अपने एक साक्षात्कार में यह स्वीकारा है कि एक समय था जब इन्दौर के मेडीकल कालेज में डा० एस के मुखर्जी, डा०जंगलवाला, डा०पोहावाला, डाक्टर सिपाहा, डा० ग्रेबाल , डा० ढ़ांडा का युग था. तब इन्दौर के मेडीकल कालेज के शिक्षकों जैसा दुनिया में कहीं पर भी इतना उत्तम स्टाफ नहीं था. उस समय डा० मुखर्जी को प्राईवेट में दिखाने की मरीज की फीस मात्र दस रूपये थी. जब तक डा० मुखर्जी जिन्दा रहे कोई डाक्टर अपनी फीस दस रूपये से ज्यादा नहीं कर सका. अब तो सबकी प्राईवेट ही नहीं सरकारी डाकटर भी, निजी तौर पर जॉच कराने की हजार रूपये से कम फीस नहीं ले रहे हैं.

इतना सब होने के बाद भी डाक्टरों से इलाज में पूरी दुनिया में चूक होना स्वाभाविक है. अन्तर सिर्फ इतना है कि विदेशों में चूक के लिये हर्जाना पूर्ति के लिये मरीज को ड़ाक्टरों की इन्श्युरेन्स कम्पनी से लम्बी चौड़ी रकम मिल जाती है. हमारे देश में मरीज और मरीजों के अभिभावक या तो डाक्टर की धुनाई करके तथा अस्पताल में तोड़फोड करके अपना गुस्सा उतार लेते है, या फिर जो समझदार होते हैं वह अपना सिर धुन कर “होनहार बिरवान के होत चीकने पात ” कह कर खून का घूंट गटक लेते हैं.

डाक्टरों से इलाज में चूक भी दो तरह की होती है. एक उनका क्लिनिकल अनुमान गलत निकल जाता है , और दूसरा जानबूझ कर निजी अस्पताल मालिकों की गलत नीति के कारण अनावश्यक जांच या अन्य तरीकों से लूट खसोट में सहायक होना होता है.

क्लिनिकल भूल के तीन चश्मदीद उदाहरण मेरे संज्ञान में हैं. एक सत्तर के दशक की घटना है. धर्मयुग में एक लेख पढने के बाद मेरे सहयोगी मित्र प्रोफेसर सतीश मेहता की माता जी को शंका हुई कि उनके स्तन की छोटी सी गाँठ किसी मुसीबत की जड़ तो नहीं है. सतीश जी को पता लगते ही उन्होने माताजी को एक अमेरिका से उच्चप्रशिक्षण प्राप्त करके लौटे केन्सर विशेषज्ञ को दिखाया.

डाक्टर ने देखते ही उसे केन्सर की गाँठ बताकर तुरन्त आपरेशन की सलाह दी. केन्सर का नाम सुनते ही सबके चेहरे की हवाइयां उड़ गई. सतीश ने मुझसे परेशानी साझा की. मैं स्वंय सतीश जी के साथ उन डाक्टर महोदय के घर गया. मैंने डाक्टर से खुलकर बात की कि मेरी जानकारी में जब तक गाँठ की बीयोप्सी रिपोर्ट नहीं आती तब तक दुनिया में कोई भी नहीं कह सकता कि अमुक गाँठ केन्सरस है या नहीं?

डाक्टर ने कहा कि उन्हें इस तरह मेरी जिज्ञासा पर बहुत अच्छा लगा क्योंकि अमेरिका में तो मरीज को उसके इलाज के पहले पूरी तरह डाक्टर द्वारा संतुष्ट करना अनिवार्य होता है. भारत में यह चलन नहीं है फिर उन्होने कहा “अमेरिका में ऐसे सैकड़ों केस देखे हैं, माताजी की गाँठ पसली की हड्ड़ी पर बैठ चुकी है और यह ‘हन्ड्रेड़ परसेन्ट ग्यारनटेड़ केन्सर’ ही है. इसका तुरन्त आपरेशन कराना बहुत जरूरी है “.

डाक्टर ने इतने आत्मविश्वास से कहा तो दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था. माता जी का ऑपरेशन कराया गया , पूरे स्तन के साथ उससे जुडी पूरी मसलस् और लिम्फ नोडस् निकाल दिये गए. पर जब गाँठ की हिस्टकटोमी की रिपोर्ट आई तो पता चला कि गठान में केन्सर नहीं था. अगर बायोपसी करने के बाद आपरेशन किया जाता तो अकेली गठान निकालना पड़ती , पूरे स्तन से जुडी मॉस पेशियों को ‘सेक्रीफाईस’ नहीं करना पड़ता. इसके बाद डाक्टर से जब मैं मिला तो उनकी खस्ता हालत देखने लायक थी. इतने सालों बाद आज भी उन डाक्टर को अपनी गल्ती का एहसास हो रहा है, और मुझसे हमेशा दुख प्रकट करते हैं.

डाक्टरों की अनचाही चूक का दूसरा नमूना, मेरे अजीज दोस्त, इन्दौर वि०वि० के इन्जीनियरिंग कालेज के डायरेक्टर चांदवानी को अपनी जान देकर चुकाना पड़ी. मेरे मित्र ने इन्दौर के ही एक सर्वश्रेष्ठ होटल में डिनर के साथ सलाद में बन्द गोभी के पत्तों को खा लिया.

सभी लोग जानते हैं कि खान नदी के किनारों के खेतों में सब्जी उगाने के लिये किसान खान नदी के पानी का इस्तेमाल करते हैं. नदी के पानी में नगर का मल मूत्र मिला होता है. इस पानी में “टीनिया सोनियम” नाम का सूअर की आंतों में पनपा परजीवी भी होता है. दुर्भाग्य से पत्ता गोभी के पत्तों के बीच में यह ‘वर्म’ छुपा चला गया.

अच्छे से अच्छे होटलों में कच्चा सलाद बनाने के लिए ‘पोटेशियम परमेगनेट’ और नमक के पानी से कोई भी शाक सब्जी नहीं धोकर पकाता है. यह एक महज संयोग था कि मेरे मित्र ने उस कच्चे गोभी के पत्तों के सलाद को खा लिया. तबियत खराब हुई , डाक्टरों को दिखाया , डाक्टर जब तक कुछ समझ पाते कीटाणु ने ब्लड़ के रास्ते से जाकर दिमाग के ‘ग्रे मेटर’ वाले हिस्से में अपना घर बनाकर उसमें अंड़े दे दिये.

देखते ही देखते जब तक चिकित्सक कुछ समझ पाते तब तक ‘वर्म’ पूरे मष्तिष्क में फैल गए और मरीज खत्म हो गया. अभी मुश्किल से उनकी उम्र 45 की पार हुई थी और परिवार को छोड़कर जाना कितना दुखदाई हो सकता है उसका दर्द वही समझ सकता है, जिस पर आफत टूटती है. काश समय रहते मरीज का ब्रेन स्केन या ब्लड़ कल्चर हो जाता तो आज वह भला चंगा होता.

डाक्टरों की चूक का एक विचित्र नमूना उस समय सामने आया जब मध्यप्रदेश में निजी इंजीनियरिंग कालेजों को सबसे पहले चलाने वाले मेरे घनिष्ठ मित्र सुरेश चौकसे जी को भोपाल जैसे शहर में रहते हुए “स्वाईन फ्लू “जैसी घातक बीमारी हो गई पर राजधानी के अच्छे से अच्छे डाक्टर उसे पकड़ नहीं पाये.

जब तक बीमारी का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उन्हें दिल्ली शिफ्ट किया गया पर सब बेकार. अगर यह घटना विदेश में हुई होती तो डाक्टर और संबधित अस्पताल का हर्जाना भरते भरते दिवाला निकल जाता. पर हमारे देश में इस तरह के बिगड़े मामलों पर तीखी नजर रखने वाला कोई जरिया नहीं है.

एक जिम्मेदार संस्थान (एम सी आई ) मेडीकल काऊन्सिल आफ इन्ड़िया कही जाती है. जिसके चेअर मेन चेतन देसाई पर अरबों की नाजायज सम्पति रखने का आरोप लगा था. सब कोई जानता है करोड़ो खिलाओ और एम सी आई से लूटने का लायसेन्स ले आओ. तभी तो कुकुरमुत्तों की तरह निजी क्षेत्र में बोगस मेडीकल कालेज और बड़े बड़े मल्टी स्पेश्यलिटी अस्पताल खुलते जा रहे हैं.

इनकी कार्य प्रणाली और गुणवत्ता तथा ‘एकाऊन्टेबिलिटी’ पर कहीं कोई अंकुश नहीं है. अगर होता तो क्या राष्ट्रीय स्तर के एक निजी अस्पताल के प्रबन्धकों में इतनी हिम्मत होती कि वह कृत्रिम स्वशन यंत्र किराये से लेकर स्वाईन फ्लू के मरीजों को उस मशीन पर रखते. क्योंकि एक बार यदि इस उपकरण का उपयोग स्वाई फ्लू के मरीज द्वारा कर लिया जाता है तो उसे दूसरे मरीज को नहीं दिया जा सकता है. इस सावधानी का पर्याप्त सन्दर्भ मेडीकल के लिटरेचल में है. पर बड़े बड़े अस्पताल भी मरीजों की जान कैसे खतरे में डाल सकते है उसका यह पर्याप्त प्रमाण है.

केवल इन्दौर ही नहीं मुम्बई के अति प्रतिष्ठित अस्पताल हीरानन्दानी, मेकस फार्टिस और बी एस ई एस अन्धेरी में हृदय की सर्जरी में एन्जो प्लास्टी के काम में आने वाले 6000 रूपयों के केथेटर को तीन तीन चार चार मरीजों के आपरेशन में उपयोग किया गया , और सबसे अलग अलग लाखों रूपये वसूल किये गये.

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्वास्थ्य स्कीम के तहत झूठे बिल बनाकर करोड़ो रूपये सरकारी खजाने से लूटे गए. इस षड़यन्त्र का पता चलने पर 35 अस्पतालों को ब्लेक लिस्टेड करके मामले को रफा दफा कर दिया गया. तमिलनाडु के 800 सरकारी और निजी अस्पतालों में लगभग तीन लाख गरीब लोगों पर लगभग 750 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च किये जाते हैं. मुम्बई के बाइकुला स्थित बालाजी अस्पताल ने भी इसी प्रकार 50 मरीजों के बोगस इलाज बताकर सरकार से भी पैसे वसूल कर लिए और मरीजों से भी ऐंठ लिये.

चिकित्सा जगत की नामी रिसर्च मेगजीन ‘ब्रिटिश मेडीकल जरनल” में 3 सितम्बर 2015 के “मीरा के ” द्वारा लिखे एक लेख में ब्योरा छापा है कि किस तरह भारत में अस्पताल अनैतिक तरीकों से पैसा लूट रहे हैं. इग्लैण्ड़ में तो इसी अप्रेल महिने में एक हाईकोर्ट ने “ईआन स्टुअर्ट पेटरसन ” नामक डाक्टर को आजीवन जेल की सजा सुना दी है.

इस डाक्टर ने सैकड़ों महिलाओं को केन्सर नहीं होते हुए भी केन्सर बताकर ब्रेस्ट सर्जरी कर दी थी और लाखों पौण्ड़ की अवैध्य कमाई कर डाली. मेडीकल नियमों के अनुसार स्तन के केन्सर चिकित्सकों को ‘ क्लीवेज स्पेरिंग मेसेक्टॉमी ‘ करने को अनइथिकल माना जाता है.

इस सर्जरी की मुनादी है. फिर भी पेटरसन ने लगभग 450 अच्छी हट्टी कट्टी औरतों को अनावश्यक रूप से केन्सर की सम्भावना बताकर चीर फाड़ कर ड़ाली और अस्पताल तथा डाक्टर ने मिलकर खुल्लम खुल्ला लूट खसोट की.

अत: इन घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि दुनिया में लगभग 3-4 प्रतिशत डाक्टर और अस्पताल ऐसे जरूर होंगे जो खुल्लम खुल्ला मरीजों पर अनावश्यक तथा गलत इलाज करके लूट खसोट कर रहे हैं. हो सकता है भारत में इन लुटेरों की संख्या बहुत ज्यादा हो. पर इससे यह निष्कर्ष निकालना एकदम गलत है कि सभी डाक्टर चोर और लुटेरे हैं.

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