मोदी-शाह ने बदल दिया चुनावी राजनीति का खेल, मुश्किल में अन्य दल

मोदी के रथ को पूरे देश में सरपट दौड़ाते हुए रथ के सारथी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जब दो दिनों के लिए जम्मू पहुँचे तो अनायास ही मेरे मन में कई बातें आने लगी.

शादी के बाद हनीमून मनाने की परंपरा कब किसने शुरू की मैं नहीं जानता… पर जहाँ तक राजनीतिक पार्टियों की बात है, चुनाव में जीत हासिल करने के बाद हनीमून पीरियड मनाने की शुरुआत जरूर कांग्रेस पार्टी ने ही की होगी… क्योंकि सिर्फ कांग्रेस पार्टी का ही जलवा देश के अधिकांश राज्यों में था. यही ट्रेंड हाल के समय तक सभी क्षेत्रीय दलों में भी था.

जब उनकी सरकारें बनती थी तो कुछ महीनों या सालों तक राजसिंहासन पर आसीन होने का सुख इन पार्टियों के नेता बड़े ही मनोयोग से भोगते थे.

फिर जब खुमारी टूटती थी तब लोक लुभावन मुद्दों और जनता के हित में कुछ घोषणाएँ करके अगले चुनाव के लिए खुद को तैयार कर लेते थे. यही नहीं, कुछ तो दुबारा जीत भी जाते थे और कुछ अपनी बारी का पाँच साल बाद तक इंतजार करते थे.

पर अब देश की राजनीति में बहुत परिवर्तन आ चुका है. पारंपरिक तौर तरीके बदल चुके हैं.

मोदी-शाह की जोड़ी ने अन्य दलों के लिए राजनीतिक खेल का ऐसा कड़ा नियम बना दिया है, मानक तय कर दिया है कि उसकी पात्रता मात्र के लिए दलों को कठिन तैयारी करनी पड़ेगी, जिसके वो आदी नहीं हैं.

जब से मोदी देश प्रधान और अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने हैं तब से पार्टी की उपलब्धियों पर गौर करें कि कितनी मेहनत की है इन दोनों ने.

यूपी की ऐतिहासिक जीत के दस दिनों बाद ही अमित शाह कोयंबटूर में तीन दिवसीय कार्यक्रम में थे. उस राज्य में थे जहाँ एक भी विधानसभा की सीट नहीं है, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे थे.

फिर दिल्ली आए, और यहाँ भी हफ्तों तक अपनी रणनीति के सहारे और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का समायोजन करके दस वर्षों के अपने ही लचर कामकाज को मात देकर केजरीवाल और कांग्रेस को उनकी हैसियत दिखा गए.

इस जीत को हफ़्ता नहीं गुजरा कि अमित शाह बंगाल के नक्सलबाड़ी में दिखाई दिए जहाँ तीन दिनों तक रहकर बंगाल में बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं का संगठन तैयार कर दिया.

वहाँ के कार्यकर्ताओं में कुछ यूँ जोश भरा कि सभा में लाखों लोगों की भीड़ दिखाई देने लगी. यह तैयारी विधानसभा के लिए नहीं थी बल्कि स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए थी जो कुछ महीनों बाद होने हैं.

स्थानीय निकायों के चुनाव की यदि बात करें तो किसी भी पार्टी की जड़ यहीं से यानी ग्राम पंचायत से ही शुरू होती है.

पहले इन चुनावों की चर्चा कोई नहीं करता था और ना ही मीडिया इसे ज्यादा तवज्जो देती थी… पर भाजपा जिस प्रकार इन चुनावों में दमखम लगा रही है, लोग निचले स्तर के चुनावों की चर्चा भी करने लगे हैं. पहले पार्टियाँ सिर्फ विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर ही ध्यान केंद्रित रखती थी.

मायावती ने तो यूपी में स्थानीय निकायों के चुनाव को हमेशा से ही महत्वहीन माना था. अपने बीस सालों के कार्यकाल में कभी भी पार्टी की हैसियत से स्थानीय चुनाव नहीं लड़ा.

पर अब जब अस्तित्व मिटने का खतरा सिर पर है तो पहली बार पार्टी सिंबल के साथ चुनाव में उतरने का फैसला किया है. दलित राजनीति के सहारे सत्ता मिलती रही थी, बस यही वजह थी ना लड़ने की.

चुनावी राजनीति में जिस प्रकार से यह बदलाव हो रहा है… कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या कांग्रेस या राहुल गांधी में इतनी सामर्थ्य है कि वो देश की सबसे बड़ी पार्टी को पुनर्जीवित कर सकें? इसका उत्तर कम से कम इस वक्त या दस वर्षों बाद तक भी मिलता नहीं दिख रहा है.

खैर, आज अमित शाह जम्मू में हैं और उनका लक्ष्य राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की है अगले चुनावों तक. इसके लिए जम्मू सहित घाटी में भी पार्टी का मजबूत संगठन तैयार करने का बीड़ा उठा चुके हैं.

आगे जो भी हो, राज्य में पूर्ण बहुमत आए या ना आए, पर एक बात तो है कि बंदे में एनर्जी बहुत है, बड़े लक्ष्य को देखकर हिम्मती कभी नहीं घबराते हैं…

यही हिम्मत और लगन अमित शाह में प्रत्यक्ष दिखती है… और यही वजह है कि विरोधियों को कोई काट नहीं सूझ रहा मोदी शाह की जोड़ी का… और ना ही कोई तरीका कि इस रथ को रोके कैसे?

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